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Wednesday, September 22, 2010

इस जीएम आलू में होगा साठ फीसदी ज्‍यादा प्रोटीन

उत्‍तरप्रदेश के एक गांव में आलू चुनते ग्रामीण (फोटो रायटर से साभार)
भारतीय वैज्ञानिकों ने आलू की ऐसी जीन संवर्धित प्रजाति को विकसित करने में कामयाबी हासिल की है, जिसमें साठ प्रतिशत अधिक प्रोटीन होगा। खास बात यह भी है कि इस प्रजाति में सेहत के लिए फायदेमंद समझे जानेवाले अमीनो एसिड, लाइसिन, टायरोसिन व सल्‍फर भी अधिक मात्रा में हैं, जो आम तौर पर आलू में बहुत सीमित होते हैं।

इस खोज को अंजाम देनेवाले नेशनल इंस्‍टीट्यूट फॉर प्‍लांट जीनोम रिसर्च की शोध टीम की प्रमुख शुभ्रा चक्रवर्ती का कहना है कि विकासशील और विकसित देशों में आलू मुख्य भोजन में शुमार है और इस खोज से काफी अधिक संख्या में लोगों को फायदा होगा। इससे आलू से बने पकवानों को स्वाद और सेहत दोनों के लिए फायदेमंद बनाया जा सकेगा। इसके अलावा वह इस खोज को जैव इंजीनियरिंग के लिए भी फायदेमंद मानती हैं। उनका कहना है कि इससे अगली पीढ़ी की उन्नत प्रजातियों को खोजने के लिए वैज्ञानिक प्रेरित होंगे।

विज्ञान पत्रिका "प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल अकेडमी ऑफ सांइस" में प्रकाशित शोध रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आलू की अन्य किस्मों के बेहतरीन गुणों से भरपूर इस किस्‍म को लोग हाथों-हाथ लेंगे। रिपोर्ट के अनुसार इस प्रजाति में संवर्धित गुणसूत्रों वाली आलू की सबसे प्रचलित प्रजाति अमरनाथ के गुणसूत्रों को भी मिलाया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार दो साल तक चले इस शोध में आलू की सात किस्मों में संवर्धित गुणसूत्र वाले जीन "अमरंथ एल्बुमिन 1 (AmA1)" को मिलाने के बाद नयी प्रजाति को तैयार किया गया है। प्रयोग में पाया गया कि इस जीन के मिश्रण से सातों किस्मों में प्रोटीन की मात्रा 35 से 60 प्रतिशत तक बढ़ गयी। इसके अलावा इसकी पैदावार भी अन्य किस्मों की तुलना में प्रति हेक्टेएर 15 से 20 प्रतिशत तक ज्यादा है।

इसके उपयोग से होनेवाले नुकसान के परीक्षण में भी यह प्रजाति पास हो गयी। चूहों और खरगोशों पर किए गए परीक्षण में पाया गया कि इसके खाने से एलर्जी या किसी अन्य तरह का जहरीला असर नहीं हुआ है। रिपोर्ट में इस किस्म को हर लिहाज से फायदेमंद बताते हुए व्यापक पैमाने पर इसे पसंद किए जाने का विश्वास व्यक्त किया गया है। हालांकि अभी इसे उपयोग के लिए बाजार में उतारे जाने से पहले पर्यावरण मंत्रालय की जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी से हरी झंडी मिलना बाकी है।

मूल खबर को हिन्‍दी में यहां और अंगरेजी में यहां पढ़ा जा सकता है।

Tuesday, August 24, 2010

आप जानते हैं कि 15 अगस्‍त को फ्रांसीसियों ने क्‍या किया ?

15 अगस्‍त। हमारी आजादी का दिन।

इस दिन सुबह में आपने भी झंडे लहराए होंगे और जश्‍न मनाया होगा। लेकिन आप जानते हैं कि इस साल फ्रांसीसियों ने इस दिन क्‍या किया ? जवाब जानने के लिए यहां क्लिक करें।

बहरहाल अब जबकि जीन संवर्धित फसलों को मंजूरी की प्रक्रिया आसान करने के लिए केन्‍द्र सरकार द्वारा संसद के समक्ष विधेयक पेश करने की तैयारी चल रही है, अग्रलिखित सवाल अब भी कायम है : आप खेत और पेट की गुलामी को तैयार तो हैं?

जवाब आपको तलाशना ही होगा। अन्‍यथा एक दिन हम और आप दुनिया के सामने खुद एक पेचीदा सवाल बनकर रह जाएंगे।

Saturday, November 28, 2009

दो हजार वैज्ञानिकों ने मेक्सिको में किया जीएम मक्‍के का विरोध

लैटिन अमरीकी देश मेक्सिको में जेनेटिकली मॉडीफाइड (जीएम) मक्‍के की खेती ज्‍वलंत मुद्दा बना हुआ है। एक ओर वहां की सरकार इसकी परीक्षण खेती की अनुमति दे चुकी है, वहीं दूसरी ओर वहां के हजारों वैज्ञानिक इसके विरोध में उठ खड़े हुए हैं। करीब दो हजार से भी अधिक वैज्ञानिकों ने सरकार को याचिका देकर डो एग्री साइंसेज और मोनसेंटो द्वारा की जा रही जेनेटिकली मॉडीफाइड (जीएम) मक्‍के की प्रायोगिक खेती पर रोक लगाने की मांग की है। ये वैज्ञानिक देश के उत्‍तरी क्षेत्र में जीएम मक्‍के की खेती होने से चिंतित हैं तथा इनका कहना है कि प्राकृतिक मक्‍के की किस्‍मों को पराजीनों (transgenes) के प्रदूषण से बचाए रखने लायक सामर्थ्‍य व संसाधन मेक्सिको के पास नहीं है।

गौरतलब है कि मक्‍के की उत्‍पत्ति मेक्सिको से ही मानी जाती है और वहां यह आहार का मुख्‍य स्रोत है। बहुराष्‍ट्रीय बीज कंपनियां जीन संवर्धित मक्‍का को उस देश में मंजूरी दिलाने के लिए लंबे समय से प्रयत्‍नरत रही हैं, लेकिन पिछले ग्‍यारह वर्षों से सरकार ने वहां जीएम मक्‍के की खेती पर रोक लगा रखी थी। हालांकि बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों को आखिरकार सफलता मिल ही गयी और पिछले माह वहां की सरकार ने डो एग्री साइंसेज और मोनसेंटो नामक कंपनियों को देश के उत्‍तरी क्षेत्र में करीब 13 हेक्‍टेयर भूमि के दो दर्जन प्‍लाटों में पराजीनी मक्‍के की परीक्षण खेती करने की अनुमति दे दी।

इस संबध में सरकारी अधिकारियों का कहना है कि जीन संवर्धित मक्‍के से प्राकृतिक किस्‍मों में जीनों के प्रवाह को रोकने के लिए उपयुक्‍त उपाय किए जा रहे हैं। उनका कहना है कि अभी सिर्फ प्रायोगिक खेती की जा रही है, जिसका उद्देश्‍य यह देखना है कि इन परिस्थितियों में जीन संवर्धित पौधे कितने कारगर हैं। वे कहते हैं, ‘’आधा हेक्‍टेयर से भी छोटे प्‍लॉट होंगे, प्राकृतिक मक्‍के से इतर समय में बीज डाले जाएंगे और देसी मक्‍के पर उसके असर के बारे में किसानों से सर्वेक्षण होगा।‘’

हालांकि परीक्षण खेती का विरोध कर रहे वैज्ञानिक इन तर्कों से आश्‍वस्‍त नहीं हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के आनुवांशिकीविद मोंटगोमरी स्‍लाटकिन कहते हैं, ‘’देसी फसल को पराजीन-प्रदूषण से बचाने का कोई उपाय नहीं है।‘’ मेक्सिको के प्रमुख जीवविज्ञानी जोस सारुखन केरमेज कहते हैं, ‘’यदि मेक्सिको पराजीनी मक्‍के की प्रायोगिक खेती करता है तो यह आदर्श स्थितियों व समुचित निगरानी में होना चाहिए। लेकिन हमारे पास दोनों में से कोई चीज नहीं।‘’
फोटो नेचर से साभार

Friday, November 27, 2009

चीन में जीएम चावल को मंजूरी, दो-तीन सालों में होने लगेगी वाणिज्यिक खेती

कृ‍षि से संबंधित एक बड़ी खबर यह है कि चीन ने अपने यहां स्‍थानीय तौर पर विकसित किए गए आनुवांशिक रूप से संवर्धित (Genetically Modified Rice) चावल को मंजूरी दे दी है। चीन के वैज्ञानिकों के हवाले से यह खबर देते हुए रायटर समाचार एजेंसी ने कहा है कि वहां के कृषि मंत्रालय की बायोसेफ्टी कमेटी ने आनुवांशिक रूप से संवर्धित कीट-प्रतिरोधी बीटी चावल को बायोसेफ्टी प्रमाणमत्र जारी कर दिए हैं और इसी के साथ उस देश में अगले दो से तीन सालों में इसकी बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक खेती का मार्ग प्रशस्‍त हो गया है। चूंकि चीन दुनिया में चावल का सबसे बड़ा उत्‍पादक और उपभोक्‍ता है, इसलिए इस खबर का खासा महत्‍व है और पर्यावरण समर्थक संगठनों में इसको लेकर चिंता व्‍याप्‍त है।

गौरतलब है कि स्‍थानीय स्‍तर पर विकसित किए गए बीटी-63 (Bt-63) नामक कीट-प्रतिरोधी जीन संवर्धित चावल की श्रृंखला को मंजूरी अभी वहां के कृषि मंत्रालय की बायोसेफ्टी कमेटी ने दी है। इसका मतलब है कि चीन के कृषि मंत्रालय से अनुमोदन अभी बाकी है। लेकिन जिस तरह से जीएम फसलों की ओर चीन का झुकाव बढ़ रहा है, माना जा सकता है कि यह अनुमोदन भी देर-सबेर मिल ही जाएगा। माना जा रहा है कि पंजीकरण और प्रायोगिक उत्‍पादन जैसी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद ही वाणिज्यिक उत्‍पादन शुरू होगा, लेकिन अनुमान जताया जा रहा है कि अगले दो-तीन सालों में ये औपचारिकताएं पूरी हो जाएंगी। चीन ने पिछले सप्‍ताह जीन संवर्धित फाइटेस (GM phytase) नामक जानवरों को खिलाए जानेवाले अनाज (Corn) को भी बायोसेफ्टी मंजूरी दी है।

इस बीच पर्यावरण समर्थक संगठन ग्रीनपीस ने चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि चीन में जीएम चावल को मंजूरी अभी पूर्ण नहीं है और यह उतना आसान भी नहीं है। संगठन ने कहा है कि दुनिया की बीस फीसदी से भी अधिक आबादी को खतरनाक जेनेटिक प्रयोग से बचाने के लिए चीन के कृषि मंत्रालय से उसके द्वारा अनुरोध किया जा रहा है। विदित हो कि हर साल करीब 59.5 मिलियन टन चावल उपजानेवाला चीन दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्‍पादक है। इसमें से अधिकांश चावल की घरेलु स्‍तर पर ही खपत हो जाती है, लेकिन कुछ निर्यात भी होता है।

पर्यावरण संगठनों का कहना है कि जीई फूड से चीन में स्‍वास्‍थ्‍य, पर्यावरण व खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से क्षति होगी तथा उसके निर्यात पर बुरा असर पड़ सकता है। ग्रीनपीस के चीन में मौजूद एक कार्यकर्ता के शब्‍दों में जीई चावल के वाणिज्यिकरण से चीन की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी, क्‍योंकि इस तरह के चावल का अधिकांश पेटेन्‍ट मोंसैंटो जैसी विदेशी कंपनियों के नियंत्रण में है।
फोटो ग्रीनपीस से सभार

Thursday, November 26, 2009

जज आप, ऐडवोकेट भी आप, बीटी बैगन का रास्‍ता साफ

क्‍या आप ने किसी केस में जज को ही पैरवी करते देखा है ? यदि ऐसा ही हो तो क्‍या फैसला होगा आसानी से समझा जा सकता है। भारत में जेनेटिकली मोडिफाईड बैगन के मामले में यही बात देखने को मिल रही है। जीएम बैगन की खेती के बारे में जिस केन्‍द्र सरकार को निर्णय लेना है, वही उस तरह की फसलों की पैरवी कर रही है। केन्‍द्र सरकार एक तरफ कह रही है कि बीटी बैगन के बारे में अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी पक्षों से परामर्श किया जाएगा, वहीं दूसरी ओर उसके संबंधित मंत्री ट्रांसजेनिक फसलों के पक्ष में चल रही मुहिम में शामिल नजर आ रहे हैं।

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने हाल ही में सार्वजनिक रूप से बीटी बैगन का समर्थन करते हुए एक लिखित प्रश्‍नोत्‍तर में लोकसभा को बताया है कि बीटी बैगन का विकास अंतरराष्‍ट्रीय मानदंडों के अनुरूप किया गया है तथा इसके पर्यावरण संबंधी खतरे का अध्‍ययन करनेवाले विशेषज्ञों की समिति ने इसमें कोई खराबी नहीं पायी है। इसलिए इसकी खेती से देश की जैव विविधता को नुकसान होने की आशंका नहीं है। उधर केन्‍द्रीय कृषि एवं उपभोक्ता मामलों के राज्य मंत्री के वी थामस तो यहां तक कह रहे हैं कि जीएम फसलों से क्रांति आ सकती है। वे कहते हैं कि आनुवांशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों से मानवता का कल्याण हो सकता है। जीएम फसलों के समर्थन में श्री थामस के लगातार आ रहे वक्‍तव्‍य आप यहां, यहां, यहां, और यहां देख सकते हैं।

जब कृषि, उपभोक्‍ता व पर्यावरण जैसे विभागों के मंत्री ही बीटी बैगन के पक्ष में इतनी जोरदार दलीलें दे रहे हों तो माना जाना चाहिए कि भारत में उसकी वाणिज्यिक खेती को मंजूरी अब औपचारिकता भर रह गयी है। कभी-कभी तो यह संदेह भी होने लगता है कि कहीं पहले ही पूरा मामला फिक्‍स तो नहीं कर लिया गया है।

गौरतलब है कि केन्‍द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की राष्ट्रीय खाद्य नियामक संस्था जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी पहले ही किसान संगठनों के कड़े विरोध के बावजूद बीटी बैगन को अंतिम मंजूरी दे चुकी है। कमेटी के कुछ सदस्यों ने इसका विरोध किया था। कमेटी के सदस्य और जाने-माने वैज्ञानिक पीएम भार्गव ने मॉलिक्यूलर प्रकृति का मुद्दा उठाया, लेकिन अन्य सदस्यों ने उसे खारिज कर दिया। अब यह मामला केन्‍द्र सरकार के पास है तथा सरकार के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की स्‍वीकृति के बाद बीटी बैगन के बीज को बाजार में उतारा जा सकेगा।

बीटी बैगन का विकास महाराष्ट्र हाईब्रिड सीड कंपनी (माहिको) ने किया है जो मोनसैंटो की पार्टनर है। बीटी शब्‍द का प्रयोग बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस (Bacillus thuringiensis) के लिए किया जाता है। बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस मिट्टी में प्राकृतिक रूप से पाया जानेवाला बैक्‍टीरिया है जो जहरीला प्रोटीन पैदा करता है। वैज्ञानिकों ने इस जहरीला प्रोटीन के लिए जिम्‍मेवार जीनों की पहचान की और उन्‍हें जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक के जरिए अलग कर फसलों की जीन संरचना में डालकर बीटी फसलें तैयार कीं। बीटी कपास, बीटी मक्‍का और बीटी बैगन जैसी फसलों के बीजों का निर्माण इसी तरीके से हुआ है। माहिको द्वारा तैयार बीटी बैगन में क्राई1एसी (cry1Ac) नामक बीटी जीन डाला गया है, जिसकी वजह से बननेवाले जहरीले प्रोटीन को खाकर कीड़े मर जाएंगे। हालांकि पर्यावरणवादियों का कहना है कि इस तरह की जीनों से तैयार जीएम फसलें मिट्टी, मानव स्‍वास्‍थ्‍य व वन्‍य प्राणियों के लिए नुकसानदेह हैं। उनका कहना है कि इनकी वजह से अन्‍य फसलें भी प्रदूषित हो जाएंगी, जिससे पर्यावरण व मानव स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरा पैदा हो जाएगा।

Friday, July 17, 2009

वो जो चाहेंगे, आप खाएंगे... वो जो चाहेंगे, किसान उगाएंगे... आप खेत और पेट की गुलामी को तैयार तो हैं !

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने संसद में एक सवाल के जवाब में बताया कि अगले तीन सालों के अंदर देश में जीन संवर्धित टमाटर, बैगन और फूलगोभी की खेती आरंभ कर देने की योजना है। पूरी खबर यहां है और यह रही इस संबंध में सरकार की प्रेस विज्ञप्ति। भारत सरकार की नीति-रीति से तो सभी परिचित हैं, लेकिन इस महत्‍वपूर्ण खुलासे की जैसी प्रतिक्रिया मीडिया में होनी चाहिए थी, महसूस नहीं की गयी। शायद हमारे अंदर भ्रष्‍टाचार की तरह प्रकृति-विनाश के प्रति भी तटस्‍थ रहने का सामर्थ्‍य विकसित हो चुका है।

अजीब बात है कि जहां यूरोप और अमेरिका में प्रकृति की ओर लौटने की चाहत देखने को मिल रही है, भारत में इसके विनाश की कवायद चल रही है। कुछ समय पहले जर्मनी में जीन संवर्धित मक्‍के की खेती पर रोक लगा दी गयी। चंद रोज पहले आस्‍ट्रेलिया के न्‍यू साउथ वेल्‍स प्रांत की सरकार द्वारा बोतलबंद पानी की सरकारी खरीद पर रोक लगायी गयी। हाल ही में अमेरिका के फ्लोरिडा प्रांत में शहद के प्राकृतिक स्‍वरूप को बरकरार रखने के लिए कानून बनाए गए हैं, जिसके तहत उसमें किसी भी तरह की मिलावट पर दंड का प्रावधान किया गया है। लेकिन पुण्‍यसलिला गंगा के देश में तो उलटी गंगा ही बहती है।

सवाल यह उठता है कि आखिर किसके फायदे के लिए भारत की सरकार जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती देश में आरंभ करने की जल्‍दबाजी में है। कृषि और किसानों का तो इसमें कोई भला नहीं। इनमें बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस (Bacillus thuringiensis) जैसी बैक्‍टीरिया के जीन डाले गए तो खानेवालों के लिए ये जहर का काम ही करेंगी। जहां तक भारतीय किसानों की बात है तो वे बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों का बीज खरीदने में बरबाद ही हो जाएंगे। अभी घर में बचाकर रखे बीज से उनका काम चल जाता है, लेकिन जीएम बीज हर साल खरीदना पड़ेगा, वह भी मौजूदा कीमतों से करीब बीस-तीस गुना अधिक कीमत पर। यह भी कुप्रचार ही है कि जीएम बीज से उपज में भारी वृद्धि होती है। यदि उपज में थोड़ी बहुत बढ़ोतरी होती भी हो तो उससे होनेवाली कमाई से अधिक पैसा महंगा बीज खरीदने में लग जाता है। मानसून पर निर्भर खेती करनेवाले भारतीय किसान पूरी पूंजी महंगा बीज खरीदने में ही लगा देंगे तो मौसम के दगा देने पर गले में फंदा डालने के सिवाय उनके पास कोई विकल्‍प नहीं बचेगा। कृषि को जो नुकसान पहुंचेगा उसकी कल्‍पना ही भयावह है। सृष्टि की वह रचना जो खेतों में हरियाली लाती है और मानव शरीर व मस्तिष्‍क का पोषण करती है, चंद बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की मुट्ठी में कैद हो जाएगी। जो सरकार इस अपूरणीय क्षति की भरपाई नहीं कर सकती, इसकी राह आसान करने का नैतिक अधिकार उसे कहां से मिल गया ?

सच तो यह है कि जीन संवर्धित फसलों के मूल स्रोत अमेरिका में भी अभी तक सोयाबीन और मक्‍का ही ऐसी खाद्य फसलें हैं, जिनकी जीन संवर्धित किस्‍मों को मंजूरी दी गयी है। वहां भी इन दोनों फसलों का अधिकांश उपयोग जानवरों के चारे के रूप में होता है। यूरोपीय संघ में अभी तक सिर्फ मोंसैंटो के जीएम मक्‍का प्रभेद मोन 810 की खेती की अनुमति है। उसमें भी जर्मनी, फ़्रांस, ऑस्ट्रिया, हंगरी, ग्रीस और लक्ज़ेमबर्ग जैसे उसके सदस्‍य देखों ने उसकी खेती पर रोक लगा रखी है। जाहिर है कि यदि जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती भारत में आरंभ करने की सरकार की योजना अमल में आती है तो इन अप्राकृतिक फसलों के लिए प्रयोगशाला के चूहे करोड़ों भारतवासी ही बनेंगे।

ध्‍यान देने योग्‍य बात यह भी है कि जीन संवर्धित फसलें हमारी आर्थिक गुलामी का मार्ग प्रशस्‍त करेंगी। जीएम बीजों के उत्‍पादन और विक्रय का समूचा कारोबार मोंसैंटो, सिनजेंटा, बायर, बीएएसएफ आदि जैसी कुछ बड़ी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है। वे बाजार पर अपने एकाधिकार को सुनिश्चित करने के लिए फसलों की जीन-सरंचना के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ से नहीं चूकेंगी। देश में एक बार जीएम खाद्य फसलों की खेती शुरू हुई तो बीज के लिए बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों पर पूरी तरह से निर्भर होने में हमें देर नहीं लगेगी। तब क्‍या करेंगे मनमोहन, सोनिया, पवार, प्रवण व चिदंबरम जब बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां अचानक अपने बीजों की आपूर्ति रोक दें ? जीन संवर्धित फसलों की देश में बहुतायत होने पर हमारा कृषि निर्यात भी बुरी तरह से प्रभावित होगा।

आदमी की पहली जरूरत उसकी भूख से जुड़ी होती है। जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती से हमारे खेत ही नहीं, पेट भी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की मर्जी का गुलाम हो जाएगा। ईस्‍ट इंडिया कंपनी भी एक दिन इस देश में व्‍यापार करने ही आयी थी और लालची व गद्दार लोगों की मदद से पूरी कौम को गुलाम बना डाला। जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती के जरिए भी इसी तरह की गुलामी की पृष्‍ठभूमि तैयार हो रही है। हम भारतवासियों के पास अब दो ही विकल्‍प हैं – औपनिवेशिक साम्राज्‍यवाद के इस नए रूप को पहचानें या अपने खेत व पेट की जरूरतों को मुट्ठी भर बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की इच्‍छा का गुलाम बनाने को तैयार रहें।

(फोटो यहां से साभार लिया गया है।)

Tuesday, April 21, 2009

जहरीला प्रोटीन पैदा करनेवाला जीन ही बीटी बैगन में !

आप यह बात जानते होंगे कि भारत का पहला जीन संवर्धित खाद्य पदार्थ बीटी बैगन सरकार की सर्वोच्‍च प्रौद्योगिकी नियामक संस्‍था जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) की स्‍वीकृति पाने के अंतिम चरण में है। उम्‍मीद है कि वर्ष 2009 के अंत तक वाणिज्यिक उत्‍पादन के लिए इसके बीज बाजार में आ जाएंगे। लेकिन क्‍या आप यह भी जानते हैं कि बीटी का मतलब क्‍या है ?

बीटी मतलब बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस (Bacillus thuringiensis)। जी हां, यह मिट्टी में पाया जानेवाला वही बैक्‍टीरिया है जिसके जीन को मोंसैंटो के जीएम मक्‍का मोन 810 में मिलाया गया है, जिसकी खेती जर्मनी में प्रतिबंधित कर दी गयी।

कहने का तात्‍पर्य है कि बीटी बैगन में भी उसी तरह का जीन डाला गया है, जिसकी वजह से मोंसैंटो के जीन संवर्धित बीटी मक्‍का मोन 810 की खेती पर जर्मनी, फ्रांस सहित छह यूरोपीय देशों में रोक लगी हुई है। रोक संबंधी पूरी खबर आप हमारे पूर्व के लेख में देख सकते हैं। बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस बैक्‍टीरिया का जीन मक्‍का में एक ऐसा जहरीला प्रोटीन पैदा करता है, जिससे मक्‍के को नुकसान पहुंचानेवाली कॉर्नबोरर तितली का लार्वा मर जाता है। बीटी बैगन में इस जीन के मिलावट के पीछे भी पौधे में नुकसानदेह कीटों को मारने की क्षमता विकसित करने की ही सोच है। संभव है इस जीन प्रोद्यौगिकी की मदद से कीटनाशकों पर होनेवाला किसानों का व्‍यय बचे तथा उपज में वृद्धि हो। लेकिन मानव स्‍वास्‍थ्‍य व पर्यावरण पर इसका कितना दुष्‍प्रभाव पड़ेगा, इसका समूचा आकलन अभी शेष है।

मोंसैंटो कंपनी द्वारा तैयार किए गए जीन परिवर्तित (gnentically engineered) मक्‍के की किस्‍मों के बारे में पर्यावरणवादियों का कहना है कि ये पर्यावरण, मिट्टी, मानव स्‍वास्‍थ्‍य व वन्‍य प्राणियों के लिए नुकसानदेह हैं। उनका कहना है कि इनकी वजह से अन्‍य फसलें भी प्रदूषित हो जाएंगी, जिससे पर्यावरण व मानव स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरा पैदा हो जाएगा। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि चूहों पर किए गए परीक्षणों में इस मक्‍का के खाने से उनकी रक्‍त-सरंचना में परिवर्तन, जनन क्षमता में ह्रास और लीवर व किडनी जैसे आंतरिक अंगों को क्षति पहुंचने की बात सामने आयी है। कहा जा रहा है कि खुद जर्मन कृषि मंत्रालय के सामने ऐसे कई वैज्ञानिक अध्ययन हैं, जो कहते है कि इस मक्के की खेती से तितलियों और गुबरैलों को ही नहीं, मिट्टी और पानी में रहने वाले कुछ दूसरे जीवधारियों को भी ख़तरा है।

गौर करने की बात है कि बीटी मक्‍का की खेती यूरोप में खाने के लिए नहीं, जानवरों को खिलाने के लिए होती है। लेकिन बीटी बैगन तो भारत में हमारे आप के जैसे इंसान खाएंगे। जब पशु चारा के रूप में जीएम फूड की खेती का इतना खतरा है तो आदमी के खाद्य पदार्थ के रूप में इसके उत्‍पादन का क्‍या दुष्‍प्रभाव होगा आप खुद ही आंक लीजिए।

Sunday, April 19, 2009

जीन संवर्धित फसल : किसानों के लिए टेंशन लेने का नहीं, देने का !

इस शीर्षक में तल्‍खी है, इस बात से हमें इंकार नहीं। लेकिन जीएम फसलों की वजह से क्षुब्‍ध किसानों को तसल्‍ली देने के लिए इससे बेहतर शब्‍दावली शायद नहीं है। वैसे यह बात गलत भी नहीं है। भारत में जीएम फसलों के प्रति बढ़ते रूझान से अब समय ही ऐसा आ रहा है कि देश के किसान आपके खाने के लिए जहरीला खाद्यान्‍न उपजाएंगे। सृष्टि का चक्र शायद कुछ इसी तरह घूमता है। अब तक उपेक्षा सह रहे किसानों को संभवत: इसी रूप में न्‍याय मिलनेवाला है।

जहां यूरोपीय देशों की सरकारें प्राणियों व पर्यावरण पर जीन संवर्धित फसलों के दुष्‍प्रभाव को लेकर उन पर रोक लगा रही हैं, भारत की सरकारी संस्‍थाएं उनके प्रचार में जुटी हैं। चिंता की बात यह है कि भारत के आम शहरी भी इस मामले में उदासीन बने हुए हैं, मानो उनके लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है। वे सोचते होंगे कि जीएम फसल से उन्‍हें क्‍या मतलब, इसके बारे में किसान जानें, पर्यावरणवादी जानें या सरकार। हालांकि उनकी यह उदासीनता उनके लिए बहुत बड़ा संकट उत्‍पन्‍न करनेवाली है, जिससे बचने का बाद में शायद कोई विकल्‍प न हो। वे यदि उदासीन न रहते तो सरकार पर इस मामले में गंभीर रहने का दबाव पड़ता।

देश में कृषि संबंधी सारी समस्‍याओं का खामियाजा अब तक सिर्फ किसान भुगतते आए हैं, लेकिन जीन संवर्धित फसलों के मामले में ऐसा नहीं होनेवाला। इनका सबसे अधिक नुकसान इन्‍हें उपजानेवालों को नहीं, बल्कि इन्‍हें खानेवालों को उठाना होगा। किसान को तो जीएम फसलों की वजह से पैदावार बढ़ने या कीटनाशकों पर लागत कम आने का शायद फायदा भी हो जाए, लेकिन गैर किसानों को तो सिर्फ क्षति ही क्षति है। किसान तो शायद अपने खाने के लिए थोड़ी मात्रा में परंपरागत फसल उपजा ले, लेकिन गैर किसानों के लिए तो बाजार सिर्फ और सिर्फ जीएम फसलों से ही पटा होगा।

हाल ही में जीन संवर्धित मक्‍के की खेती पर जर्मनी में रोक लगा दी गयी है। मोन 810 (MON810) नामक मोंसैंटो (Monsanto) कंपनी के जिस मक्‍के पर यह कार्रवाई हुई, उसकी खेती पर यूरोपीय संघ के पांच अन्‍य देशों फ्रांस, आस्ट्रिया, हंगरी, ग्रीस और लक्‍जेमबर्ग पर पहले से ही रोक लगी हुई थी। यूरोप में पशु चारे के लिए इस मक्‍के की खेती होती थी। आस्ट्रिया में मोंसैंटो के ही एक अन्‍य जीन संवर्धित मक्‍के मोन 863 (MON863) के आयात पर भी प्रतिबंध लगा हुआ है। जीएम मक्‍के की इस किस्‍म की अमेरिका व कनाडा में खेती होती है।

हालांकि भारत की सरकार और उसकी संस्‍थाएं जीन संवर्धित फसलों के प्रति सहिष्‍णु रवैया अपनाए हुए हैं। भारत में मोंसैंटो के आंशिक स्‍वामित्‍व वाली कंपनी माहीको (Mahyco) के जीन संवर्धित बीटी कपास का बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उत्‍पादन हो रहा है तथा बीटी बैगन के वाणिज्यिक उत्‍पादन की तैयारी भी अंतिम चरण में है। जिन फसलों से जीव व पर्यावरण को होनेवाली क्षति को देखेते हुए यूरोप में प्रतिबंधित किया जा रहा है, उनके प्रति भारत के रवैये का एक नमूना तमिलनाडु कृषि विश्‍वविद्यालय के अधिकृत बयान में देखा जा सकता है। संस्‍था के रजिस्‍ट्रार ने जीन संवर्धित मक्‍का को परंपरागत मक्‍का की किस्‍मों की तुलना में वरदान मानते हुए कहा है कि यह नुकसानदेह नहीं है। देश में जैव प्रौद्योगिकी का नियमन करनेवाली शीर्ष संस्‍था जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) है जो केन्‍द्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय के अधीन काम करती है। लेकिन वह जीन संवर्धित फसलों से पर्यावरण व मानव स्‍वास्‍थ्‍य को होनेवाली क्षति वाले पहलू पर गंभीरता से विचार करते नहीं जान पड़ती। खुद तत्‍कालीन केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री अंबुमणि रामदास ने कुछ माह पूर्व जीन संवर्धित फसलों का विरोध करते हुए कहा था कि बीटी बैगन को इसकी सुरक्षा पर बिना पर्याप्‍त शोध किए भारत में लाया गया है।

जाहिर है हमारी सरकारी संस्‍थाएं जीन संवर्धित फसलों के प्रति सहिष्‍णु बनी हुई हैं। बहरहाल हम जर्मन कृषि मंत्री सुश्री इल्‍जे आइगनर को जीएम मक्‍के की खेती पर प्रतिबंध के उनके साहसिक निर्णय के लिए धन्‍यवाद देते हुए यह सोचकर हैरान-परेशान हैं कि हमारे मंत्री इस तरह का फैसला क्‍यों नहीं कर पाते!

Wednesday, April 15, 2009

जीन संवर्धित मक्‍के की खेती पर जर्मनी में लगी रोक


पर्यावरण पर खतरे से चिंतित लोगों को यह जानकर खुशी हो सकती है कि जर्मनी में जीन संवर्धित मक्‍के की खेती पर रोक लगा दी गयी है। यह रोक विख्‍यात अमेरिकी बायोटेक कंपनी मोंसैंटो (Monsanto) के जीन संवर्धित मक्के मोन 810 (MON810) की खेती पर लगायी गयी है। बताया जाता है कि मोन 810 में इस तरह का जीन डाला गया है जो पौधे को नुकसान पहुंचानेवाले कीड़े कॉर्नबोरर को मारने के लिए विष का काम कर सके।

मोन 810 की खेती पर रोक लगानेवाला जर्मनी यूरोपीय संघ का छठा देश है। फ़्रांस, ऑस्ट्रिया, हंगरी, ग्रीस और लक्ज़ेमबर्ग में पहले से ही इसकी खेती पर रोक लगी हुई है। इसके अलावा ऑस्ट्रिया में मोंसैंटो के ही जीन संवर्धित मक्‍का मोन 863 (MON863) के आयात पर भी प्रतिबंध लगा हुआ है। इस फैसले का महत्‍व इसलिए और अधिक बढ़ जाता है क्‍योंकि मोन 810 ऐसी एकमात्र जीन संवर्धित फसल है, जिसकी यूरापीय संघ में वाणिज्यिक तौर पर खेती हो रही है। वहां पर इसकी खेती मुख्‍य रूप से पशु चारे के लिए की जाती है। यूरोपीय संघ में इसकी खेती का दस सालों का लाइसेंस समाप्‍त होनेवाला है और अब उसके नवीकरण की जरूरत पड़ेगी।

जर्मन कृषिमंत्री इल्जे आइगनर ने मोन 810 की खेती पर प्रतिबंध के अपने फ़ैसले की वजह बताते हुए कहा है कि इस बात का संदेह है कि जीन परिवर्तित मक्का दूसरे प्राणियों को नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि उन्‍होंने दावा किया कि उनका फैसला विज्ञान पर आधारित है और इसका अभिप्राय सभी तरह के जीन संवर्धित फसलों पर प्रतिबंध नहीं है। सुश्री आइगनर ने कहा कि जीन अभियांत्रिकी में मनुष्‍य, जानवर, पौधों व पर्यावरण की सुरक्षा की संपूर्ण गारंटी समावेशित होना जरूरी है।

मोंसैंटो कंपनी द्वारा तैयार किए गए इन जीन परिवर्तित (gnentically engineered) मक्‍के की किस्‍मों के बारे में पर्यावरणवादियों का कहना है कि ये पर्यावरण, मिट्टी, मानव स्‍वास्‍थ्‍य व वन्‍य प्राणियों के लिए नुकसानदेह हैं। उनका कहना है कि इनकी वजह से अन्‍य फसलें भी प्रदूषित हो जाएंगी, जिससे पर्यावरण व मानव स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरा उत्‍पन्‍न हो जाएगा। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि चूहों पर किए गए परीक्षणों में इस मक्‍का के खाने से उनकी रक्‍त-सरंचना में परिवर्तन, जनन क्षमता में ह्रास और लीवर व किडनी जैसे आंतरिक अंगों को क्षति पहुंचने की बात सामने आयी है। कहा जा रहा है कि मोंसैंटो के जीएम मक्‍के की इन किस्‍मों में डाले गए जीन की वजह से जो कीटनाशी विष तैयार होता है, वह मिट्टी में रिसकर केंचुआ जैसे मृदा स्‍वास्‍थ्‍य के लिए उपयोगी जीवों को हानि पहुंचाता है। इसके अतिरिक्‍त उसकी वजह से तितली, मकड़ी, चींटी आदि वन्‍य जीवों को भी नुकसान होता है।

ग्रीनपीस जैसे कई पर्यावरणवादी संगठन जीन परिवर्धित मक्‍के की इन किस्‍मों की खेती और इनके आयात पर प्रतिबंध की अरसे से यूरोप में मांग करते रहे हैं।

Saturday, September 27, 2008

जीएम फूड : दाने दाने पर लिखा होगा बनानेवाले का नाम


दाने दाने पर लिखा है, खानेवाले का नाम। यह कहावत आपने जरूर सुनी होगी। लेकिन अब हमें उस समय के लिए तैयार रहना चाहिए, जब कहना पड़े, 'दाने दाने पर लिखा है, बनानेवाले का नाम।' हाल के वर्षों में मोंसैंटो, सिनजेंटा, बीएएसएफ आदि जैसी बहुराष्‍ट्रीय निजी कंपिनयों द्वारा तैयार जीन संवर्धित (Genetically Modified) बीजों का दबदबा जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उसका यही निहितार्थ है।

जीएम पौधों का उत्‍पादन जेनेटिक इंजीनियरिंग विधि से किया जाता है। इसमें आनुवांशिक सामग्री मिलाकर फसल के गुण बदलते हैं। जींस के हस्‍तांतरण का यह कार्य प्रयोगशाला में होता है। उसके बाद उस फसल की प्रायोगिक खेती (Field Trials) कर उसे परखा जाता है। तत्‍पश्‍चात व्‍यापारिक रूप से फसल का उत्‍पादन किया जाता है।

जीएम फूड की स्‍वीकार्यता को लेकर दुनिया भर में विवाद रहा है। जीन का हस्‍तांतरण प्रकृति के विधान के विरुद्ध कार्य है तथा जरूरी नहीं कि इसके परिणाम अच्‍छे ही हों। इसको लेकर अनेक लोगों की नैतिक और धार्मिक आपत्तियां रहती हैं। खासकर शाका‍हारियों को आशंका रहती है कि इस भोजन में मानव व पशु जीन न हों। पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पर जीएम फसलों के साइड इफेक्‍ट होने की खबरें भी आती रहती हैं। वैसे भी निजी कंपनियों का मुख्‍य उद्देश्‍य मुनाफा होता है तथा इसके लिए वे बहुत सी अनुचित बातों को नजरअंदाज कर सकती हैं। इन कंपनियों पर भारत जैसे गरीब देशों में चोरी-चुपके फील्‍ड ट्रायल करने के आरोप भी लगते रहे हैं।

अभी तो एशियाई देशों खासकर भारत में पारंपरिक फसलों का महत्‍व बरकरार है। लेकिन भारत में भी मोनसेंटो और महीको (महाराष्‍ट्र हाइब्रिड सीड कंपनी) कंपनियों के बीटी (बैसिलस थ्यूरेनजिएन्सिस) कपास बीज तमाम विरोध के बावजूद देश के कई हिस्‍सों में उगाए जा चुके हैं और उनके रकबे में लगातार विस्‍तार हो रहा है। यही नहीं, बीटी बैगन जैसे कई अन्‍य जीन संवर्धित फसलों की प्रायोगिक खेती शुरू हो चुकी है और अगले वर्ष से उन्‍हें बाजार में व्‍यावसायिक तौर पर उपलब्‍ध कराए जाने की योजना है।

जीएम सीड के बढ़ते हुए दबदबे का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके कारोबार में लगी अमरीकी कंपनी मोनसेंटो, यूरोपीय कंपनी सिनजेंटा तथा जर्मन कंपनी बीएएसएफ ने पिछले वर्ष अरबों रुपये डॉलर का मुनाफा बटोरा। कुछ साल पहले तक विश्‍वव्‍यापी विरोध के कारण मोंसैंटो को जहां वर्ष 2003 में 2 करोड़ 30 लाख डालर का घाटा उठाना पड़ा था, उसीने वर्ष 2007 में एक अरब डॉलर का मुनाफा कमाया। यूरोप की जिनसेटा ने बीते वर्ष एक अरब 10 करोड़ डॉलर का शुद्ध लाभ अर्जित किया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 75 फीसदी अधिक रहा। इन कंपनियों के बीज आज पराग्वे से लेकर चीन तक और भारत से लेकन अर्जेंटीना तक धड़ल्ले से बिक रहे हैं।

भारत में घाटे का सौदा हो चुकी खेती के भंवरजाल में फंसे किसानों को जीन संवर्धित हाइब्रिड बीज काफी लुभा रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों द्वारा भी कहा जा रहा है कि कृषि उपज वृद्धि में आ चुके ठहराव को हाइब्रिड बीज ही गति दे सकते हैं। विश्‍वव्‍यापी खाद्य संकट ने भी जीन संवर्धित फसलों की स्‍वीकार्यता की राह आसान बनायी है।

जीएम फसल जब अधिक उपज देंगे तो कोई भी किसान गैर-जीएम पारंपरिक फसल नहीं उगाना चाहेगा। भविष्‍य में यह भी हो सकता है कि जीएम फसलों के अपमिश्रण से पारंपरिक फसल दूषित होकर विलुप्‍त हो जाएं। चूंकि जीएम बीजों के उत्‍पादन का करीब सारा कारोबार निजी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है, इसलिए वह दिन दूर नहीं जब हमारे भोजन के हरेक दाने पर किसी न किसी बहुराष्‍ट्रीय कंपनी का नाम लिखा हो। यह भी संभव है कि तब हम फसलों को धान, गेहूं, अरहर, आलू, बैंगन, कपास जैसे उनके पारंपरिक नामों के बजाय ब्रांडनेम (पेप्‍सी व कोकाकोला की तरह) से जानें।

(फोटो बीबीसी हिन्‍दी से साभार)