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Wednesday, September 22, 2010

तब गुड़ गोबर नहीं, गोबर सोना हो जाएगा!

‘गुड़ गोबर होना’ तो सुना जाता है, लेकिन गोबर सोना हो जाए तो फिर क्‍या कहना। और सच्‍ची बात तो यह है कि दुनिया में कुछ लगनशील लोग गोबर को सोना बनाने के बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं। सोने में सुहागे वाली बात है कि उन लोगों में मशहूर आईटी कंपनी एचपी भी शामिल है।

अमेरिका के एरिजोना प्रांत के फीनिक्‍स नगर में इस साल मई माह में टिकाऊ ऊर्जा पर हुए अमेरिकन सोसाइटी ऑफ मेकेनिकल इंजीनियर्स के अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में एचपी ने एक शोधपत्र के जरिए दर्शाया कि गाय के गोबर से डेटा सेंटर चलाए जा सकते हैं। इस शोध के मुताबिक दस हजार गायों वाले डेयरी फार्म से हर साल करीब दो लाख मीट्रिक टन गोबर का खाद तैयार होता है। इस क्रम में एक मेगावाट बिजली का उत्‍पादन हो सकता है। इससे मझोले आकार वाले एक डेटा सेंटर की ऊर्जा संबंधी जरूरतें तो पूरी होंगी ही, अतिरिक्‍त ऊर्जा से खुद डेयरी फार्म का काम भी चल जाएगा।

शोध से जाहिर है कि डेयरी फार्म और डेटा सेंटर एक-दूसरे के बहुत अच्‍छे पूरक साबित हो सकते हैं। जब गोबर सड़कर खाद बनता है तो बड़ी मात्रा में मीथेन नामक ग्रीनहाउस गैस निकलता है, जो पर्यावरण के लिए कार्बन डाई आक्‍साईड से भी अधिक नुकसानदेह होता है। उधर आधुनिक डेटा सेंटरों को काफी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होती है। यदि डेयरी फार्म के मीथेन गैस से ऊर्जा तैयार की जाए, तो पर्यावरण सुरक्षित रहेगा ही, डेटा सेंटर केलिए टिकाऊ ऊर्जा भी उपलब्‍ध हो जाएगी।

वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत के रूप में गोबर का उपयोग नयी बात नहीं है। हमारे गांवों में कहीं-कहीं छोटे गोबर गैस संयत्र मिल जाएंगे, जिनसे खेतों के लिए खाद मिल जाता है और घर का अंधेरा दूर करने के लिए बिजली। लेकिन एक सुस्‍पष्‍ट नीति के तहत इसे बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है। जब एचपी गोबर से डेटा सेंटर चलाने की पहल कर सकती है, तो हम इससे गांवों का अंधेरा दूर करने के बारे में क्‍यों नहीं सोच सकते। यदि ऐसा हो, तो गोबर सोना ही बन जाएगा। तब हमारे यहां अधिक दूध होगा, अधिक जैविक खाद होंगे, अधिक बिजली होगी, और हम ओजोन परत को भी कम नुकसान पहुंचाएंगे।

Wednesday, August 19, 2009

सम्‍मान उस क्रांति का जो शौचालयों के जरिए आयी!

भारत में अनेक बड़े राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक व आर्थिक परिवर्तनों का सूत्रपात बिहार से हुआ है। लेकिन मौजूदा बिहार में वैसे नवाचारों की कल्‍पना नहीं की जाती। इसलिए बिहारी मिट्टी से जन्‍मा कोई शख्‍स शौचालय जैसी तुच्‍छ चीज के जरिए संभावनाओं का सूर्योदय करा डाले तो बात गौर करने की जरूर है। जी हां, हम बात कर रहे हैं बिन्‍देश्‍वर पाठक की, जिन्‍होंने भारत में सुलभ शौचालय के जरिए एक ऐसी क्रांति लायी, जिसने बहुतों की जिंदगी बदल दी। उनके बनाए सुलभ शौचालयों में जहां भंगियों को रोजगार मिला और सिर पर मैला ढोने के अमानवीय यंत्रणा से उन्‍हें मुक्ति मिली, वहीं ये शौचालय स्‍वच्‍छता के साथ गैर पारंपरिक उर्जा उत्‍पादन के भी स्रोत बने।

इन दिनों स्‍टॉकहोम में विश्‍व जल सप्‍ताह मनाया जा रहा है, जहां भारत के बिन्‍देश्‍वर पाठक को विश्‍व जल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया जा रहा है। निश्चित तौर पर यह सम्‍मान उस क्रांति का भी है, जो शौचालयों के जरिए आयी। बिन्‍देश्‍वर पाठक को भारत में शौचालय क्रांति का जनक माना जाता है। उनकी यह टिप्‍पणी सोचने लायक ही है, ‘’टॉयलेट सोचने की जगह है। हम वहां बैठ सकते हैं और अपने सवालों के जवाब सोच सकते हैं। बैठते हुए हम नीचे की ओर देखते हैं, सोचने के लिए यह सबसे अच्छी पॉज़िशन है। टॉयलेटों में कितनी समस्याओं के समाधान मिल जाते हैं।"

बिन्‍देश्‍वर पाठक का जन्‍म 1943 में बिहार में हुआ था। उन्‍होंने पटना विश्‍वद्यालय से 1964 में समाजशास्‍त्र में ग्रेजुएशन किया। अपने काम की शुरुआत उन्‍होंने 1970 में की और फिर उनके संगठन ने सस्ते और सुलभ शौचालय बनाना शुरू किया। आज सुलभ इंटरनैशनल के सौजन्य से 12 लाख घरों में रह रहे लोग स्वच्छ जीवन का आनंद ले रहे हैं और 7 हज़ार से ज्यादा सार्वजनिक शौचालयों के जरिए चलते-फिरते लोगों की परेशानी भी दूर की जा सकी है। नई दिल्ली में एक ख़ास टॉयलेट संग्रहालय भी खोला गया है। इसमें पाठक का बनाया पहला शौचालय भी देखा जा सकता है।

बिन्‍देश्‍वर पाठक कहते हैं, "जो टॉयलेट मैंने सबसे पहले बनाया था, वह मेरे लिए सबसे दिलचस्प है। क्योंकि मैंने इससे पहले फ़्लश वाले टॉयलेट का इस्तेमाल नहीं किया था। जब मैं गांव में रहता था, तब हम खेतों में जाते थे। और फिर शहर में साधारण लैट्रीन में। जब मैंने पहली बार सुलभ टॉयलेट बनाया और उसे खुद इस्तेमाल किया, तो मुझे बड़ी ख़ुशी हुई।"
उनके संगठन ने न केवल दस्त जैसी बीमारियों की रोकथाम करने में मदद की है, बल्कि सामाजिक रूप से मैला ढोने के लिए मजबूर कई लोगों की ज़िंदगियों को बदल डाला। विश्व जल सप्ताह की निर्देशक सीसीलिया मार्टिनसेन का कहना है कि बिंदेश्वर पाठक की वजह से मानवीय मल को किस तरह संभाला जा सकता है, यह सवाल विश्व एजेंडे में शामिल हुआ।

Friday, July 17, 2009

वो जो चाहेंगे, आप खाएंगे... वो जो चाहेंगे, किसान उगाएंगे... आप खेत और पेट की गुलामी को तैयार तो हैं !

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने संसद में एक सवाल के जवाब में बताया कि अगले तीन सालों के अंदर देश में जीन संवर्धित टमाटर, बैगन और फूलगोभी की खेती आरंभ कर देने की योजना है। पूरी खबर यहां है और यह रही इस संबंध में सरकार की प्रेस विज्ञप्ति। भारत सरकार की नीति-रीति से तो सभी परिचित हैं, लेकिन इस महत्‍वपूर्ण खुलासे की जैसी प्रतिक्रिया मीडिया में होनी चाहिए थी, महसूस नहीं की गयी। शायद हमारे अंदर भ्रष्‍टाचार की तरह प्रकृति-विनाश के प्रति भी तटस्‍थ रहने का सामर्थ्‍य विकसित हो चुका है।

अजीब बात है कि जहां यूरोप और अमेरिका में प्रकृति की ओर लौटने की चाहत देखने को मिल रही है, भारत में इसके विनाश की कवायद चल रही है। कुछ समय पहले जर्मनी में जीन संवर्धित मक्‍के की खेती पर रोक लगा दी गयी। चंद रोज पहले आस्‍ट्रेलिया के न्‍यू साउथ वेल्‍स प्रांत की सरकार द्वारा बोतलबंद पानी की सरकारी खरीद पर रोक लगायी गयी। हाल ही में अमेरिका के फ्लोरिडा प्रांत में शहद के प्राकृतिक स्‍वरूप को बरकरार रखने के लिए कानून बनाए गए हैं, जिसके तहत उसमें किसी भी तरह की मिलावट पर दंड का प्रावधान किया गया है। लेकिन पुण्‍यसलिला गंगा के देश में तो उलटी गंगा ही बहती है।

सवाल यह उठता है कि आखिर किसके फायदे के लिए भारत की सरकार जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती देश में आरंभ करने की जल्‍दबाजी में है। कृषि और किसानों का तो इसमें कोई भला नहीं। इनमें बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस (Bacillus thuringiensis) जैसी बैक्‍टीरिया के जीन डाले गए तो खानेवालों के लिए ये जहर का काम ही करेंगी। जहां तक भारतीय किसानों की बात है तो वे बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों का बीज खरीदने में बरबाद ही हो जाएंगे। अभी घर में बचाकर रखे बीज से उनका काम चल जाता है, लेकिन जीएम बीज हर साल खरीदना पड़ेगा, वह भी मौजूदा कीमतों से करीब बीस-तीस गुना अधिक कीमत पर। यह भी कुप्रचार ही है कि जीएम बीज से उपज में भारी वृद्धि होती है। यदि उपज में थोड़ी बहुत बढ़ोतरी होती भी हो तो उससे होनेवाली कमाई से अधिक पैसा महंगा बीज खरीदने में लग जाता है। मानसून पर निर्भर खेती करनेवाले भारतीय किसान पूरी पूंजी महंगा बीज खरीदने में ही लगा देंगे तो मौसम के दगा देने पर गले में फंदा डालने के सिवाय उनके पास कोई विकल्‍प नहीं बचेगा। कृषि को जो नुकसान पहुंचेगा उसकी कल्‍पना ही भयावह है। सृष्टि की वह रचना जो खेतों में हरियाली लाती है और मानव शरीर व मस्तिष्‍क का पोषण करती है, चंद बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की मुट्ठी में कैद हो जाएगी। जो सरकार इस अपूरणीय क्षति की भरपाई नहीं कर सकती, इसकी राह आसान करने का नैतिक अधिकार उसे कहां से मिल गया ?

सच तो यह है कि जीन संवर्धित फसलों के मूल स्रोत अमेरिका में भी अभी तक सोयाबीन और मक्‍का ही ऐसी खाद्य फसलें हैं, जिनकी जीन संवर्धित किस्‍मों को मंजूरी दी गयी है। वहां भी इन दोनों फसलों का अधिकांश उपयोग जानवरों के चारे के रूप में होता है। यूरोपीय संघ में अभी तक सिर्फ मोंसैंटो के जीएम मक्‍का प्रभेद मोन 810 की खेती की अनुमति है। उसमें भी जर्मनी, फ़्रांस, ऑस्ट्रिया, हंगरी, ग्रीस और लक्ज़ेमबर्ग जैसे उसके सदस्‍य देखों ने उसकी खेती पर रोक लगा रखी है। जाहिर है कि यदि जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती भारत में आरंभ करने की सरकार की योजना अमल में आती है तो इन अप्राकृतिक फसलों के लिए प्रयोगशाला के चूहे करोड़ों भारतवासी ही बनेंगे।

ध्‍यान देने योग्‍य बात यह भी है कि जीन संवर्धित फसलें हमारी आर्थिक गुलामी का मार्ग प्रशस्‍त करेंगी। जीएम बीजों के उत्‍पादन और विक्रय का समूचा कारोबार मोंसैंटो, सिनजेंटा, बायर, बीएएसएफ आदि जैसी कुछ बड़ी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है। वे बाजार पर अपने एकाधिकार को सुनिश्चित करने के लिए फसलों की जीन-सरंचना के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ से नहीं चूकेंगी। देश में एक बार जीएम खाद्य फसलों की खेती शुरू हुई तो बीज के लिए बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों पर पूरी तरह से निर्भर होने में हमें देर नहीं लगेगी। तब क्‍या करेंगे मनमोहन, सोनिया, पवार, प्रवण व चिदंबरम जब बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां अचानक अपने बीजों की आपूर्ति रोक दें ? जीन संवर्धित फसलों की देश में बहुतायत होने पर हमारा कृषि निर्यात भी बुरी तरह से प्रभावित होगा।

आदमी की पहली जरूरत उसकी भूख से जुड़ी होती है। जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती से हमारे खेत ही नहीं, पेट भी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की मर्जी का गुलाम हो जाएगा। ईस्‍ट इंडिया कंपनी भी एक दिन इस देश में व्‍यापार करने ही आयी थी और लालची व गद्दार लोगों की मदद से पूरी कौम को गुलाम बना डाला। जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती के जरिए भी इसी तरह की गुलामी की पृष्‍ठभूमि तैयार हो रही है। हम भारतवासियों के पास अब दो ही विकल्‍प हैं – औपनिवेशिक साम्राज्‍यवाद के इस नए रूप को पहचानें या अपने खेत व पेट की जरूरतों को मुट्ठी भर बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की इच्‍छा का गुलाम बनाने को तैयार रहें।

(फोटो यहां से साभार लिया गया है।)

Monday, July 13, 2009

फिलीपीन्‍स की सड़कों पर चल रही इन बांस की टैक्सियों को तो देखिए !

क्‍या आप ने कभी सोचा है कि बांस से कार या टैक्‍सी भी बन सकती है? नीचे के छायाचित्रों को देखिए। इन टैक्सियों का 90 फीसदी हिस्‍सा बांस का है और ये नारियल से तैयार बायोडीजल पर चलती हैं। इन्‍हें ईको टैक्‍सी (ECO taxis) नाम दिया गया है तथा फिलहाल इनके दो मॉडल तैयार किए गए हैं : ईको 1 और ईको 2 । ईको 1 में 20 आदमी बैठ सकते हैं। एक गैलन बायोडीजल में यह आठ घंटे तक चलती है। ईको 2 भी एक गैलन बायोडीजल में आठ घंटे चलती है, हालांकि इसमें 8 आदमी ही बैठ सकते हैं। वैसे ईको 2 में स्‍टीरियो साउंड सिस्‍टम भी है।

दरअसल ये बांस की टैक्सियां फिलीपीन्‍स के टाबोंटाबोन शहर के मेयर रूस्टिको बाल्‍डेरियन के सोच की उपज हैं, जिन्‍होंने शहरवासियों की जरूरतों को ध्‍यान में रख इन्‍हें तैयार कराया। धान की खेती के लिए जाने जानेवाले इस छोटे-से शहर में लोगों के आवागमन का मुख्‍य साधन मोटरसाइकिलें हैं। भाड़े के वाहनचालक पांच-छह लोगों को बैठाकर मोटरसाइकिलें चलाते हैं, जो असुविधाजनक और खतरनाक दोनों है। आवागमन के साधन के रूप में इन मोटरसाइकिलों के विकल्‍प के तौर पर बांस की टैक्सियों को तैयार किया गया है। इनकी लागत तो कम है ही, ये सुरक्षित और पर्यावरण हितैषी (eco friendly) भी हैं। बांस तेजी से नवीनीकरण होने योग्‍य वस्‍तु है तथा स्‍थानीय तौर पर प्रचुरता में उपलब्‍ध है। बांस काफी लचीला होता है और इस दृष्टि से इसकी मजबूती भी कम नहीं आंकी जा सकती। सबसे महत्‍वपूर्ण बात है कि इन टैक्सियों को स्‍थानीय स्‍तर पर पर स्‍थानीय सामग्री से स्‍थानीय युवकों ने तैयार किया है।







यदि संबंधित खबर को अंग्रेजी में पढ़ना चाहते हों तो इन कडियों पर जाएं : TOTI Eco और Inhabitat.

Saturday, July 11, 2009

बुंडानून : आस्‍ट्रेलियाई शहर जिसने दुनिया में पहली बार लगाया बोतलबंद पानी पर प्रतिबंध, प्रांतीय सरकार ने भी खरीद की मनाही की।

आज हम आस्‍ट्रेलिया के ग्रामीण इलाके के उस छोटे-से शहर के बारे में बात करेंगे, जो अपने पर्यावरण हितैषी निर्णय के कारण दुनिया भर में सामुदायिक चेतना का मिसाल बन गया है। मात्र ढाई हजार लोगों की आबादी वाले इस कस्‍बाई शहर के बाशिंदों ने आपसी एकजुटता से ऐसा निर्णय लिया कि पर्यावरण की दुनिया में एक नयी क्रांति का सूत्रपात हुआ है।

जनसंख्‍या की दृष्टि से वहां के सबसे बड़े प्रांत न्‍यू साउथ वेल्‍स के कस्‍बाई शहर बुंडानून के निवासियों ने फैसला किया है कि शहर की दुकानों पर बोतलबंद पानी नहीं बेचा जाएगा और वहां आनेवाले बाहरी लोगों को भी इनका इस्‍तेमाल नहीं करने के लिए प्रोत्‍साहित किया जाएगा। बोतलबंद पानी के स्‍थान पर नगर की दुकानों पर अब दुबारा इस्‍तेमाल हो सकने योग्‍य बोतल बेचा जाएगा, जिस पर बुंडी ऑन टैप लेबल लगा होगा। इस बोतल में सड़क पर लगे सार्वजनिक नलों या फिल्‍टर्ड वाटर के स्रोतों से नि:शुल्‍क पानी भरा जा सकेगा। विदित हो कि बुंडानून को बोलचाल में संक्षेप में बुंडी नाम से पुकारा जाता है।

करीब 2500 लोगों की आबादी वाले इस प्राकृ‍तिक सुंदरता से भरपूर ग्रामीण नगर के करीब 250-300 नागरिक वहां के टाउन हॉल में चंद रोज पहले रात्रि में इकट्ठा हुए और प्रचंड बहुमत से नगर में बोतलबंद पानी पर प्रतिबंध का निर्णय लिया। सिर्फ दो आदमियों ने इनके पक्ष में मतदान नहीं किया, जिनमें एक स्‍थानीय नागरिक और एक बोतलबंद पानी बनानेवाली कंपनी का प्रतिनिधि था। आस्‍ट्रेलिया में यह अपने तरह की पहली घटना तो है ही, माना जा रहा है कि दुनिया में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी शहर ने बोतलबंद पानी पर प्रतिबंध लगाया है। जनमत के इस अभूतपूर्व निर्णय ने वहां एक आंदोलन का रूप धारण कर लिया है, जिसे बुंडी ऑन टैप कहा जा रहा है। इस फैसले से शहर के दुकानदारों को आर्थिक क्षति होनेवाली है, लेकिन पर्यावरण के हित को देखते हुए वे इसे अंजाम देने पर एकजुट हैं।

बताया जाता है कि नोर्लेक्‍स नामक एक कंपनी द्वारा वहां पानी निकालने वाला प्‍लांट लगाने की योजना बनायी जा रही थी। इस घटना ने लोगों को पर्यावरण के प्रति सचेत करने में उत्‍प्रेरक का काम किया। शहरवासियों को यह बात नागवार गुजरी कि उनका ही पानी सिडनी में बोतलबंद कर उन्‍हें ही बेचा जाए।

एक छोटे ग्रामीण शहर का यह आंदोलन कितना महत्‍व का है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि न्‍यू साउथ वेल्‍स की प्रांतीय सरकार ने भी सरकारी विभागों व एजेंसियों पर बोतलबंद पानी खरीदने से रोक लगा दी है। भारतीय मीडिया ने इस खबर को महत्‍व भले न दिया हो, लेकिन पाश्‍चात्‍य मीडिया ने इसे प्रमुखता से कवर किया। इससे संबंधित खबर को यदि आप अंग्रेजी में पढ़ना चाहें तो यह बीबीसी, एबीसी, टाइम्‍स ऑनलाइन, रायटर्स एलर्टनेट व कई अन्‍य साइटों पर उपलब्‍ध है।

Monday, June 22, 2009

आपके दरवाजे पर दस्‍तक दे चुका है ग्‍लोबल वार्मिंग !

हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो जलवायु परिवर्तन को पश्चिमी दुनिया द्वारा खड़ा किया गया हौवा मानते हैं। लेकिन मैं इसे अपने घर की चौखट पर महसूस कर रहा हूं। मेरे खेत, मेरा गांव, मेरा परिवेश सब इसके भुक्‍तभोगी और गवाह हैं। जून के महीने में इतनी गर्मी मैंने पहले कभी महसूस नहीं की। दिन के दस बजे ही धूप में नंगे पैर चलने पर तलवे जलने लगे हैं। देर शाम तक लू चल रही है। ताल, तलैये सब सूख गए हैं, कहीं पानी नहीं। पिछले करीब आठ महीने से अभी तक एक बार भी हमारे इलाके में धरती तर होने भर बारिश नहीं हुई है। अब और कैसी होगी ग्‍लोबल वार्मिंग ? जलवायु परिवर्तन इसे नहीं तो किसे कहेंगे ? ग्‍लोबल वार्मिंग को दूर की कौड़ी समझनेवाले लोगों को अब समझ लेना चाहिए कि यह हमारी देहरी पर कदम रख चुका है।

जैसा कि नाम से ही स्‍पष्‍ट है ग्‍लोबल वार्मिंग या भूमंडलीय उष्‍मीकरण धरती के वातावरण के तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी को कहते हैं, जिसके फलस्‍वरूप जलवायु में परिवर्तन हो रहा है। ऐसा धरती के वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों का घनत्‍व बढ़ने, ओजोन परत में छेद होने और वन व वृक्षों की कटाई की वजह से हो रहा है।

वायुमंडल में मौजूद कार्बन डायआक्साइड, मिथेन, नाइट्रोजन आक्साइड आदि जैसी ग्रीनहाउस गैसें धरती से परावर्तित होकर लौटनेवाली सूर्य की किरणों को रोक कर धरती का तापमान बढ़ाती हैं। वाहनों, हवाई जहाजों, बिजली उत्‍पादन संयंत्रों, उद्योगों इत्यादि से अंधाधुंध गैसीय उत्सर्जन के चलते वायुमंडल में कार्बन डायआक्साइड में वृद्धि हो रही है। पेड़-पौधे कार्बन डाइआक्‍साइड को अवशोषित करते हैं, लेकिन उनकी कटाई की वजह से समस्‍या गंभीर होती जा रही है। इसके अलावा जैसा कि वैज्ञानिक कहते हैं कि धरती के ऊपर बने ओजोन परत में एक बड़ा छिद्र हो चुका है जिससे पराबैंगनी किरणें (ultra violet rays) सीधे धरती पर पहुंच कर उसे लगातार गर्म बना रही हैं। ओजोन परत सूर्य से निकलने वाली घातक पराबैंगनी किरणों को धरती पर आने से रोकती है। यह सीएफसी की वजह से नष्‍ट हो रही है जिसका इस्‍तेमाल रेफ्रीजरेटर , अग्निशामक यंत्र इत्यादि में होता है।

बताया जाता है कि ग्‍लोबल वार्मिंग की वजह से धरती पर मौजूद बर्फ और ग्‍लेशियर के पिघलने से समुद्री जल स्‍तर बढ़ जाएगा, जिससे तटीय क्षेत्र जलमग्‍न हो जाएंगे। जलवायु परिवर्तन की वजह से रेगिस्‍तान का विस्‍तार भी बढ़ेगा। हालांकि इसका सबसे त्‍वरित और तात्‍कालिक कुपरिणाम बढ़ते हुए तापमान के कारण महामारी, सूखा, बाढ़, दावानल, पेयजल संकट जैसी विपदाओं के रूप में सामने आनेवाला है। ज्यादा गर्म तापमान वाले विश्व में मलेरिया, यलो फीवर जैसी बीमारियां तेजी से फैलेगी, साथ ही कई नयी संक्रामक बीमारियां भी पैदा होंगी। बढ़ते तापमान के कारण हमारे उपजाऊ इलाके कृषि या पशुचारण के योग्य नही रहेंगे, इससे दुनिया की आहार आपूर्ति को खतरा हो सकता है।

भारत में तो जलवायु परिवर्तन की विभीषिका शुरू भी हो गयी है और मुझे इस बात में तनिक भी संदेह नहीं कि इसकी सबसे अधिक पीड़ा हम भारतीय ही भोगने जा रहे हैं। एक अरब से अधिक की आबादी वाले जिस देश में अधिकांश लोगों के लिए रोटी, कपड़ा और मकान आज भी समस्‍या है, आग उगलती धरती के स्‍वाभाविक शिकार वही लोग होंगे। हमारी दृढ़ मान्‍यता है कि प्रकृति अपना न्‍याय जरूरी करती है। भारतवासियों को बगानों, वृक्षों व ताल-तलैयों को नष्‍ट करने की कीमत धरती की आग में जलकर चुकानी होगी। मानसून में विलंब होने भर से पेयजल और सिंचाई के लिए यहां किस तरह हाहाकार मच गया है, यह गौर करने की बात है।

यदि आपको अब भी अपनी चौखट पर जलवायु परिवर्तन की आहट सुनाई नहीं देती तो अपने वातानुकूलित घर से बाहर निकलें और नंगे पांव चार कदम शुष्‍क धरती पर चलें, या फिर इन खबरों का संदेश समझें :
>> मुंबई की झीलों में सप्‍लाई के लिए सिर्फ महीने भर का पानी, पेयजल आपूर्ति में 20 फीसदी कटौती की गयी
>> छत्‍तीसगढ़ सरकार ने गर्मी व पेयजल संकट से स्‍कूलों की छुट्टियां बढ़ायीं
>> इंदौर में बारिश के लिए जिंदा इंसान की शवयात्रा निकाली
>> वर्षा के लिए नागपुर में मेढ़कों का विवाह

Saturday, June 13, 2009

बिहारी कंपनी समेत तीन भारतीय परियोजनाओं को ग्‍लोबल ग्रीन एनर्जी अवार्ड

बिहार की एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी सहित भारत में अपनी परियोजनाओं पर काम कर रहे तीन संगठनों को वर्ष 2009 के लिए अक्षय ऊर्जा के प्रतिष्ठित ऐशडेन अवार्ड (Ashden Awards) से सम्‍मानित किया गया है। स्‍थानीय समुदायों के बीच नवीकरण योग्‍य ऊर्जा के क्षेत्र में इनके योगदान के लिए गुरुवार की शाम लंदन में प्रिन्‍स चार्ल्‍स ने बिहार के सारन रिन्‍युएबल एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड और फ्रांसीसी एनजीओ जीइआरइएस (GERES) को हरेक को बीस हजार पौंड, जबकि इंटरनेशनल डेवलपमेंट इंटरप्राइजेज इंडिया (IDEI) को पंद्रह हजार पौंड के पुरस्‍कार प्रदान किए।

ऐशडेन पुरस्‍कारों को ग्‍लोबल ग्रीन एनर्जी अवार्ड अथवा ग्रीन ऑस्‍कर भी कहा जाता है।

बिहार के सारन रिन्‍युएबल एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को प्रतिदिन 11 घंटे बिजली प्रदान करनेवाले गैसीफिकेशन संयत्र के लिए ऐशडेन रिन्‍यूएबल्‍स फॉर इकोनोमिक डेवलपमेंट अवार्ड दिया गया। स्‍थानीय नवीकरण योग्‍य स्रोतों से प्राप्‍त होनेवाले बायोमास से चलनेवाला यह संयत्र रह-रह कर धोखा देनेवाली ग्रिड की विद्युत आपूर्ति का एक सस्‍ता और टिकाउ विकल्‍प है। लिमिटेड कंपनी द्वारा बिहार के सारण जिले में स्‍थापित इस संयत्र से प्रति वर्ष 200 मेगावाट बिजली पैदा होती है, जिसे स्‍थानीय उद्यमियों, किसानों, अस्‍पताल और स्‍कूल को बेचा जाता है। इसके गैसीफायर प्‍लांट और उसमें इस्‍तेमाल होनेवाले जैविक ईंधन को बगल के चित्रों में देखा जा सकता है।

फ्रांसीसी स्‍वयंसेवी संस्‍था जीइआरइएस (GERES) को लद्दाख के हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में ग्रामीणों के पोषण (nutrition) में सुधार और उनकी आमदनी में बढ़ोतरी लाने के लिए ऐशडेन अवार्ड फॉर इंप्रूव्‍ड न्‍यूट्रीशन दिया गया। संस्‍था ने स्‍थानीय संगठनों को सोलर ग्रीनहाउस के जरिए सालों भर ताजी सब्जियां उगाने में मदद की, जिससे यह उपलब्धि हासिल हो सकी।

इंटरनेशनल डेवलपमेंट इंटरप्राइजेज इंडिया (IDEI) को उसके द्वारा तैयार किए गए पांव-पंप (ट्रेडिल पंप / Treadle Pump) के लिए ऐशडेन आउटस्‍टैंडिंग अचीवमेंट अवार्ड से नवाजा गया। कहा जा रहा है कि इस विधि से खेतों की सिंचाई कर साढ़े सात लाख किसान अपनी गरीबी दूर भगाने में सक्षम हुए हैं। इस संगठन को 2006 में भी ऐशडेन पुरस्‍कार मिला था। तब से यह ड्रिप सिंचाई पद्धति के क्षेत्र में भी काम कर रहा है तथा दुनिया भर में अपने उत्‍पादों को बेच रहा है।

Friday, June 12, 2009

जलसंकट का समाधान और नासिरा शर्मा की कुइयाँजान

भूगर्भीय और भूतल जल के दिन-प्रतिदिन गहराते संकट के मूल में हमारी सरकार की एकांगी नीतियां मुख्‍य रूप से हैं. देश की आजादी के बाद बड़े बांधों, नहरों व कृत्रिम यंत्रों जैसी नई सिंचाई प्रणालियों पर ध्‍यान तो दिया गया, लेकिन आहर, पइन, कुएं, तालाब आदि जैसी पुरानी प्रणालियों की पूर्णत: अनदेखी की गयी. परंपरागत भारतीय सामाजिक-आर्थिक जीवन के केन्‍द्रबिन्‍दु रहे कुएं और तालाबों के प्रति उदासीनता व उपेक्षा का ऐसा माहौल बना कि लालच में उन्‍हें पाटा जाता रहा और सरकारी महकमा मौन साधे रहा.

पहले के जमाने में राजा-महाराजा, जमींदार व धनवान लोग गांव-गांव में आहर बंधवाते और पोखर व कुएं खुदवाते थे. यह बहुत पुण्‍य का काम समझा जाता था. तब सिंचाई व पेयजल के स्रोतों के मामले में हर गांव आत्‍मनिर्भर रहता था. आहर, पइन, पोखर आदि जैसी पुरानी सिंचाई प्रणालियां भूगर्भीय जल को रिचार्ज भी करती थीं, जबकि आधुनिक बोरवेल से सिर्फ दोहन होता है. आधुनिक सिंचाई प्रणालियों के मोह में जल संबंधी पारंपरिक ज्ञान को नजरअंदाज करने से हमारा संकट और बढ़ा ही है.

जो लोग मौजूदा जल संकट से चिंतित हैं और जिनपर इसके समाधान की जिम्‍मेवारी है, पुरानी और नई सिंचाई प्रणालियों के तुलनात्‍मक अध्‍ययन से गुजरे बिना उन्‍हें सही मार्ग नहीं मिलनेवाला. इस मामले में जिसकी दिलचस्‍पी है, उसे हिन्‍दी की ख्‍यातिप्राप्‍त साहित्‍यकार नासिरा शर्मा का उपन्‍यास कुइयाँजान अवश्‍य पढ़ना चाहिए. इसकी कथा का पूरा ताना-बाना पानी के इर्द-गिर्द ही बुना गया है और आदि से अंत तक पानी की समस्‍या को लेकर गहरा विमर्श चलता है. कहानी का मुख्य पात्र है एक युवा डॉक्टर, जो अपनी पारिवारिक जिम्‍मेवारियों के निर्वहन के साथ-साथ जल संरक्षण तथा ऐसे ही अन्य मुद्दों पर आयोजित राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय परिचर्चाओं तथा सम्मेलनों में भी भाग लेता है.

कुइयाँजान के कुछ अंश यहां, यहां नेट पर उपलब्‍ध हैं। एक बहुत ही महत्‍वपूर्ण अंश बीबीसी हिन्‍दी ने नई बनाम पुरानी सिंचाई प्रणाली शीर्षक से प्रस्‍तुत किया था, जिसे हम यहां उद्धृत कर रहे हैं :

कमाल जब ट्रेन पर बैठा तो उसका दिल बुझा-बुझा सा था. शायद समीना के जुमले का असर हो-यह सोचकर उसने अपना बिस्तर लगाया और आँख बंद कर लेट गया. मगर नींद का कोसों पता न था. सारी रात करवटें बदलता रहा. अजीब-सी बेचैनी उसे घेरे रही. आँखों के सामने पंखुड़ी और पराग के चेहरे बार-बार कौंधते और दिमाग में यह सवाल कि अब से पहले तो कभी समीना ने उसे रोका नहीं, फिर आज क्यों ? अब मेरी जिम्मेदारी बढ़ गई है. बाप बन गए हैं, यही सोचकर उसने कह दिया होगा. इस तर्क के ज़हन में आते ही उसकी पलकें मुंदने लगीं.

दिल्ली पहुँच सबसे पहले कमाल ने समीना से बात कर बच्चों की ख़ैरियत ली. उसे समीना की आवाज़ में थकान-सी महसूस हुई. शायद बच्चों ने रात-भर जगाया हो. उसे भी अब बच्चों की देखभाल में समीना का हाथ बंटाना चाहिए, ताकि वह पूरी रात चैन से सो सके. पूरी उड़ान-भर वह समीना और बच्चों के बारे में ही सोचता रहा. पटना हवाई अड्डे पर उसे रिसीव करने वाले आए हुए थे. सेमिनार के दोस्त थे. कल वैशाली की ओर एकरारा, अबीरपुर और सिरसा बीरन गाँव की ओर जाना था.

पटना में गंगा का फैला पाट देखकर कमाल को महसूस हुआ, जैसे वह समुद्र देख रहा हो. गाँधी सेतु के नीचे हाजीपुर की ओर केले के बागान मीलों तक फैले हुए थे. नीले फ़ीके आसमान और खिली धूप में हरे-हरे पत्तों वाले पेड़ बड़ी सुंदर अनोखी छटा बिखेर रहे थे. पुल भी शैतान की आँत की तरह लंबा था, जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था. कमाल बार-बार अपनी कलाईघड़ी को बढ़ती सुइयों को देखकर सोच रहा था कि सीधा सेमिनार हाल में जाना ही ठीक होगा, मगर तब तक कार होटल के गेट में दाखिल हो चुकी थी.

सेमिनार हाल में पहुँच वह सब कुछ भूल गया. वहाँ कुछ और समस्याएँ थीं जो दिल के मामले से कहीं ज़्यादा गहरी और गंभीर थीं. सेमिनार के पहले सत्र का शीर्षक था-मध्य बिहार में आहर-पइन सिंचाई प्रणाली. सत्र के प्रारंभ में पढ़े गए आलेख में बिहार की भौगोलिक बनावट पर छोटी सी टिप्पणी थी, जिसके हिसाब से बिहार को तीन भागों में बाँटा गया था-उत्तर बिहार का मैदानी इलाक़ा, दक्षिण बिहार का मैदानी भाग और छोटा नागपुर या पठारी क्षेत्र. पहला हिस्सा जो नदियों के साथ आई मिट्टी से बना है और नेपाल के तराई वाले इलाकों से लेकर गंगा के उत्तरी किनारे तक आता है. यहाँ की ज़मीन उर्वरा और घनी आबादी वाली है. दक्षिण का मैदानी इलाका गंगा के दक्षिणी तट से लेकर छोटा नागपुर के पठारों के बीच स्थित है. यहाँ सोन, पुनपुन, मोरहर, मुहाने, गामिनी नदियाँ है जो गंगा में जाकर मिलती हैं.

बरसात में सारी नदियाँ उफ़नने लगती हैं. गंगा के मैदानी इलाके दक्षिणी भाग में पुराना पटना, गया और शाहाबाद जिलों तथा दक्षिणी मुंगेर और दक्षिणी भागलपुर आता है, जहाँ की ज़मीन में नमी बनाए रखने की क्षमता कम है. यहाँ भूजल का स्तर बहुत कम है. गंगा के किनारे के इलाके को छोड़ कही भी कुआँ या नलकूप खोदना असंभव है. यह भू-भाग दक्षिण से उत्तर की ओर तेज़ ढलान वाला है, जिसके कारण धरती पर पानी का टिकना मोहाल है सो जलवायु खेती के अनुकूल नहीं; परंतु विचित्र तथ्य है कि यही इलाका ठीक नदियों के किनारे की तरह प्राचीन सभ्यता का केंद्र रहा है. आखिर क्यों और कैसे ? यह सवाल दिमागों में उठ सकता है तो इसका श्रेय हम आहर-पइन को देंगे जो न केवल हमारी भारतीय सिंचाई-प्रणाली थी बल्कि इलाके की आवश्यकता के अनुसार उसका निर्माण वजूद में आया था. वह हमारी ज़मीन की बनावट से निकाली गई इंसानी उपलब्धियाँ थीं.

लेख के साथ स्लाइडों द्वारा आहर-पइन के पुराने के चित्रों एवं नए रेखाचित्रों की भी एक श्रृंखला थी, जो विवरण के साथ दिखाई जा रही थी कि इस इलाके में ढलान चूंकि प्रति किलोमीटर एक मीटर पड़ती है, सो उसी बनावट को हमारे पूर्वजों ने इस्तेमाल कर एक या दो मीटर ऊँचे बाँधों के जरिए पोखर बनाए जिन्हें स्थानीय भाषा में आहर कहते हैं. बड़े बाँध के दोनों छोर से दो छोटे बाँध भी निकाले जाते थे जो ऊँचाई की तरफ होते थे. इस तरह से आहर जल तो तीन तरफ से घेरने की व्यवस्था बनाई जाती थी. तालाबों की तरह इनकी तलहटी की खुदाई संभव नहीं थी. यह पोखर कभी-कभी पइनो और स्रोतों के नीचे इस विचार से भी घेरे जाते थे, ताकि इनमें लगातार पानी इन दोनों स्रोतों से भी आकर भरा रहे. यह कितने कारामद होते थे, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि एक लंबे आहर से बड़े आराम से 400 हेक्टेयर से कुछ अधिक ज़मीन की सिंचाई हो जाती थी. तालाबों का यहाँ चलन था नहीं. छोटे आहरों की संख्या कुछ ज़्यादा रही.

इसी तरह पहाड़ी नदियों से खेतों तक पानी पहुँचाने के लिए पइनों का प्रयोग किया जाता था. यह पइन 20-20 किलोमीटर तक लंबे होते थे और प्रशाखों में बंटकर सौ से भी अधिक ज़्यादा गाँवों के खेतों की सिंचाई करते थे. दक्षिण की नदियाँ गर्मी में सूखी और बरसात में उफनती थीं सो उनका बढ़ा पानी बाढ़ की जगह ढाल से वह पइनों एवं आहारों में भर अपनी राह बना लेते था. आज हम विकल्पों की ओर भागते हैं और अपनी व्यवस्था से मुंह मोड़ लेते हैं.

आहर-पइन प्रणाली जातक युग से ही हमारी सिंचाई-व्यवस्था में शामिल रही है. कौटिल्य के अर्थशास्त्र में “आहरोदक सेतु” से सिंचाई-व्यवस्था का जिक्र है. मेगास्थनीज के यात्रा-विवरण में भी बिहार की बंद मुंह वाली नहरों से सिंचाई का उल्लेख मिलता है. हम नए से नए विकल्प ढूंढ़ने के स्थान पर अपनी पुरानी प्रणाली की तरफ ध्यान दें, क्योंकि वह हमारे इलाके की भोगोलिक बनावट के अनुकूल थी, वरना आप सब जानते हैं कि उन आहारों-पइनों से मुख मोड़कर हम कहाँ पहुँचे. इस बार मध्य बिहार में पहली धान की बुआई हुई नहीं. वर्षा भी कम हुई और जब दूसरा धान रोपा भी जाएगा, या फिर चुनाव की गहमागहमी में हम सब भूल जाएँगे और राजस्थान की तरह सूखे और भुखमरी की तरफ बढ़ेंगे!

पहले लेख की समाप्ति पर सवाल करने वाले बेचैन थे, मगर तय यही पाया कि दूसरा लेख भी चूंकि पोखर-नहर प्रणाली की बहाली पर है, इस कारण बेहतर होगा कि सवाल इकट्ठा सामने रखे जाएँ. दूसरा आलेख भी अनेक सूचनाओं से भरा हुआ था. उसमें भी सारा आरोप अपनी स्वयं की व्यवस्था से विमुख हो नित नए प्रयोगों की विफलता पर था. विमलजी का आलेख प्रारंभ हुआ.

“घोषजी ने जहाँ अपनी बात एक ज्वलंत प्रश्न पर समाप्त की है, वहीं से मैं उठाना चाहूँगा. गया जिले की बाढ़ सलाहकार कमेटी ने कई दशक पहले 1949 में अपनी रिपोर्ट में लिखा था. ‘कमेटी की राय है कि जिले में बाढ़ का असली कारण पारंपरिक सिंचाई-प्रणालियों में आई गिरावट है. ज़मीन ढलवाँ है और नदियाँ उत्तर की तरफ कमोबेश समांतर दिशा में बहती हैं. मिट्टी बहुत पानी सोखने लायक नहीं है. अभी तक चलने वाली सिंचाई-व्यवस्था पूरे जिले में शतरंज के मोहरों की तरह बिछी हुई थी और ये पानी के प्रवाह पर रोक-टोक लगाती थीं.’ मेरा अपना विचार है कि बाहर से दिखने में आहर-पइन व्यवस्था भले ही बदरूप और कच्ची लगे, पर यह एकदम मुश्किल प्राकृतिक स्थितियों में पानी की सर्वोतम उपयोग की अद्भुत देसी प्रणाली है.”

तीसरा आलेख कालियाजी का था. उनका समर्थन भी आहर और पइन के लिए था. अपने लेख का आरंभ “एन एकाउंट ऑफ द डिस्ट्रिक ऑफ भागलपुर” लिखने वाले ब्रिटिश पर्यवेक्षक एफ-बुकानन के इस कथन से शुरू किया “आहारों और पइनों में इतना पानी रहता है कि किसान सिर्फ़ धान की फसल ही नहीं लेते, बल्कि सर्दियों में गेहूँ और जौ उगाने के लिए भी उसका प्रयोग कर लेते हैं. पानी को ढेकुली और पनदौरी जैसी कई व्यवस्थाओं से ऊपर लाकर खेतों तक पहुँचाया जाता था.” कलियाजी लेख पढ़ते-पढ़ते रुके और बोले, “यह वही अंग्रेज सज्जन थे जो आहर-पइन प्रणाली को कमखर्च समझने के बावजूद सिंचाई के लिए तलाब को पसंद करते थे. मगर जैसे-जैसे वे भागलपुर से गया की तरफ बढ़े उनकी राय बदलती गई, क्योंकि उन्होंने यथार्थ को अपनी आँखों से जाकर देखा. आहर आम तौर पर गाँव के उत्तर में होते थे. पूरा का पूरा दक्षिण बिहार ही ऐसी ढलानवाला मैदान है. हर गाँव में धनहर और भीत खेत हैं.”

“आहर और पइन का उपयोग सामूहिक रूप से होता था और सभी किसानों को मिल-जुलकर खेती करनी होती थी. आहर-पइन व्यवस्था कितनी उपयोगी और विश्वसनीय थी, इसका पता इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पूरे देश का प्रायः हर इलाका निरंतर अकालों की चपेट में आता रहा, मगर गया जिला इससे अछूता रहा. इस सिंचाई-व्यवस्था में गिरावट के साथ मजबूती भी जाती रही. कहाँ तो उसे अकाल राहत की ज़रूरत 1886-97” में नहीं पड़ी थी और वहाँ 1966 में गया जिले पर भी सूखे व अकाल की मार पड़ी. इस व्यवस्था से बाढ़ के पानी पर भी रोक थी. मगर इधर देखने में आ रहा है कि वह संतुलन भी जाता रहा.

“अब इसी सिलसिले में ज़रा हम अपनी भव्य परियोजनाओं पर दृष्टि डालें. दक्षिण बिहार के ‘सुखाड़ क्षेत्र’ में सिंचाई-सुविधा के नाम पर चल रही है स्वर्ण-रेखा परियोजना. सिंहभूमि जिले में चल रही दो बड़े डैम, दो बराज एवं सात नहरों वाली इस परियोजना में विश्व बैंक आर्थिक मदद कर रहा है. 1977 में इसकी लागत 179 करोड़ रुपए थी. आज उसकी लागत बढ़कर करीब 1285 करोड़ रुपए हो गई है. इस परियोजना की बाबत सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़ों एवं गैरसरकारी सर्वेक्षण के अनुसार इससे चांडिल और इंचा के इलाके में करीब 182 गाँवों में पानी भर जाएगा. इनमें से 44 गाँव तो पूर्णतया जलमग्न हो जाएंगे. कुल मिलाकर एक लाख लोग, जिनमें अधिकतर आदिवासी हैं, विस्थापित हो जाएंगे. उन्हें भी बसाने के पहले की तरह के वायदे किए गए. जैसे सरदार सरोवर डैम पैनल निर्माण के समय उनकी ज़मीन लेते हुए वायदे किए थे, मगर वे कहाँ बसेंगे-इसका पता न उजड़ने वालों को होगा न उजाड़ने वालों को. हमारी सरकारें हमारी नहीं, विदेशी हित की बातें सोचती हैं. मेधाजी को विकास-विरोधी बताकर नर्मदा बाँध से डूबने और विस्थापित होने वाले आदिवासियों की कोई चिंता नहीं की जाती इसलिए विदेशी चंगुल से छुटकारे का एक ही रास्ता है कि हम अपने जल, ज़मीन तक सीमित रहें और विकास अपने साधनों से करें, न कि विश्व बैंक से ऋण लेकर एक नई गुलामी स्वीकार करें.”

आलेख की समाप्ति पर कुछ पल खामोशी छाई रही, फिर प्रश्न आमंत्रित किए जाने की घोषणा हुई. प्रश्न तो शायद किसी के मन-मस्तिष्क में नहीं उभर रहे थे, मगर कई अन्य तरह के आक्रोश लोग पाले बैठे थे, सो एक सज्जन आवेश में उठे और बोले, “आप पुरानी सिंचाई-प्रणाली आहर व पइन के छिन-भिन्न होने पर दुखी हैं, मगर मेरे सामने अनेक प्रश्न पानी से भरे पोखरों को लेकर हैं! जैसे, स्वतंत्रता के पूर्व मछली, मखाना जैसी पोखर से पाई जाने वाली वस्तुएं किसी बाजार में खरीद-बिक्री के लिए प्रायः नहीं भेजी जाती थीं. जो पोखर में उपलब्ध होता, उसे गाँव वाले प्रयोग में लाते थे. पोखर हमारे रीति-रिवाज़ों में आज भी मौजूद है. ज़मींदारी प्रथा के उंमूलन के पश्चात बिहार सरकार द्वारा भू-सर्वेक्षण आरंभ कराया गया. सर्वेक्षण में पूर्व का गैरमजरुआ आम पोखर बिहार सरकार के पोखर के रूप में दर्ज किया गया. साथ ही मछली और मखाना का बाजार भी उपलब्ध हो गया. इस काम के लिए तालाब लीज़ पर दिया जाने लगा. गाँव के लिए पोखर के पानी पर पाबंदी लगी और सिंचाई के लिए पानी लेने पर भी रोक लग गई. सिंचाई के पानी लेने से पानी घटेगा, मछलियाँ मरेंगी और तालाब सरकारी लीज़ पर नहीं मिलेगा. आम आदमी का जो भावनात्मक संबंध देख-रेख और उपयोग को लेकर तालाब-पोखर से था, वह निराशा और उदासीनता में बदला. क्या इसमें सरकार और बाजार का बेजा हस्तक्षेप नहीं है, जिसने स्थानीय लोगों से उनका सहज जीवन और उसका प्रवाह छीन लिया?”

उनके बैठते ही दूसरे सज्जन उठे और उन्होंने श्रोताओं के सामने अपनी बात रखी- "संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि बाण अपनी कृति कादंबरी (सातवीं शताब्दी) में पोखर-सरोवर खुदवाने को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानते थे. लोक-कल्याण हेतु इस प्रकार के खुदवाए गए जलकोष को चार वर्गों में विभाजित किया गया है- 1.कूप जिसका व्यास 7 फीट से 75 फीट हो सकता है और जिससे पानी डोल-डोरी से निकाला जाए, 2. वापी, छोटा चौकोर पोखर, लंबाई 75 से 150 फीट हो और जिसमें जलस्तर तक पाँव के सहारे पहुँचा जा सके, 3.पुष्करणी, छोटा पोखर, गोलाकार, जिसका व्यास 150 से 300 फीट तक हो, 4.तड़ाग पोखर, चौकोर, जिसकी लंबाई 300 से 450 फीट तक हो. कहने का अर्थ केवल यह है कि हमारे भारतीय समाज में पोखर केवल भौगोलिक मजबूरी नहीं, बल्कि परंपरा रही है. हमारी सोच का हिस्सा रही है. पोखर की चर्चा ऋग्वेद में भी है. जब से गृह्मसूत्र और धर्मसूत्र की रचना-संकलन प्रारंभ हुआ(800 से 300 ई.पू. की अवधि में) तब से इसे धार्मिक मान्यता और संरक्षण प्राप्त है. इन सूत्रों के अनुसार, किसी भी वर्ग या जाति का कोई भी व्यक्ति, पुरूष या स्त्री पोखर खुदवा सकता है और यज्ञ करवाकर समाज के सभी प्राणियों के कल्याण-हेतु उसका उत्सर्ग कर सकता है. आज भी यह काम पुण्य कमाने का समझा जाता है! मगर जो इस तरह के काम करने के लायक हैं वे अब धन इन जन-कल्याणकारी कार्यों में नहीं खर्च करते हैं... ऐसी मानसिकता के समय में मध्य बिहार की पपड़ियाई ज़मीन क्या कुछ नहीं झेल रही है, इसको शब्दों में बयान करना मेरे लिए कठिन है.”

उनकी बात ख़त्म होते ही एक और सज्जन खड़े हुए.

“आपके लिए कठिन होगा, क्योंकि शोर मचाने से भी क्या लाभ? हम अपनी मछलियों के रहते आंध्र की मछली खाते हैं. यहाँ तो हाल यह है कि मुहाने नदी का मुंह बंद कर सुखाड़ की स्थिति पैदा कर गई है. आदमी बैठा है फाल्गू की रेत पर और औरतें बैठी हैं पटना की सड़कों पर. याद होगा कि सिंचाई योजना बनाई गई थी उसको लोहे के शटर से हमेशा के लिए बंद कर दिया गया. उससे जो थोड़ी बहुत सिंचाई होती थी वह भी हाथ से गई. उसके चलते इस्लामपुर के 105 गाँव, एंकगरसराय के 119 गाँव, हिलसा के 133 गाँव, परवलपुर के 136 गाँव, चंडी के 103 गाँव, थरथरी के 139 गाँव, नगरनासा के 104 गाँव, नहरनौसा के 104 गाँव, जहानाबाद-घोसी के 153 गाँव आदी प्रखंडों की लाखों हेक्टेयर भूमि पूरी तरह सूख गई. जब यह शटर बंद नहीं था तो 365 पइन थे. पैंतीस वर्ष से वह योजना यूँ ही बंद पड़ी है. आखिर क्यों? जिस परियोजना के चलते मुहाने नदी बंद की गई, उसका क्या हुआ? हाँ, इससे लाखों किसान प्रभावित हुए और दूसरी ओर, बंद पानी से बाढ़ की स्थिति बन गई. बिहार के बंटवारे के बाद इधर के लोग केवल खेती पर निर्भर होकर रह गई है. वे सब गरीबी रेखा के नीचे वाले लोग हैं. आखिर यह परियोजना कब तक ठप रखी जाएगी ? मुहाने नदी को लेकर 11 अक्तूबर 2002 से संघर्ष चल रहा है. लोग सत्याग्रह पर बैठे हैं. यह कोई दो-चार एकड़ की बात नहीं है. किसी एक जिले की बात भी नहीं है, बल्कि गया, नालंदा, जहानाबाद, पटना जिलों की है, जहाँ भूमि सुखाड़ की चपेट में है और किसान भूखे मर रहे हैं.”

बात समाप्त होते ही कई लोगों ने जोर से मेज़ थपथपाकर अपने आक्रोश का इज़हार किया. संयोजक घड़ी देख रहे थे. तीन बजने वाले थे. लंच का समय तेज़ी से शाम की चाय की ओर बढ़ रहा था. बीच में टोकने का मौका ही नहीं था. एक अजीब तरह की गरमाहट हाल में फैल गई थी. इस बार सज्जन बोलने खड़े हुए उनका चेहरा भावना एवं क्रोध से तमतमाया हुआ था.

Monday, May 18, 2009

खस : भारत से दुनिया ने जाना, भारत में रह गया बेगाना!

आप भले एयरकंडीशंड घरों में रहते हों, लेकिन गर्मियों में खस की टट्टियों की याद जरूर आती होगी। इस बात को अधिक से अधिक लोगों को जानने की जरूरत है कि इस वनस्‍पति की उपयोगिता आपके कमरों के तापमान को नियंत्रित रखने में ही नहीं, पर्यावरण को अनुकूलित रखने में भी है। मृदा और जल संरक्षण तथा जल शुद्धीकरण में इसकी उपयोगिता को देखते हुए दुनिया भर में इसके प्रति लोगों की दिलचस्‍पी तेजी से बढ़ी है। जानकार लोगों का कहना है कि खस की इतनी खासियतें हैं कि उसे भारत भूमि को प्रकृति का अनुपम उपहार माना जा सकता है। अफसोस की बात है कि हम भारतीय प्रकृत्ति प्रदत्‍त इस उपहार को सहेजने में विफल साबित हो रहे हैं।

खस यानी वेटीवर (vetiver)। यह एक प्रकार की झाड़ीनुमा घास है, जो केरल व अन्‍य दक्षिण भारतीय प्रांतों में उगाई जाती है। वेटीवर तमिल शब्‍द है। दुनिया भर में यह घास अब इसी नाम से जानी जाती है। हालांकि उत्‍तरी और पश्चिमी भारत में इसके लिए खस शब्‍द का इस्‍तेमाल ही होता है। इसे खस-खस, khus, cuscus आदि नामों से भी जाना जाता है। इस घास की ऊपर की पत्तियों को काट दिया जाता है और नीचे की जड़ से खस के परदे तैयार किए जाते हैं। बताते हैं कि इसके करीब 75 प्रभेद हैं, जिनमें भारत में वेटीवेरिया जाईजेनियोडीज (Vetiveria zizanioides) अधिक उगाया जाता है।

भारत में उगनेवाली इस घास की ओर दुनिया का ध्‍यान 1987 में विश्‍वबैंक के दो कृषि वैज्ञानिकों के जरिए गया। इसकी काफी रोचक कहानी है। विश्‍वबैंक के कृषि वैज्ञानिक रिचर्ड ग्रिमशॉ और जॉन ग्रीनफिल्‍ड मृदा क्षरण पर रोक के उपाय की तलाश में थे। इसी दौरान उनका भारत में आना हुआ और उन्‍होंने कर्नाटक के एक गांव में देखा कि वहां के किसान सदियों से मृदा क्षरण पर नियंत्रण के लिए वेटीवर उगाते आए हैं। उन्‍होंने किसानों से ही जाना कि इसकी वजह से उनके गांवों में जल संरक्षण भी होता था तथा कुओं को जलस्‍तर ऊपर बना रहता था।

उसके बाद से विश्‍वबैंक के प्रयासों से दुनिया भर में वेटीवर को पर्यावरण संरक्षण के उपयोगी साधन के रूप में काफी लोकप्रियता मिली है। हालांकि भारतीय कृषि व पर्यावरण विभागों व इनसे संबद्ध वैज्ञानिकों ने इसमें खासी रुचि नहीं दिखायी। नतीजा यह है कि भारत में लोकप्रियता की बात तो दूर, इस पौधे का चलन कम होने लगा है।

कुछ वर्षों पूर्व भारत में खस की टट्टियां काफी लोकप्रिय थी। लू के थपेड़ों से बचने के लिए दरवाजे और खिड़कियों पर खस के परदे लगाए जाते थे। ये सुख-सुविधा और वैभव की निशानी हुआ करते थे। लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ और पानी की बढ़ती किल्‍लत की वजह से खस के परदों का चलन समाप्‍तप्राय हो ही गया है, लोग कूलर भी खरीदना नहीं चाहते। जैसा की हम सभी जानते हैं कि एयरकूलर में खस की टट्टियां लगती हैं, जो पानी में भिंगकर उसके पंखे की हवा को ठंडा कर देती हैं। लेकिन अब लोग कूलर की जगह एसी खरीदना ज्‍यादा पसंद करते हैं।

वैसे खस का इस्‍तेमाल सिर्फ ठंडक के लिए ही नहीं होता, आयुर्वेद जैसी परंपरागत चिकित्‍सा प्रणालियों में औषधि के रूप में भी इसका इस्‍तेमाल होता है। इसके अलावा इससे तेल बनता है और इत्र जैसी खुशबूदार चीजों में भी इसका उपयोग होता है।

सबसे महत्‍वपूर्ण बात है कि पर्यावरण के खतरों से निबटने में सक्षम एक बहुउपयोगी पौधे के रूप में आज दुनिया के विभिन्‍न देशों में इस पौधे के प्रति लोगों की दिलचस्‍पी काफी बढ़ रही है। मृदा संरक्षण और जल संरक्षण में उपयोगी होने के साथ यह दूषित जल को भी शुद्ध करता है। जाहिर है कि यदि इसका प्रचार-प्रसार हो तो यह भूमि की उर्वरता और जलस्‍तर बरकरार रखने के लिए किसानों के हाथ में एक सस्‍ता साधन साबित हो सकता है। इससे कई हस्‍तशिल्‍प उत्‍पाद भी तैयार होते हैं और यह ग्रामीण लोगों के जीवन स्‍तर में सुधार का माध्‍यम बन सकता है।

(चित्र विकीपीडिया से साभार)

Tuesday, April 28, 2009

आलू-गाजर की कार और 140 मील की रफ्तार... यह तो वाकई स्‍वादिष्‍ट है!

स्‍वाद वाली चीजों से सड़कों पर दौड़नेवाला वाहन तैयार किया जाए, यह सुनने में विचित्र लगता है। शायद इसीलिए आलू-गाजर से रेस कार बनाए जाने की खबर देखकर पहली बात जो मेरे मन में आयी वह यह कि यह कार है या स्‍वादिष्‍ट भोजन। लेकिन बात इतनी ही नहीं है। यह खबर हमें टिकाऊ विकास (sustainable development) के पर्यावरण-अनुकूल उपायों के प्रति आशावान बनाती है।

इंग्‍लैण्‍ड की वारविक युनिवर्सिटी की वर्ल्‍डफर्स्‍ट टीम ने एक ऐसी ही ईको-फ्रेंडली रेस कार तैयार की है, जो चॉकलेट और वेजिटेबल ऑयल से चलेगी। दुनिया की इस पहली वेजिटेबल कार का नाम ईको एफ 3 (ecoF3) रखा गया है। इसका स्टियरिंग व्‍हील गाजर से बना है, जबकि बॉडी आलू की है। सीट सोयाबीन से बनी है। इंजन भी बायोडीजल है। फलों, साग-सब्जियों व पौधों से निकाले गए वेजिटेबल फाइबर को रेजिन के साथ मिलाकर इस कार के अनेक पार्ट-पुर्जे बनाए गए हैं। जबकि चॉकलेट और अन्‍य पौधा आधारित चीजों से निकाले गए तेल को रिफाइन कर ईंधन और लुब्रिकेन्‍ट तैयार किए गए हैं। यह कार 140-45 मील प्रति घंटे की रफ्तार तक चल सकती है।

इस कार को मई में लांच किए जाने की योजना है। वर्ल्‍डफर्स्‍ट टीम चाहती है कि कार दौड़ का आयोजन करनेवाले अपने नियमों में संशोधन करें और अगले सत्र से गैरपरंपरागत नवीकरण योग्‍य ईंधन से चलनेवाली उनकी इस कार को रेस में शामिल कर लें।

वर्तमान में यह फार्मूला 3 कार, रेस के लिए वैध नहीं है क्‍योंकि चॉकलेट आधारित ईंधन उनकी स्‍वीकृत ईंधन सूची में शामिल नहीं है। जबकि वर्ल्‍डफस्‍ट टीम यह साबित करना चाहती है कि ईको-फ्रेंडली कार का मतलब धीमी रफ्तार वाली उबाऊ कार नहीं है। उसके प्रवक्‍ता का कहना है, ‘हमें उम्‍मीद है कि भविष्‍य में फार्मूला वन कारों में नई सामग्री का उपयोग किया जाएगा।‘

Sunday, April 19, 2009

जीन संवर्धित फसल : किसानों के लिए टेंशन लेने का नहीं, देने का !

इस शीर्षक में तल्‍खी है, इस बात से हमें इंकार नहीं। लेकिन जीएम फसलों की वजह से क्षुब्‍ध किसानों को तसल्‍ली देने के लिए इससे बेहतर शब्‍दावली शायद नहीं है। वैसे यह बात गलत भी नहीं है। भारत में जीएम फसलों के प्रति बढ़ते रूझान से अब समय ही ऐसा आ रहा है कि देश के किसान आपके खाने के लिए जहरीला खाद्यान्‍न उपजाएंगे। सृष्टि का चक्र शायद कुछ इसी तरह घूमता है। अब तक उपेक्षा सह रहे किसानों को संभवत: इसी रूप में न्‍याय मिलनेवाला है।

जहां यूरोपीय देशों की सरकारें प्राणियों व पर्यावरण पर जीन संवर्धित फसलों के दुष्‍प्रभाव को लेकर उन पर रोक लगा रही हैं, भारत की सरकारी संस्‍थाएं उनके प्रचार में जुटी हैं। चिंता की बात यह है कि भारत के आम शहरी भी इस मामले में उदासीन बने हुए हैं, मानो उनके लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है। वे सोचते होंगे कि जीएम फसल से उन्‍हें क्‍या मतलब, इसके बारे में किसान जानें, पर्यावरणवादी जानें या सरकार। हालांकि उनकी यह उदासीनता उनके लिए बहुत बड़ा संकट उत्‍पन्‍न करनेवाली है, जिससे बचने का बाद में शायद कोई विकल्‍प न हो। वे यदि उदासीन न रहते तो सरकार पर इस मामले में गंभीर रहने का दबाव पड़ता।

देश में कृषि संबंधी सारी समस्‍याओं का खामियाजा अब तक सिर्फ किसान भुगतते आए हैं, लेकिन जीन संवर्धित फसलों के मामले में ऐसा नहीं होनेवाला। इनका सबसे अधिक नुकसान इन्‍हें उपजानेवालों को नहीं, बल्कि इन्‍हें खानेवालों को उठाना होगा। किसान को तो जीएम फसलों की वजह से पैदावार बढ़ने या कीटनाशकों पर लागत कम आने का शायद फायदा भी हो जाए, लेकिन गैर किसानों को तो सिर्फ क्षति ही क्षति है। किसान तो शायद अपने खाने के लिए थोड़ी मात्रा में परंपरागत फसल उपजा ले, लेकिन गैर किसानों के लिए तो बाजार सिर्फ और सिर्फ जीएम फसलों से ही पटा होगा।

हाल ही में जीन संवर्धित मक्‍के की खेती पर जर्मनी में रोक लगा दी गयी है। मोन 810 (MON810) नामक मोंसैंटो (Monsanto) कंपनी के जिस मक्‍के पर यह कार्रवाई हुई, उसकी खेती पर यूरोपीय संघ के पांच अन्‍य देशों फ्रांस, आस्ट्रिया, हंगरी, ग्रीस और लक्‍जेमबर्ग पर पहले से ही रोक लगी हुई थी। यूरोप में पशु चारे के लिए इस मक्‍के की खेती होती थी। आस्ट्रिया में मोंसैंटो के ही एक अन्‍य जीन संवर्धित मक्‍के मोन 863 (MON863) के आयात पर भी प्रतिबंध लगा हुआ है। जीएम मक्‍के की इस किस्‍म की अमेरिका व कनाडा में खेती होती है।

हालांकि भारत की सरकार और उसकी संस्‍थाएं जीन संवर्धित फसलों के प्रति सहिष्‍णु रवैया अपनाए हुए हैं। भारत में मोंसैंटो के आंशिक स्‍वामित्‍व वाली कंपनी माहीको (Mahyco) के जीन संवर्धित बीटी कपास का बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उत्‍पादन हो रहा है तथा बीटी बैगन के वाणिज्यिक उत्‍पादन की तैयारी भी अंतिम चरण में है। जिन फसलों से जीव व पर्यावरण को होनेवाली क्षति को देखेते हुए यूरोप में प्रतिबंधित किया जा रहा है, उनके प्रति भारत के रवैये का एक नमूना तमिलनाडु कृषि विश्‍वविद्यालय के अधिकृत बयान में देखा जा सकता है। संस्‍था के रजिस्‍ट्रार ने जीन संवर्धित मक्‍का को परंपरागत मक्‍का की किस्‍मों की तुलना में वरदान मानते हुए कहा है कि यह नुकसानदेह नहीं है। देश में जैव प्रौद्योगिकी का नियमन करनेवाली शीर्ष संस्‍था जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) है जो केन्‍द्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय के अधीन काम करती है। लेकिन वह जीन संवर्धित फसलों से पर्यावरण व मानव स्‍वास्‍थ्‍य को होनेवाली क्षति वाले पहलू पर गंभीरता से विचार करते नहीं जान पड़ती। खुद तत्‍कालीन केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री अंबुमणि रामदास ने कुछ माह पूर्व जीन संवर्धित फसलों का विरोध करते हुए कहा था कि बीटी बैगन को इसकी सुरक्षा पर बिना पर्याप्‍त शोध किए भारत में लाया गया है।

जाहिर है हमारी सरकारी संस्‍थाएं जीन संवर्धित फसलों के प्रति सहिष्‍णु बनी हुई हैं। बहरहाल हम जर्मन कृषि मंत्री सुश्री इल्‍जे आइगनर को जीएम मक्‍के की खेती पर प्रतिबंध के उनके साहसिक निर्णय के लिए धन्‍यवाद देते हुए यह सोचकर हैरान-परेशान हैं कि हमारे मंत्री इस तरह का फैसला क्‍यों नहीं कर पाते!