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Friday, July 24, 2009

मात्र 23 साल की उम्र में रच डाला ज्‍योतिष का सबसे वैज्ञानिक ग्रंथ... इतने महान थे आर्यभट।

प्राचीन भारत के महान खगोलविद व गणितज्ञ आर्यभट के बारे में काफी कुछ कहा जाता है और लिखा जाता है, लेकिन सच्‍चाई यह है कि उनके बारे में प्रामाणिक तौर पर बहुत कम जानकारी उपलब्‍ध है। उनके व्‍यक्तिगत अथवा पारिवारिक जीवन के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं मिलती। हम यह भी नहीं जानते कि वे कहां के रहनेवाले थे और उनका जन्‍म किस जगह पर हुआ था। यहां प्रस्‍तुत उनकी प्रतिमा का फोटो विकिपीडिया से उद्धृत है। यह प्रतिमा पुणे में है, लेकिन चूंकि आर्यभट की वेश-भूषा के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए यह प्रतिरूप कलाकार की परिकल्पना की ही उत्पत्ति है।

आर्यभट के बारे में हमारी जानकारी का एकमात्र आधार उनकी अमर कृति आर्यभटीय है, जिसके बारे में कहा जाता है कि ज्‍योतिष पर प्राचीन भारत की सर्वाधिक वैज्ञानिक पुस्‍तक है। आर्यभटीय आर्यभट का एकमात्र उपलब्‍ध ग्रंथ है। उन्‍होंने अन्‍य ग्रंथों की रचना भी की होगी, पर वे वर्तमान में नहीं मिलते। आर्यभटीय के एक श्‍लोक में आर्यभट जानकारी देते हैं कि उन्‍होंने इस पुस्‍तक की रचना कुसुमपुर में की है और उस समय उनकी आयु 23 साल की थी। वे लिखते हैं : ‘’कलियुग के 3600 वर्ष बीत चुके हैं और मेरी आयु 23 साल की है, जबकि मैं यह ग्रंथ लिख रहा हूं।‘’

भारतीय ज्‍योतिष की परंपरा के अनुसार कलियुग का आरंभ ईसा पूर्व 3101 में हुआ था। इस हिसाब से 499 ईस्‍वी में आर्यभटीय की रचना हुई। अत: आर्यभट का जन्‍म 476 में होने की बात कही जाती है।

बिहार की मौजूदा राजधानी पटना को प्राचीनकाल में पाटलीपुत्र, पुष्‍पपुर और कुसुमपुर भी कहा जाता था। इसी आधार पर माना जाता है कि आर्यभट का कुसुमपुर आधुनिक पटना ही है। लेकिन इस मत से सभी सहमत नहीं हैं। आर्यभट के ग्रंथ का दक्षिण भारत में अधिक प्रचार रहा है और मलयालम लिपि में इस ग्रंथ की हस्‍तलिखित प्रतियां मिली हैं। इस आधार पर आर्यभट के कर्नाटक या केरल का निवासी होने की संभावना भी जताई जाती है।

प्राचीन भारत के खगोलविदों में आर्यभट के विचार सर्वाधिक वैज्ञानिक व क्रांतिकारी थे। प्राचीन काल में पृथ्‍वी को स्थिर माना जाता था। किंतु आर्यभट ने कहा कि पृथ्‍वी गोल है और यह अपने अक्ष पर घूमती है, यानी इसकी दैनंदिन गति है। इस सत्‍य वचन को कहनेवाले आर्यभट भारत के एकमात्र ज्‍योतिषी थे। हालांकि आर्यभट ने यह नहीं कहा था कि पृथ्‍वी सूर्य की परिक्रमा करती है।

आर्यभट ग्रहणों के असली कारण जानते थे। उन्‍होंने स्‍पष्‍ट तौर पर लिखा है, ‘’ चंद्र जब सूर्य को ढक लेता है और इसकी छाया पृथ्‍वी पर पड़ती है तो सूर्यग्रहण होता है। इसी प्रकार पृथ्‍वी की छाया जब चंद्र को ढक लेती है तो चंद्रग्रहण होता है।‘’

वस्‍तुत: आर्यभट ने भारत में गणित-ज्‍योतिष के अध्‍ययन की एक स्‍वस्‍थ परंपरा को जन्‍म दिया था। उनकी रचना आर्यभटीय भारतीय विज्ञान की ऐसी महान कृति है जो यह साबित करती है कि उस समय हमारा देश गणित-ज्‍योतिष के क्षेत्र में किसी भी अन्‍य देश से पीछे नहीं था। आर्यभट ने आधुनिक त्रिकोणमिति और बीजगणित की कई विधियों की खोज की थी। इस महान खगोलशास्‍त्री के नाम पर ही भारत द्वारा प्रक्षेपित पहले कृत्रिम उपग्रह का नाम आर्यभट्ट रखा गया था। 360 किलो का यह उपग्रह अप्रैल 1975 में छोड़ा गया था।

ध्‍यान रखने की बात है कि भारत में आर्यभट नाम के एक दूसरे ज्‍योतिषी भी हुए हैं, परंतु वे पहले आर्यभट जैसे प्रसिद्ध नहीं हैं। दूसरे आर्यभट का काल ईसा की दसवीं सदी माना जाता है तथा आर्यसिद्धांत नामक उनका एक ग्रंथ भी मिलता है।

आर्यभट की वेधशाला और दो रुपए में परिवार की खुशी खरीदते लोग!

‘’खट्टा-मिट्ठा चूस, दो रुपए में बाल-बच्‍चा खुश।‘’ दोनों हथेलियों में सस्‍ते लेमनचूस के छोटे-छोटे पैकेट लिए इन्‍हीं लफ्जों के साथ सुरीले अंदाज में अपने सामान का विज्ञापन करता दुर्बल-सा आदमी। और, डिब्‍बे की भीड़-भाड़ में खड़े होने की जगह के लिए संघर्ष कर रहे मटमैले कपड़े पहने दबे-कुचले लोग जो दो रुपए में बच्‍चों की खुशी खरीदकर खुद भी खुश दिख रहे हैं। पटना-गया लाइन के तरेगना और छोटे-बड़े अन्‍य स्‍टेशनों व हाल्‍टों की मेरे लिए अभी तक पहचान यही थी। यह कयास लगाना काफी रोचक है कि क्‍या भविष्‍य में भी मैं उस जगह को इन्‍हीं बिम्‍बों के जरिए पहचानूंगा!

बिहार के तरेगना गांव को इतनी अंतरराष्‍ट्रीय प्रसिद्धि सैकड़ों सालों में पहले कभी नहीं मिली होगी। राजधानी पटना से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस छोटे-से गांव में 22 जुलाई की सुबह हुए 21-वीं सदी के सबसे लंबे सूर्यग्रहण को सबसे अधिक समय तक देखा जाना था। अंतरिक्षवैज्ञानिकों का कहना था कि तरेगना सूर्यग्रहण के 'सेंट्रल लाइन' पर स्थित है, और इसलिए यहां ग्रहण को साफ और अधिक समय तक देखने-परखने में आसानी होगी। हालांकि आकाश में बादलों के घिर आने के चलते वहां दुनिया भर से इकट्ठा हुए हजारों लोगों को निराशा ही हाथ लगी। इनमें आम लोगों के अलावा अमेरिकी अंतरिक्ष संगठन नासा सहित देश-विदेश से आए वैज्ञानिक, खगोलविद, छात्र और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व उपमुख्‍यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी शामिल थे। इसके बावजूद लोग दिन में रात जैसा अंधेरा देखकर उत्‍साहित थे और मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने तरेगना में खगोलीय अध्ययन के लिए एक केंद्र की स्थापना करने की घोषणा की। अब देखना है कि वे अपनी घोषणा कितनी जल्‍द और किस सीमा तक पूरी करते हैं।

माना जाता है कि तरेगना में प्राचीन भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ व खगोलविद आर्यभट (476 ईस्वी) तारों का अध्‍ययन किया करते थे। बताया जाता है कि तरेगना के पूर्व में 70 फुट की एक मीनार थी। इसी मीनार पर आर्यभट की वेधशाला (ऑब्जर्वेटरी) थी जहां बैठकर वह अपने शिष्यों के साथ ग्रहों की चाल का अध्ययन किया करते थे। तारे गिनने के चलते ही इस जगह का नाम तरेगना पड़ा। ऐसा माना जाता है कि इस जगह का संस्कृत नामाकरण तारक-गणना कालांतर में तरेगना कहा जाने लगा।

उपर दिया गया चित्र, तरेगना गांव के उसी स्‍थल का है, जहां आर्यभट की वेधशाला होने की बात कही जाती है। हालांकि अब उस जगह पर निजी मकान है।

उल्‍लेखनीय है कि पटना के समीप ही एक अन्‍य जगह है जिसका नाम खगौल है। अक्‍सर कहा जाता है कि यह जगह भी प्राचीन काल में खगोलीय अनुसंधान का केन्‍द्र था और इसीलिए उसका नाम खगौल पड़ा।

इन जनश्रुतियों में सच्‍चाई कितनी है, यह कहना मुश्किल है। लेकिन यह तो निश्चित जान पड़ता है कि बिहार की मौजूदा राजधानी पटना का इलाका आर्यभट का कर्मस्‍थल रहा था। अपनी एकमात्र उपलब पुस्‍तक आर्यभटीय के एक श्‍लोक में वे कहते हैं कि उन्‍होंने इस पुस्‍तक की रचना कुसुमपुर में की। इतिहासकारों की मान्‍यता है कि आधुनिक पटना को ही प्राचीनकाल में पाटलीपुत्र, कुसुमपुर और पुष्‍पपुर भी कहा जाता था।

(फोटो बीबीसी हिन्‍दी से साभार)