अजीब बात है कि जहां यूरोप और अमेरिका में प्रकृति की ओर लौटने की चाहत देखने को मिल रही है, भारत में इसके विनाश की कवायद चल रही है। कुछ समय पहले जर्मनी में जीन संवर्धित मक्के की खेती पर रोक लगा दी गयी। चंद रोज पहले आस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स प्रांत की सरकार द्वारा बोतलबंद पानी की सरकारी खरीद पर रोक लगायी गयी। हाल ही में अमेरिका के फ्लोरिडा प्रांत में शहद के प्राकृतिक स्वरूप को बरकरार रखने के लिए कानून बनाए गए हैं, जिसके तहत उसमें किसी भी तरह की मिलावट पर दंड का प्रावधान किया गया है। लेकिन पुण्यसलिला गंगा के देश में तो उलटी गंगा ही बहती है।
सवाल यह उठता है कि आखिर किसके फायदे के लिए भारत की सरकार जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती देश में आरंभ करने की जल्दबाजी में है। कृषि और किसानों का तो इसमें कोई भला नहीं। इनमें बैसिलस थ्युरिंगियेंसिस (Bacillus thuringiensis) जैसी बैक्टीरिया के जीन डाले गए तो खानेवालों के लिए ये जहर का काम ही करेंगी। जहां तक भारतीय किसानों की बात है तो वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बीज खरीदने में बरबाद ही हो जाएंगे। अभी घर में बचाकर रखे बीज से उनका काम चल जाता है, लेकिन जीएम बीज हर साल खरीदना पड़ेगा, वह भी मौजूदा कीमतों से करीब बीस-तीस गुना अधिक कीमत पर। यह भी कुप्रचार ही है कि जीएम बीज से उपज में भारी वृद्धि होती है। यदि उपज में थोड़ी बहुत बढ़ोतरी होती भी हो तो उससे होनेवाली कमाई से अधिक पैसा महंगा बीज खरीदने में लग जाता है। मानसून पर निर्भर खेती करनेवाले भारतीय किसान पूरी पूंजी महंगा बीज खरीदने में ही लगा देंगे तो मौसम के दगा देने पर गले में फंदा डालने के सिवाय उनके पास कोई विकल्प नहीं बचेगा। कृषि को जो नुकसान पहुंचेगा उसकी कल्पना ही भयावह है। सृष्टि की वह रचना जो खेतों में हरियाली लाती है और मानव शरीर व मस्तिष्क का पोषण करती है, चंद बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मुट्ठी में कैद हो जाएगी। जो सरकार इस अपूरणीय क्षति की भरपाई नहीं कर सकती, इसकी राह आसान करने का नैतिक अधिकार उसे कहां से मिल गया ?
सच तो यह है कि जीन संवर्धित फसलों के मूल स्रोत अमेरिका में भी अभी तक सोयाबीन और मक्का ही ऐसी खाद्य फसलें हैं, जिनकी जीन संवर्धित किस्मों को मंजूरी दी गयी है। वहां भी इन दोनों फसलों का अधिकांश उपयोग जानवरों के चारे के रूप में होता है। यूरोपीय संघ में अभी तक सिर्फ मोंसैंटो के जीएम मक्का प्रभेद मोन 810 की खेती की अनुमति है। उसमें भी जर्मनी, फ़्रांस, ऑस्ट्रिया, हंगरी, ग्रीस और लक्ज़ेमबर्ग जैसे उसके सदस्य देखों ने उसकी खेती पर रोक लगा रखी है। जाहिर है कि यदि जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती भारत में आरंभ करने की सरकार की योजना अमल में आती है तो इन अप्राकृतिक फसलों के लिए प्रयोगशाला के चूहे करोड़ों भारतवासी ही बनेंगे।
ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि जीन संवर्धित फसलें हमारी आर्थिक गुलामी का मार्ग प्रशस्त करेंगी। जीएम बीजों के उत्पादन और विक्रय का समूचा कारोबार मोंसैंटो, सिनजेंटा, बायर, बीएएसएफ आदि जैसी कुछ बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है। वे बाजार पर अपने एकाधिकार को सुनिश्चित करने के लिए फसलों की जीन-सरंचना के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ से नहीं चूकेंगी। देश में एक बार जीएम खाद्य फसलों की खेती शुरू हुई तो बीज के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर पूरी तरह से निर्भर होने में हमें देर नहीं लगेगी। तब क्या करेंगे मनमोहन, सोनिया, पवार, प्रवण व चिदंबरम जब बहुराष्ट्रीय कंपनियां अचानक अपने बीजों की आपूर्ति रोक दें ? जीन संवर्धित फसलों की देश में बहुतायत होने पर हमारा कृषि निर्यात भी बुरी तरह से प्रभावित होगा।
आदमी की पहली जरूरत उसकी भूख से जुड़ी होती है। जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती से हमारे खेत ही नहीं, पेट भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मर्जी का गुलाम हो जाएगा। ईस्ट इंडिया कंपनी भी एक दिन इस देश में व्यापार करने ही आयी थी और लालची व गद्दार लोगों की मदद से पूरी कौम को गुलाम बना डाला। जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती के जरिए भी इसी तरह की गुलामी की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। हम भारतवासियों के पास अब दो ही विकल्प हैं – औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के इस नए रूप को पहचानें या अपने खेत व पेट की जरूरतों को मुट्ठी भर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की इच्छा का गुलाम बनाने को तैयार रहें।
(फोटो यहां से साभार लिया गया है।)