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Sunday, September 7, 2008

कोसी की बाढ़ और भारत गांव की लघुकथा


पिछले कुछ दिनों से कोसी नदी की बाढ़ से उत्‍तरी बिहार में मची तबाही की खबरों को पढ़-देख कर कर मन में उमड़ रहे भावों ने कब एक लघुकथा का शक्‍ल ले लिया पता ही नहीं चला। वह अच्‍छी या बुरी जैसी भी है, आपके समक्ष प्रस्‍तुत है :

भारत नामक गांव के दस भाइयों के उसे बड़े परिवार में वैसे तो सभी हिन्‍दीभाषी थे, लेकिन दो भाई अंगरेजी भी जानते थे।

जमींदार की गुलामी से आजाद होने के बाद सभी भाइयों ने मिलकर नया घर बनाया और नए तरीके से गृहस्‍थी बसाई।

हिन्‍दी जाननेवाले आठ भाई खुद कृषि, दस्‍तकारी आदि पेशे में लग गए और घर चलाने की जिम्‍मेवारी अंगरेजी जाननेवाले भाइयों को सौंप दी।

पहले परिवार के सारे निर्णय सबकी सहमति से होते थे। लेकिन अब अंगरेजी जाननेवाले दोनों भाई एक-दूसरे से ही विमर्श कर घर के सभी फैसले करने लगे।

धीरे-धीरे उन्‍होंने परिवार की अधिकांश जायदाद अपने कब्‍जे में कर ली और शहर में जाकर रहने लगे। शहर में अपने मकान में उन्‍होंने लाखों रुपये के टाइल्‍स लगवाए, लेकिन गांव में मौजूद हिन्‍दीभाषी भाइयों के मिट्टी के मकान की मरम्‍मत तक नहीं कराई।

एक दिन इतनी तेज बारिश हुई कि गांव के उनके और अन्‍य सारे लोगों के मकान ढह गए और अधिकांश लोग मलबे में दब कर मर गए। अब गांव में चारों ओर या तो मलबे और लाशें थीं, या जख्‍मी अधमरे लोगों की करुण चित्‍कार।

बारिश में मरे लोगों के जीवन का दर्द अब आंसू की शक्‍ल में अंगरेजी जाननेवाले भाइयों की कलम से अबाध गति से झर रहा है। कभी वे इस दर्द को अपने मुंह से बयां करते हैं, कभी उनकी लेखनी कमाल दिखाती है। अक्‍सर वे इस विपदा के लिए प्रकृति या सरकार को कोसते हैं। अब वे दुनिया भर के लोगों के धन्‍यवादपात्र हैं, क्‍योंकि उन्‍हीं के माध्‍यम से दुनिया को भारत गांव के लोगों की बदनसीबी व बदहाली की जानकारी मिली। अगर वे नहीं होते तो शायद लोगों को यह सब पता ही नहीं चलता।

(फोटो बीबीसी हिन्‍दी से साभार)

Wednesday, August 27, 2008

किसानों के लिए बीज व पानी से भी अहम है हिन्‍दी का मुद्दा

आज हम आपसे हिन्‍दी के विषय में बातचीत करना चाहते हैं। हो सकता है, हमारे कुछ मित्रों को लगे कि किसान को खेती-बाड़ी की चिंता करनी चाहिए। वह हिन्‍दी के पचड़े में क्‍यों पड़ रहा है। लेकिन हमारा मानना है कि हिन्‍दी के कल्‍याण के बिना हिन्‍दुस्‍तान के आमजन खासकर किसानों का कल्‍याण संभव नहीं।

राष्‍ट्र की आजादी के बाद भी यहां की आम जनता आर्थिक रूप से इसलिए गुलाम है, क्‍योंकि उसकी राष्‍ट्रभाषा गुलाम है। विशेष रूप से किसानों के लिए तो हिन्‍दी का मुद्दा बीज, खाद और पानी से भी अधिक महत्‍वपूर्ण है। किसी फसल के लिए अच्‍छा बीज व पर्याप्‍त सिंचाई नहीं मिले तो वह फसल मात्र ही बरबाद होगी, लेकिन राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी की पराधीनता भारत के बहुसंख्‍यक किसानों व उनकी भावी पीढि़यों के संपूर्ण जीवन को ही नष्‍ट कर रही है।

देश के करीब सत्‍तर करोड़ किसानों में अधिकांश हिन्‍दी जुबान बोलते व समझते हैं। लेकिन देश के सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों की राजकाज की भाषा आज भी अंगरेजी ही है। यह एक ऐसा दुराव है, जो इस भूमंडल पर शायद ही कहीं और देखने को मिले। जनतंत्र में जनता और शासक वर्ग का चरित्र अलग-अलग नहीं होना चाहिए। लेकिन हमारे देश में उनका भाषागत चरित्र भिन्‍न-भिन्‍न है। जनता हिन्‍दी बोलती है, शासन में अंग्रेजी चलती है। इससे सबसे अधिक बुरा प्रभाव किसानों पर पड़ रहा है, क्‍योंकि वे गांवों में रहते हैं, जहां अंगरेजी भाषा की अच्‍छी शिक्षा संभव नहीं हो पाती। आजाद होते हुए भी जीवनपर्यन्‍त उनकी जुबान पर अंगरेजी का ब्रितानी ताला लगा रहता है।

आज के समय में कस्‍बाई महाविद्यालयों से बीए की डिग्री लेनेवाले किसानपुत्र भी पराये देश की इस भाषा को ठीक से नहीं लिख-बोल पाते। कुपरिणाम यह होता है कि किसान न शासकीय प्रतिष्‍ठानों तक अपनी बात ठीक से पहुंचा पाते हैं, न ही सत्‍तातंत्र के इरादों व कार्यक्रमों को भलीभांति समझ पाते हैं। सबसे बड़ा दुष्‍परिणाम यह होता है कि वे रोजगार के अवसरों से वंचित हो जाते हैं।

हिन्‍दी आज बाजार की भाषा भले हो, लेकिन वह रोजगार की भाषा नहीं है। किसी भी देश में रोजगार की भाषा वही होती है, जो राजकाज की भाषा होती है। चूंकि हमारे देश में राजकाज की वास्तविक भाषा अंगरेजी है, इसलिए रोजगार की भाषा भी वही है। रोजगार नहीं मिलने से किसान गरीब बने रहते हैं, उनकी खेती भी अर्थाभाव में पिछड़ी रहती है, और आर्थिक-सामाजिक-शैक्षणिक विषमता की खाई कभी भी पट नहीं पाती।

जाहिर है यदि भारत के राजकाज की भाषा हिन्‍दी होती तो देश की बहुसंख्‍यक किसान आबादी अपनी जुबान पर ताला लगा महसूस नहीं करती। तब देश के किसान सत्‍ता के साथ बेहतर तरीके से संवाद करते एवं रोजगार के अवसरों में बराबरी के हिस्‍सेदार होते।