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Wednesday, August 19, 2009

सम्‍मान उस क्रांति का जो शौचालयों के जरिए आयी!

भारत में अनेक बड़े राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक व आर्थिक परिवर्तनों का सूत्रपात बिहार से हुआ है। लेकिन मौजूदा बिहार में वैसे नवाचारों की कल्‍पना नहीं की जाती। इसलिए बिहारी मिट्टी से जन्‍मा कोई शख्‍स शौचालय जैसी तुच्‍छ चीज के जरिए संभावनाओं का सूर्योदय करा डाले तो बात गौर करने की जरूर है। जी हां, हम बात कर रहे हैं बिन्‍देश्‍वर पाठक की, जिन्‍होंने भारत में सुलभ शौचालय के जरिए एक ऐसी क्रांति लायी, जिसने बहुतों की जिंदगी बदल दी। उनके बनाए सुलभ शौचालयों में जहां भंगियों को रोजगार मिला और सिर पर मैला ढोने के अमानवीय यंत्रणा से उन्‍हें मुक्ति मिली, वहीं ये शौचालय स्‍वच्‍छता के साथ गैर पारंपरिक उर्जा उत्‍पादन के भी स्रोत बने।

इन दिनों स्‍टॉकहोम में विश्‍व जल सप्‍ताह मनाया जा रहा है, जहां भारत के बिन्‍देश्‍वर पाठक को विश्‍व जल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया जा रहा है। निश्चित तौर पर यह सम्‍मान उस क्रांति का भी है, जो शौचालयों के जरिए आयी। बिन्‍देश्‍वर पाठक को भारत में शौचालय क्रांति का जनक माना जाता है। उनकी यह टिप्‍पणी सोचने लायक ही है, ‘’टॉयलेट सोचने की जगह है। हम वहां बैठ सकते हैं और अपने सवालों के जवाब सोच सकते हैं। बैठते हुए हम नीचे की ओर देखते हैं, सोचने के लिए यह सबसे अच्छी पॉज़िशन है। टॉयलेटों में कितनी समस्याओं के समाधान मिल जाते हैं।"

बिन्‍देश्‍वर पाठक का जन्‍म 1943 में बिहार में हुआ था। उन्‍होंने पटना विश्‍वद्यालय से 1964 में समाजशास्‍त्र में ग्रेजुएशन किया। अपने काम की शुरुआत उन्‍होंने 1970 में की और फिर उनके संगठन ने सस्ते और सुलभ शौचालय बनाना शुरू किया। आज सुलभ इंटरनैशनल के सौजन्य से 12 लाख घरों में रह रहे लोग स्वच्छ जीवन का आनंद ले रहे हैं और 7 हज़ार से ज्यादा सार्वजनिक शौचालयों के जरिए चलते-फिरते लोगों की परेशानी भी दूर की जा सकी है। नई दिल्ली में एक ख़ास टॉयलेट संग्रहालय भी खोला गया है। इसमें पाठक का बनाया पहला शौचालय भी देखा जा सकता है।

बिन्‍देश्‍वर पाठक कहते हैं, "जो टॉयलेट मैंने सबसे पहले बनाया था, वह मेरे लिए सबसे दिलचस्प है। क्योंकि मैंने इससे पहले फ़्लश वाले टॉयलेट का इस्तेमाल नहीं किया था। जब मैं गांव में रहता था, तब हम खेतों में जाते थे। और फिर शहर में साधारण लैट्रीन में। जब मैंने पहली बार सुलभ टॉयलेट बनाया और उसे खुद इस्तेमाल किया, तो मुझे बड़ी ख़ुशी हुई।"
उनके संगठन ने न केवल दस्त जैसी बीमारियों की रोकथाम करने में मदद की है, बल्कि सामाजिक रूप से मैला ढोने के लिए मजबूर कई लोगों की ज़िंदगियों को बदल डाला। विश्व जल सप्ताह की निर्देशक सीसीलिया मार्टिनसेन का कहना है कि बिंदेश्वर पाठक की वजह से मानवीय मल को किस तरह संभाला जा सकता है, यह सवाल विश्व एजेंडे में शामिल हुआ।

Saturday, July 11, 2009

बुंडानून : आस्‍ट्रेलियाई शहर जिसने दुनिया में पहली बार लगाया बोतलबंद पानी पर प्रतिबंध, प्रांतीय सरकार ने भी खरीद की मनाही की।

आज हम आस्‍ट्रेलिया के ग्रामीण इलाके के उस छोटे-से शहर के बारे में बात करेंगे, जो अपने पर्यावरण हितैषी निर्णय के कारण दुनिया भर में सामुदायिक चेतना का मिसाल बन गया है। मात्र ढाई हजार लोगों की आबादी वाले इस कस्‍बाई शहर के बाशिंदों ने आपसी एकजुटता से ऐसा निर्णय लिया कि पर्यावरण की दुनिया में एक नयी क्रांति का सूत्रपात हुआ है।

जनसंख्‍या की दृष्टि से वहां के सबसे बड़े प्रांत न्‍यू साउथ वेल्‍स के कस्‍बाई शहर बुंडानून के निवासियों ने फैसला किया है कि शहर की दुकानों पर बोतलबंद पानी नहीं बेचा जाएगा और वहां आनेवाले बाहरी लोगों को भी इनका इस्‍तेमाल नहीं करने के लिए प्रोत्‍साहित किया जाएगा। बोतलबंद पानी के स्‍थान पर नगर की दुकानों पर अब दुबारा इस्‍तेमाल हो सकने योग्‍य बोतल बेचा जाएगा, जिस पर बुंडी ऑन टैप लेबल लगा होगा। इस बोतल में सड़क पर लगे सार्वजनिक नलों या फिल्‍टर्ड वाटर के स्रोतों से नि:शुल्‍क पानी भरा जा सकेगा। विदित हो कि बुंडानून को बोलचाल में संक्षेप में बुंडी नाम से पुकारा जाता है।

करीब 2500 लोगों की आबादी वाले इस प्राकृ‍तिक सुंदरता से भरपूर ग्रामीण नगर के करीब 250-300 नागरिक वहां के टाउन हॉल में चंद रोज पहले रात्रि में इकट्ठा हुए और प्रचंड बहुमत से नगर में बोतलबंद पानी पर प्रतिबंध का निर्णय लिया। सिर्फ दो आदमियों ने इनके पक्ष में मतदान नहीं किया, जिनमें एक स्‍थानीय नागरिक और एक बोतलबंद पानी बनानेवाली कंपनी का प्रतिनिधि था। आस्‍ट्रेलिया में यह अपने तरह की पहली घटना तो है ही, माना जा रहा है कि दुनिया में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी शहर ने बोतलबंद पानी पर प्रतिबंध लगाया है। जनमत के इस अभूतपूर्व निर्णय ने वहां एक आंदोलन का रूप धारण कर लिया है, जिसे बुंडी ऑन टैप कहा जा रहा है। इस फैसले से शहर के दुकानदारों को आर्थिक क्षति होनेवाली है, लेकिन पर्यावरण के हित को देखते हुए वे इसे अंजाम देने पर एकजुट हैं।

बताया जाता है कि नोर्लेक्‍स नामक एक कंपनी द्वारा वहां पानी निकालने वाला प्‍लांट लगाने की योजना बनायी जा रही थी। इस घटना ने लोगों को पर्यावरण के प्रति सचेत करने में उत्‍प्रेरक का काम किया। शहरवासियों को यह बात नागवार गुजरी कि उनका ही पानी सिडनी में बोतलबंद कर उन्‍हें ही बेचा जाए।

एक छोटे ग्रामीण शहर का यह आंदोलन कितना महत्‍व का है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि न्‍यू साउथ वेल्‍स की प्रांतीय सरकार ने भी सरकारी विभागों व एजेंसियों पर बोतलबंद पानी खरीदने से रोक लगा दी है। भारतीय मीडिया ने इस खबर को महत्‍व भले न दिया हो, लेकिन पाश्‍चात्‍य मीडिया ने इसे प्रमुखता से कवर किया। इससे संबंधित खबर को यदि आप अंग्रेजी में पढ़ना चाहें तो यह बीबीसी, एबीसी, टाइम्‍स ऑनलाइन, रायटर्स एलर्टनेट व कई अन्‍य साइटों पर उपलब्‍ध है।

Friday, July 3, 2009

समलैंगिकता, सविता भाभी, भूजल दोहन और हिंदी

आज पहली बार हमारे गांव के मैनेजर बाबू को यह दुनिया अच्‍छे लोगों और अच्‍छाइयों से भरी-पूरी लग रही है। जिन पढ़े-लिखे शहरी लोगों को वे जेठ की दुपहरी में पानी पी-पीकर कोसा करते थे, आज उनके प्रति उनका प्‍यार उमड़ पड़ा है।

मैनेजर बाबू अपने समय के रईस तो थे ही, रसिक भी कम न थे। उनके दालान में जब लगातार महीना दिन तक लवंडों (पैसे के लिए स्‍त्री वेश धर नाचने वाले पुरुष) या नचनियों (नर्तकी) का नाच होता तो गांव-जवार के लोग चर्चा करते नहीं अघाते।

हालांकि मैनेजर बाबू इन दिनों बड़ा चिंतित रहा करते थे। जबसे उन्‍होंने भूजल दोहन के अवैध कारोबार की श्रेणी में आने की बात सुनी थी, उन्‍हें हर जगह कलियुग ही दिखाई देता। किसी ने उन्‍हें सविता भाभी के बारे में भी बता दिया था और वे उन श्रीमती जी की चर्चा कर सबसे कहते कि इस अधर्म के बोझ तले अब धरती धंसनेवाली ही है।

लेकिन अजीब बात यह हुई कि उस वेबसाइट पर सरकार द्वारा बैन लगाए जाने की खबर सुनकर मैनेजर बाबू और अधिक दुखी हो गए। अब उन्‍हें आशंका सता रही थी कि कहीं ये मुई सरकार नचनियों के नाच पर भी रोक न लगा दे – ‘’जब पल्‍लू सरका के नाचती हैं तो लगता है कि आसमान से साक्षात अप्‍सराएं उतर आयी हैं, ...अब बुढ़ापे में इस सुख से भी वंचित होना पड़ेगा।‘’

बहरहाल जब से मैनेजर बाबू ने वयस्‍कों के समलैंगिक संबंधों को जायज ठहरानेवाले अदालती आदेश की खबर सुनी है, उनका डूबता हुआ दिल फिर से बल्लियों उछलने लगा है। मन में लड्डू फूट रहे हैं – ‘’अब ज्‍यादा कोई टोकेगा तो मुनेशरा से बियाह कर लेंगे।‘’

मुनेशर इलाके का नामी लवंडा था, जो महीनों मैनेजर बाबू के यहां आ कर रहता। लोग इन दोनों के संबंध के बारे में तरह-तरह की बातें किया करते, जिसकी भनक मैनेजर बाबू तक भी पहुंचती ही रहती थी। यह बात जानकर मैनेजर बाबू की खुशी चौगुनी हो गयी थी कि समलैंगिकता को कानूनी मान्‍यता के फैसले को मानवतावादियों का पुरजोर समर्थन मिल रहा है।

इस खुशी में आज मैनेजर बाबू ने जमकर सुरापान किया। तब वे शहरी लोगों की तरह अंगरेजी में बोलकर अपनी खुशी जताना चाहते थे, लेकिन इफ, बट और दिस, दैट के अलावा उन्‍हें कोई और शब्‍द न सूझा।

थोड़ी देर बाद वे जोर-जोर से बोलने लगे। वे हर आने-जानेवाले से पूछ रहे थे – ‘’सरकार राजकाज में अंगरेजी की जगह हिन्‍दी को मान्‍यता देनेवाला आदेश क्‍यों नहीं लाती ? हिन्‍दीभाषियों के (मानव)अधिकार कुछ भी नहीं ? गांववाले आपस में बतिया रहे थे – ‘’मैनेजर बाबू ने आज कुछ ज्‍यादा ही चढ़ा ली है...मैनेजर साहब नहीं, दारू बोल रहा है।‘’

(कहानी पूरी तरह कल्‍पना पर आधारित, चित्र इकनॉमिक टाइम्‍स से साभार)

Saturday, July 12, 2008

धरती के रंग, किसान के संग

वर्षा ऋतु भारत के गांवों में सुख और दु:ख दोनों का संदेशा लाती है। कई गांव बाढ़ में बह जाते हैं, कई का सड़क संपर्क भंग हो जाता है। भारतीय गांवों में आदमी और मवेशी पर बीमारियों का प्रकोप बरसात में कुछ ज्‍यादा ही होता है। इन सबके बावजूद यदि किसानों को किसी ऋतु का सबसे अधिक इंतजार रहता है तो वह वर्षा ही है। यही वह मौसम है, जब धरती तो हरी-भरी हो ही जाती है, किसानों के मन में भी हरियाली छा जाती है। धरती पर चांदी से चमकते पानी का अनंत विस्‍तार, पौधों की हरी-हरी बाढ़, रंग-बिरंगे बादलों से पटा आकाश – यह सब इसी मौसम में देखने को मिलता है। किसानों के मन में नयी फसल बोने की उमंग धरती का अप्रतिम सौन्‍दर्य देख कई गुना बढ़ जाती है।
वर्षा ऋतु में धरती के इन रंगों को अपने कैमरे में संजोने की कोशिश की, तो सोचा खेती किसानी की व्‍यस्‍तता के बीच इस बार इन चित्रों से ही पोस्‍ट का काम चला लिया जाये। शायद ब्‍लॉगर मित्रों को पसंद आये, या हो सकता है न भी आये।