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Thursday, November 5, 2009

तो अब चलें ब्‍लॉगर डैशबोर्ड से गूगल डैशबोर्ड की ओर..

अब समय आ गया है कि हम ब्‍लॉगर डैशबोर्ड की जगह सीधे गूगल डैशबोर्ड पर जाकर ब्‍लागरी या अन्‍य संबंधित काम करें। जी हां, गूगल ने नित नए उत्‍पाद और सेवाएं मुहैया कराने की अपनी कोशिशों को विस्‍तार देते हुए अब गूगल डैशबोर्ड लांच किया है, जो निश्चित तौर पर इंटरनेट प्रयोक्‍ताओं के लिए उपयोगी प्‍लेटफार्म साबित होगा। इसके जरिए अब हमें एक ही जगह अपने गूगल खाते से जुड़ी सारी जानकारियां दिख जाएंगी और उनके लिंक भी उपलब्‍ध होंगे। कोई भी गूगल खाताधारक एक ही जगह से गूगल से जुड़े उन तमाम उत्‍पादों व सेवाओं के बारे में जानकारी व संपर्क रख पाएगा, जिनका वह इस्‍तेमाल कर रहा है।

गूगल के अधिकृत ब्‍लॉग पर Transparency, choice and control — now complete with a Dashboard! शीर्षक से लिखे गए आलेख में कहा गया है :
In an effort to provide you with greater transparency and control over their own data, we've built the Google Dashboard. Designed to be simple and useful, the Dashboard summarizes data for each product that you use (when signed in to your account) and provides you direct links to control your personal settings. Today, the Dashboard covers more than 20 products and services, including Gmail, Calendar, Docs, Web History, Orkut, YouTube, Picasa, Talk, Reader, Alerts, Latitude and many more. The scale and level of detail of the Dashboard is unprecedented, and we're delighted to be the first Internet company to offer this.
गूगल को हमारा धन्‍यवाद, और चलिए चलें अब अपने नए गंतव्‍य की ओर: www.google.com/dashboard

Thursday, May 7, 2009

गूगल को बताइए अपनी कहानी, वह सुनना चाहता है आपकी जुबानी।

कनाडा के यानिक कुस्‍सॉन का 17 सालों से अपने पिता से संपर्क टूटा हुआ था। उन्‍हें नहीं पता था कि उनके पिता कहां हैं और क्‍या कर रहे हैं। एक दिन उनके घर में इंटरनेट आया। उन्‍होंने गूगल सर्च बॉक्‍स में अपने पिता का नाम लिखा, और फिर चमत्‍कार हो गया। गूगल सर्च के जरिए उन्‍होंने अपने बिछड़े हुए पिता को पा लिया।

तब से आज तक कुस्‍सॉन अपने पिता के संपर्क में हैं, और वह दिन आज भी उनकी स्‍मृति में ताजा है। दरअसल दुनिया में ऐसे अनगिनत लोग होंगे जिनके जीवन पर गूगल सर्च ने इसी तरह अमिट छाप छोड़ी होगी। हो सकता है उन शख्‍सों में आप भी हों जिनके जीवन पर गूगल ने काफी असर डाला हो।

यदि ऐसा है तो देर किस बात की। इस लिंक पर जाकर गूगल के ग्रुप प्रोडक्‍ट मैनेजर जैक मेंजेल की पोस्‍ट पढि़ए और उनके बताए ठिकाने पर लिख भेजिए अपनी कहानी। जी हां, आपकी कहानी का इंतजार हो रहा है।

Monday, May 4, 2009

कृषि व पशुपालन के साहचर्य का संदेश्‍ा दे रहा गूगल का प्रयोग

बकरियों से चरवाकर जमीन में उग आयी घास की सफाई कराने का गूगल का प्रयोग पश्चिमी दुनिया के लिए भले ही कौतूहल की बात हो, लेकिन भारतीय किसानों के लिए यह सामान्‍य परिपाटी है। यह हमारी सदियों पुरानी कृषि प्रथाओं की पर्यावरण-अनुकूलता की ओर भी हमारा ध्‍यान ले जाता है, जिन्‍हें आज के पूंजीवादी युग में महत्‍व नहीं दिया जा रहा है।

गूगल के अधिकृत ब्‍लॉग में कहा गया है कि उनके माउंटेन व्‍यू हेडक्‍वार्टर्स में कुछ खेत हैं, जिनमें उगे घास-पात को समय-समय पर कटवाना पड़ता है ताकि आग लगने का खतरा न रहे। इस दफा उन्‍होंने ध्‍वनि और धुआं-प्रदूषण करनेवाली घास काटनेवाली मशीनों का इस्‍तेमाल न कर अपेक्षाकृत कम प्रदूषण वाला तरीका अख्तियार किया। वे कैलिफोर्निया ग्रेजिंग से कुछ बकरियां किराए पर मंगवाकर अपनी जमीन पर उग आयी घास को उनसे चरवा रहे हैं। इस काम के लिए एक चरवाहा तकरीबन 200 बकरियां लाता है जो करीब एक सप्‍ताह उनके यहां रहकर उनकी जमीन पर चरती हैं। इससे जमीन की उर्वरता भी बढ़ जाती है। ऐसा करने में घास को मशीन से कटवाने के बराबर ही उनका खर्च आ रहा है, और लॉन-मूअर जैसी मशीनों की तुलना में ब‍करियों को देखना ज्‍यादा सुखद है।

भेड़-बकरियों के झुंड को खेतों में बैठाकर जमीन की उर्वरता बढ़ाने का तरीका भारतीय किसानों द्वारा बहुत पहले से अपनाया जाता रहा है। भारतीय किसानों की आम धारणा है कि बकरी जिस पौधे को चरती है इस कदर ठूंठ कर देती है कि वह जल्‍द नहीं पनपता। दूसरी ओर उसका मल-मूल जमीन के लिए बहुत अच्‍छे जैविक उर्वरक का काम करता है।

आज के समय में मशीनों का उपयोग दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, जिसके चलते कृषि में पशुओं की उपयोगिता को लोग महत्‍व नहीं देते। लेकिन पहले ऐसी बात नहीं थी। खेत की जुताई से लेकर खेतों की सिंचाई, फसल की दौनी और अनाज की ढुलाई तक सारा काम पशुओं के जरिए होता था। ईंधन, दूध, दही, मट्ठा, घी, खोवा, पनीर, अंडा, मांस, कंबल, जूता आदि जैसी घर-गृहस्‍थी की जरूरी चीजें पशुओं से ही मिलती थीं। आवागमन के साधन भी पशु ही थे। कहने का मतलब है कि जन्‍म से लेकर मृत्‍यु तक पशु हमारी कृषि संस्‍कृति के अभिन्‍न अंग थे।

उन दिनों खेतों में डालने के लिए रासायनिक उर्वरक नहीं होते थे। किसान घूर (राख और जैविक कचरा) और पशुओं के मल-मूत्र खेतों में डालते और उन्‍हीं की बदौलत फसलें लहलहाया करती थीं। कृषि और पशुचारण का अन्‍योनाश्रय संबंध था और दोनों एक दूसरे के पूरक थे। फसल कट चुकने पर जब खेत खाली हो जाते तो पशुपालक उनमें अपने पशुओं को चराते। पशुओं को चारा मिल जाता था और उनके मल-मूत्र के रूप में खेतों को खाद।

कृषि और पशुपालन के पारस्‍परिक साहचर्य की यह परंपरा आज भी गांवों में कुछ अंशों में जीवित है। गांवों में आज भी ऐसे बुनकर परिवार हैं, जो झुंड के झुंड भेड़-बकरियां पालते हैं और अपने करघों पर उनके ऊन से कंबल का निर्माण करते हैं। खेती करनेवाले किसान उनसे आग्रह करकर अपने खेतों में उनकी भेड़-बकरियां बैठवाते हैं ताकि उनकी जमीन की उर्वरता बढ़ जाए।

गर्मी के दिनों में जब पशु चारे की समस्‍या हो जाती है, कई मवेशीपालक अपने मवेशियों को चरवाहों के हवाले कर देते हैं जो उनके झुंड पहाड़, जंगल या वैसी अन्‍य जगहों पर ले जाते हैं, जहां चारा मिल सकता है। कई किसान इन चरवाहों को अपना अतिरिक्‍त पुआल इस शर्त पर मवेशियों को खिलाने के लिए सौंप देते हैं कि वे मवेशियों को उस किसान के खेतों में ही रखेंगे। मवेशियों के मल-मूत्र रूपी उर्वरक की लालच में किसान इन चरवाहों के खाने-पीने का इंतजाम भी करते हैं।

आज के समय में जैविक खेती और पर्यावरण संरक्षण के खूब नारे लगाए जाते हैं, हालांकि उसी अनुपात में व्‍यावहारिक उपाय अपनाने पर उतना बल नहीं दिया जाता। यदि इन उद्देश्‍यों को प्राप्‍त करना है तो कृषि और पशुपालन के साहचर्य को बरकरार रखना ही होगा। इस दृष्टि से देखें तो भारतीय संदर्भ में गूगल का यह प्रयोग काफी महत्‍व रखता है।

(फोटो गूगल के ब्‍लॉग से साभार)