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Thursday, July 24, 2008

किसान कर्ज माफी में ही दे दिया गया था बेईमान बनने का संदेश

संसद में नोटों की गड्डी लहराते देख लोगों को जो पीड़ा हुई उसे समझा जा सकता है। हालांकि यदि हम कृषि ऋण माफी की नैतिकता पर विचार करें तो उसके सामने सांसदों की यह खरीद-फरोख्‍त कुछ भी नहीं। कृषि ऋण माफी के रूप में केन्‍द्र सरकार ने किसानों की ईमानदारी को करारा तमाचा मारा। ईमानदारी बरतनेवाले किसानों की जुबानी सराहना तक नहीं की गयी और विपरीत आचरण करनेवालों पर 71 हजार करोड़ रुपये लुटा दिये गये। जाहिर है, कर्ज माफी के नाम पर इस देश में कृषि से जुड़े करीब सत्‍तर करोड़ लोगों को बेईमान बनने का संदेश दिया गया।

बचपन से हम सुनते आये हैं कि ऑनेस्‍टी इज द बेस्‍ट पॉलिसी, ईमानदारी अच्‍छी नीति है। लेकिन किसानों की कर्ज माफी के नाम पर सरकार ने जो कुछ किया, यह धारणा एक झटके में निर्मूल हो गयी। नीतिवान लोग हमें सिखाते हैं कि जिसका कुछ लो उसे समय से लौटा दो। जिन किसानों ने यह आचरण अपने जीवन में उतारा, वे मुंह ताकते रह गये। इसके विपरीत आचरण करनेवाले मौज मना रहे हैं। जो कर्ज दबाकर रखा था वह माफ हो गया, अब नया कर्ज भी उन्‍हें ही मिल रहा है।

वित्‍तमंत्री पी. चिदंबरम को गुमान है कि उन्‍होंने किसानों के हित में देश की अब तक की सबसे बड़ी कर्ज माफी योजना लागू करायी है। कहा जा रहा है कि देश के चार करोड़ छोटे व सीमांत किसानों को कर्जमुक्‍त कर दिया गया और बड़े किसानों को भी इस योजना का लाभ पहुंचा। मीडिया ने भी इन खबरों को इस तरह उछाला मानों किसानों को बहुत बड़ा तोहफा दिया गया। लेकिन सच्‍चाई यह है कि कर्ज माफी में छोटे, सीमांत, बड़े इन सभी किसानों का ध्‍यान रखा गया, ध्‍यान नहीं रखा गया तो ईमानदार किसानों का। ईमानदारी उनके लिये अभिशाप बन गयी। उनका दोष यही रहा कि उन्‍होंने बैंक से कर्ज लेकर उसे समय सीमा के अंदर जमा करते रहे। उन पर दोहरी मार पड़ी। करों के रूप में कर्ज माफी का बोझ भी उठाया और खुद इससे वंचित भी रहे।

फरवरी, 2008 में लोकसभा में वर्ष 2008-09 का आम बजट पेश करते हुए केन्‍द्रीय वित्‍तमंत्री पी. चिदंबरम ने कृषि ऋण माफी की जो योजना रखी, उसके दायरे में सिर्फ उन्‍हीं किसानों को रखा गया जिन्‍होंने 31 मार्च, 2007 से पहले कर्ज लिया था और 31 दिसंबर 2007 तक नहीं चुकाया था। अर्थात यदि किसी किसान ने (चाहे वह गरीब भूमिहीन बटाईदार किसान ही क्‍यों न हो) ईमानदारी पाली और पहले का कर्ज चुकाकर 31 मार्च, 2007 के बाद नया कर्ज लिया तो उसे एक पाई भी नहीं मिला। दूसरे शब्‍दों में हमारे वित्‍तमंत्री ने बजट पेश करते समय सिर्फ उन्‍हीं किसानों को इसका पात्र समझा जो उस समय तक डिफाल्‍टर घोषित हो चुके थे। वैसे कर्जदार जो डिफाल्‍टर नहीं रहे, उन्‍हें धेला भी नहीं मिला।

जाहिर है, केन्‍द्र सरकार से संदेश तो यही मिल रहा है कि इस देश में मेहनत और ईमानदारी की कोई कीमत नहीं? सत्‍तर करोड़ लोगों के बीच ईमानदारी का इतना घटिया मजाक करनेवाले लोग अगर कुछ सौ सांसदों के बीच नोटों की गड्डियों का लेन-देन करते पाये जायें तो इसमें अचरज की बात हमारे लिये तो नहीं ही है। अफसोस की बात है कि संसद में नोटो की गड्डी लहराते देख शर्म शर्म चिल्‍ला रहा मीडिया भी इस नजरिये से कर्ज माफी योजना पर कभी विचार नहीं किया। हमारी आंखें पथरा गयीं एक अदद ऐसी खबर की आस में जिसमें कहा गया हो कि सिर्फ डिफाल्‍टरों को मिला किसान कर्ज माफी योजना का लाभ। जब कि सच्‍चाई यही रही। किसान कर्ज माफी योजना की पात्रता के लिये सीमांत या छोटा किसान होना ही पर्याप्‍त नहीं रहा, डिफाल्‍टर होना जरूरी शर्त रही।

मौजूदा हालातों में एक बार फिर बाबा धूमिल याद आ रहे हैं-
'इस देश की मिट्टी में
अपने जांगर का सुख तलाशना
अन्‍धी लड़की की आंखों में
उससे सहवास का सुख तलाशना है'

Tuesday, May 27, 2008

'ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत' से किसानों का भला नहीं

"यावत जीवेत सुखं जीवेत,
ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत।
"

यानी, जब तक जीयो सुख से जीयो, कर्ज लेकर घी पीयो। लगता है हमारी सरकार और बैंकों ने किसानों को इस 'चार्वाक दर्शन' का पाठ पढाने की ठान ली है। तभी तो पहले केन्द्र सरकार की कर्ज-माफ़ी की घोषणा, और अब भारतीय स्टेट बैंक की तरफ़ से किसानों को डबल कर्ज। नई फसल बोने के समय किसानों को आर्थिक मदद मिले तो सबका भला होगा। लेकिन बाद में मिला कर्ज साहूकारों की उधारी चुकाने और अन्य अनुत्पादक मदों पर ही खर्च होगा। दुःख की बात है कि ऐसा ही होने जा रहा है। किसानों के लिए केन्द्र सरकार और भारतीय स्टेट बैंक की घोषणाएं 'पोस्ट डेटेड' चेक की तरह हैं। उनका लाभ देश के किसानों को तब मिलेगा जब खरीफ फसल बोने का समय जाता रहेगा। जाहिर है, उस समय तक कई किसान महाजनों के चंगुल में जा चुके होंगे, या महामहिम राष्ट्रपति के भतीजे की भांति आत्महत्या कर चुके होंगे। ऐसे में कृषि या किसानों का कोई भला तो नहीं होगा, साहूकारों व साबुन, लिपस्टिक बनाने वाली कंपनियों की जरूर बन आएगी। मीडिया की खबरों को सही मानें तो कर्ज माफ़ी की घोषणा से वे कंपनियाँ कम खुश नहीं हैं।

कुछ रोज पहले तक किसानों को कर्ज देने से मना करनेवाले भारतीय स्टेट बैंक ने अब उनकी फसल ऋण सीमा दोगुनी कर दी है। इन फैसलों से देश में कृषि और किसानों की स्थिति में कितना सुधार होगा, यह तो बाद की बात है लेकिन बेरुखी से दरियादिली में तब्दीली के 'कभी हाँ, कभी ना' के इस ड्रामे ने देश की वित्तीय संस्थाओं की पोल खोल दी है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर या दिखा दिया है कि किसानों के मसलों को लेकर सरकार की वित्तीय संस्थाएं कितनी गंभीर व ईमानदार हैं। निश्चय ही उनके पास किसानों के लिए कोई सुस्पष्ट नीति या कार्यक्रम का अभाव है।

करीब हफ्ता भर पहले देश के सबसे बड़े इस बैंक ने अपनी शाखाओं को सर्कुलर जारी कर निर्देश दिया था कि वे अगले आदेश तक किसानों को ट्रैक्टर या अन्य कृषि उपकरणों के लिए लोन न दे। स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के इस फैसले का उद्योग जगत ने भी विरोध किया तथा चौतरफा निंदा के बीच उसे एक दिन बाद ही अपना फैसला वापस लेना पडा था। ताजा निर्णय के तहत स्टेट बैंक ने किसानों को दिए जाने वाले फसल लोन की सीमा पचास हजार रुपये से बढाकर एक लाख रुपये कर दी है।

देश में आजादी के बाद के ६० साल के औद्योगिक विकास के सफर के बावजूद आज भी भारत के ६५ से ७० फीसदी लोग रोजी-रोटी के लिए कृषि और कृषि आधारित कामों पर ही निर्भर हैं। ऐसे में केन्द्र सरकार को यह समझना होगा कि इनलोगों को सिर्फ वोट बैंक मानकर चलने से देश का काफी नुकसान होगा, साथ ही वोट भी नहीं मिलेगा। देश के किसानों को समय पर खाद, बीज और सिंचाई चाहिए। उपज का सही दाम चाहिए।

भारत के किसान अपनी मेहनत से अपने खेतों में अनाज उगाकर खाएँगे, अपनी गायों का दुहा दूध-घी पीयेंगे, ये चीजें अन्य देशवासियों को भी मिलेंगी। जब किसान ही कर्ज लेकर घी पीयेगा, तो बाकी का क्या होगा? कौन उपजायेगा अनाज, कौन निकालेगा घी-दूध?