संगीत हमारी कृषि संस्कृति का जरूरी हिस्सा है। हमारे गांवों में कोई भी मांगलिक या कृषि संबंधी कार्य गीत-संगीत के बिना संपन्न नहीं होता। घर में बच्चा जन्म ले या खेत में पौधे उगाए जाएं, उनकी पूरी जीवन-अवधि में गीत गाए जाते रहते हैं। हर अवस्था के लिए अलग-अलग तरह के गीत बनाए गए हैं। इस समय चैत का महीना चल रहा है और उत्तरप्रदेश व बिहार के भोजपुरीभाषी क्षेत्रों में चैता या चैती गाने का रिवाज है। जैसा कि पिछली पोस्ट में भी हमने कहा था कि वैसे तो चैती में तृप्ति व स्थिरता का भाव देखने को मिलता है, लेकिन इसमें विरह का स्वर भी प्रमुखता से मौजूद रहता है। दरअसल होता यह यह है कि फागुन में आया बसंत चैत में ढलने लगता है, और बसंत का अवसान निकट देख प्रेमियों के मन में श्रृंगार का भाव प्रगाढ़ हो उठता है। लेकिन ऐसे समय में भी प्रियतम घर नहीं आता है तो विरहिणियों का मन व्याकुल हो जाता है। ऐसे में अगर प्रिय की पाती भी आ जाती तो थोड़ा चैन मिलता, क्योंकि चैत ऐसा उत्पाती महीना है जो प्रिय-वियोग की पीड़ा को और भी बढ़ा देता है- पतिया न भेजे हो रामा, आयल चैत उतपतिया हो रामा। आइए सुनते हैं पं. कुमार गंधर्व की सुपुत्री कलापिनी कोमकली के स्वर में यह सुंदर चैती :
पतिया न भेजे हो रामा
आयल चैत उतपतिया हो रामा
नीम निबौरा फूल गुलाबै
गंध सुगंध सुहाय न हो
पतिया ने भेजे हो रामा
बिरही कोयलिया कू कू करत
जोबन भार सहयो ना रामा
केरी पाकी रस चुअत है
कौन बिठाव खिलावहु हो रामा
पतिया न भेजे हो रामा
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
-
आप भले एयरकंडीशंड घरों में रहते हों, लेकिन गर्मियों में खस की टट्टियों की याद जरूर आती होगी। इस बात को अधिक से अधिक लोगों को जानने की जरूरत ...
-
झारखंड प्रदेश से भोजपुरी की नयी त्रैमासिक पत्रिका परास का प्रकाशन आरंभ हुआ है। तेनुघाट साहित्य परिषद (बोकारो) द्वारा निकाली जा रही इस पत्र...
-
आज हम आपसे हिन्दी के विषय में बातचीत करना चाहते हैं। हो सकता है, हमारे कुछ मित्रों को लगे कि किसान को खेती-बाड़ी की चिंता करनी चाहिए। वह हि...
-
मीडिया में पिछले दिनों प्रोफेसर विजय भोसेकर की खबर आयी थी, जिसे शायद आपने देखा हो। गोल्ड मेडल से सम्मानित भारत का यह कृषि वैज्ञानिक इन दिन...
-
11 अप्रैल को हिन्दी के प्रख्यात कथाशिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु की पुण्यतिथि थी। उस दिन चाहता था कि उनकी स्मृति से जुड़ी कुछ बातें खेती-...
-
आज के समय में टीवी व रेडियो पर मौसम संबंधी जानकारी मिल जाती है। लेकिन सदियों पहले न टीवी-रेडियो थे, न सरकारी मौसम विभाग। ऐसे समय में महान कि...
-
दाने दाने पर लिखा है, खानेवाले का नाम। यह कहावत आपने जरूर सुनी होगी। लेकिन अब हमें उस समय के लिए तैयार रहना चाहिए, जब कहना पड़े, 'दाने ...
-
भारतीय गांवों का आत्मनिर्भर स्वरूप तेजी से समाप्त हो रहा है। गांवों की परंपरागत अर्थव्यवस्था और प्रौद्योगिकी को पिछले दो-ढाई दशकों में ...
बहुत सुन्दर गीत!
ReplyDeleteबहुत सुन्दर गीत| धन्यवाद।
ReplyDeleteबढ़िया !
ReplyDeleteबहुत सुन्दर गीत
ReplyDelete