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Monday, June 29, 2009

तो भारत के विंध्‍य क्षेत्र में हुई जीवन की शुरुआत !

शोधकर्ताओं के एक नए अध्‍ययन से खुलासा हुआ है कि विंध्‍य घाटी में मिले जीवाश्‍म दुनिया में प्राचीनतम हैं। ये धरती के अन्‍य किसी हिस्‍से में पाए गए जीवाश्‍मों से 40 से 60 करोड़ साल पुराने हैं। यदि इन निष्‍पत्तियों पर भरोसा करें तो जाहिर है कि धरती पर जीवन का आरंभ भारत के विंध्‍य क्षेत्र में हुआ।

लाइव हिन्‍दुस्‍तान डॉटकॉम में वाशिंगटन से प्राप्‍त एजेंसी की खबर में कहा गया है –

‘’विंध्य नदीघाटी के जीवाश्‍मों के एक नए अध्ययन के मुताबिक धरती पर जीवन की शुरुआत पहले के अनुमान से 40 करोड़ साल पहले हुई है। कर्टिन तकनीकी विश्वविद्यालय के ब्रिगर रासमुसेन की अगुवाई में अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के एक दल ने भारत के विंध्य घाटी के कुछ नमूने का अध्ययन किया और पाया कि यहां के जीवाश्म 1.6 अरब साल पुराने हैं। यह पहले के यहां पाए गए जीवाश्‍मों से एक अरब साल पुराने है, वहीं धरती के किसी भी हिस्से में पाए जीवाश्मों से ये 40 से 60 करोड़ साल पुराने हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक उन्‍होंने इस काम के लिए दुनिया की सबसे बेहतरीन तकनीक का इस्‍तेमाल किया। प्रो़ रासमुसेन ने बताया कि जीवाश्‍म के शुद्ध परीक्षण के लिए सारे प्रयास किए गए। उनका कहना था कि भारतीय प्रयोगशालाओं में पहले हुई जांचों में त्रुटि हो सकती है। उन्‍होंने बताया कि जीवाशम के आयु निर्धारण के लिए उसमें मौजूद पास्‍पोरेट का लेड डेटिंग किया गया। करोड़ों साल पहले जीवाश्‍मीकरण की प्रक्रिया में समुद्र तल पर पास्‍पोरेट कार्बनिक पदार्थों पर जमा होने लगे। उनका कहना था कि यह पद्वति काफी सटीक होती है।‘’

उल्‍लेखनीय है कि विंध्‍य पर्वतमाला क्षेत्र में प्रागैतिहासिक मानव की गतिविधियों के भी पुष्‍ट प्रमाण मिले हैं। इस पर्वतश्रृंखला की तलहटी में मौजूद भीमबेतका के प्राकृतिक शैलाश्रयों में पाषाणयुगीन मानव के बनाए हुए बेहतरीन भित्ति-चित्र मौजूद हैं। इस स्‍थल को यूनेस्‍को ने अपनी विश्‍व धरोहर सूची में शामिल कर रखा है।

ऐसा लगता है कि जीवन की निरंतरता का क्रम इस क्षेत्र मे कभी टूटा ही नहीं। विंध्‍य पर्वतश्रृंखला का ही एक अंग कैमूर पहाड़ी है, जिसके शिखर पर बिहार के कैमूर जिले में मुंडेश्‍वरी मंदिर मौजूद है। उपलब्‍ध साक्ष्‍यों के ताजा अध्‍ययन के मुताबिक इसे भारत का प्राचीनतम हिन्‍दू मंदिर बताया जा रहा है। खास बात यह है कि करीब 2000 साल से इस मंदिर में निरंतर पूजा होती रही है।

विंध्‍य पर्वत की चर्चा भारतीय पौराणिक कथाओं में भी मिलती है। पुराकथाओं में इस क्षेत्र में बहनेवाली गंगा, कर्मनाशा आदि नदियों की भी चर्चा है। शायद ये तथ्‍य भी इस भूभाग में जीवन की प्राचीनता और निरंतरता की ओर ही संकेत करते हैं।

Thursday, June 25, 2009

35 हजार साल पहले भी थी संगीत की परंपरा, तब की बांसुरी मिली !

पुरा पाषाणकालीन मानव द्वारा खेती और पशुपालन आरंभ करने के साक्ष्‍य भले न मिले हों, लेकिन उनके कलाप्रेम के प्रमाण मिलते रहे हैं। उनके बनाए चित्रों के नमूने दुनिया भर में गुफाओं व शैलाश्रयों में मिले हैं। हाल ही में दक्षिण जर्मनी में एक ऐसी महत्‍वपूर्ण खोज हुई है, जिससे उस युग के मानव के संगीत से जुड़ाव की जानकारी मिलती है।

जर्मनी में खोजकर्ताओं ने लगभग 35 हज़ार साल पुरानी बांसुरी खोज निकाली है और कहा जा रहा है कि यह दुनिया का अब तक प्राप्‍त प्राचीनतम संगीत-यंत्र है। प्रस्‍तर उपकरणों से गिद्ध की हड्डी को तराश कर बनायी गयी इस बांसुरी के टुकड़े वर्ष 2008 में दक्षिणी जर्मनी में होल फेल्स की पुरापाषाणकालीन गुफ़ाओं में मिले थे। जर्मनी के तूबिंजेन विश्वविद्यालय के पुरातत्व विज्ञानी निकोलस कोनार्ड ने उन टुकड़ों को असेंबल कर उस पर शोध किया। उनके नेतृत्‍व में उस प्रागैतिहासिक बांसुरी पर हुए शोध के नतीजे हाल ही में नेचर जर्नल में ऑनलाइन प्रकाशित हुए हैं। श्री कोनार्ड के मुताबिक बांसुरी करीब बीस सेंटीमीटर लंबी है और इसमें पांच छेद बनाए गए हैं। कोनार्ड कहते हैं, "स्पष्ट है कि उस समय भी समाज में संगीत का कितना महत्व था।" वहां इस बांसुरी के अलावा हाथी दांत के बने दो बांसुरियों के अवशेष भी मिले हैं। अब तक इस इलाक़े से आठ बांसुरियां मिली हैं। शोध के मुता‍बिक हड्डी से निर्मित यह बांसुरी उस समय का है जब आधुनिक मानव जाति का यूरोप में बसना शुरु हुआ था।

इस संदर्भ में उल्‍लेखनीय है कि दुनिया भर में पुरातात्विक खोजों में पुरा पाषाण युग (Palaeolithic Age) के मानव के जो औजार मिले हैं, वे सामान्‍यत: पत्‍थर, हांथी दांत, हड्डी या सीपियों के बने हैं। पक्षी के हड्डी से बनी यह बांसुरी उस युग के मानव में सर्जनात्‍मक क्षमता और सामुदायिक जीवन की भावना के हो रहे विकास की भी परिचायक है।



(चित्र व खबर के स्रोत : बीबीसी हिन्‍दी, uk.news.yahoo.com तथा नेशनल ज्‍योग्राफिक न्‍यूज)

Wednesday, March 25, 2009

मुंडेश्‍वरी : पुरातत्‍व के आईने में भारत का प्राचीनतम मंदिर

पिछले आलेख में मुंडेश्‍वरी मंदिर के बारे में सामान्‍य जानकारी दी गयी थी, लेकिन आज हम विशेष रूप से उन पुरातात्विक साक्ष्‍यों के बारे में बात करेंगे, जिनके आधार पर कैमूर पहाड़ी पर बने इस प्राचीन स्‍थापत्‍य का तिथि निर्धारण किया जाता है।

मुंडेश्‍वरी मंदिर से संबंधित दो पुरातात्विक साक्ष्‍य अब तक मिले हैं – वहां से प्राप्‍त प्राचीन शिलालेख और श्रीलंका के महाराजा दुत्‍तगामनी की राजकीय मुद्रा।

मुंडेश्‍वरी मंदिर के काल निर्धारण का मुख्‍य आधार वहां से प्राप्‍त शिलालेख ही है। अठारह पंक्तियों का यह शिलालेख किन्‍हीं महाराज उदयसेन का है, जो दो टुकड़ों में खंडित है। इसका एक टुकड़ा 1892 और दूसरा 1902 में मिला। दोनों टुकड़ों को जोड़कर उन्‍हें उसी साल कलकत्‍ता स्थित इंडियन म्‍यूजियम में भेज दिया गया। 2’8”x 1’1” का यह शिलालेख संस्‍कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में है। लेख की भाषा में कुछ व्‍याकरणिक अशुद्धियां हैं और शिला टूट जाने के कारण जोड़ के बीच के कुछ शब्‍द गुम हो गए हैं। हालांकि विद्वानों ने अपने शोध के आधार पर उनकी पुनर्रचना की है। ब्राह्मी लिपि के उक्‍त शिलालेख का चित्र और बिहार राज्‍य धार्मिक न्‍यास परिषद द्वारा किया गया उसका देवनागरी लिप्‍यंतरण और हिन्‍दी अनुवाद इस आलेख के साथ यहां प्रस्‍तुत किया गया है।

मुंडेश्‍वरी शिलालेख के आरंभ में ही उसके लिखने की तिथि (संवत्‍सर का तीसवां वर्ष) दी गयी है, लेकिन यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि यहां संवत्‍सर का तात्‍पर्य किस संवत् से है। इस संबंध में विद्वानों के मुख्‍य रूप से तीन तरह के मत हैं।


शिलालेख को पहली बार 1908 ई. में प्रो. आरडी बनर्जी द्वारा पढ़ा जा सका था, और उन्‍होंने संवत्‍सर का आशय हर्षवर्धन के काल से लगाते हुए इसके लिखने की तिथि 636 ई. सन् निर्धारित की। प्रो. बनर्जी द्वारा तैयार किया गया पाठ और उसका अनुवाद Epigraphia India Vol. IX में प्रकाशित हुआ।

विख्‍यात इतिहासकार एनजी मजुमदार ने शिलालेख का गहन अध्‍ययन करने के उपरांत संवत्‍सर का आशय गुप्‍तकाल से लगाते हुए शिलालेख की तिथि 349 ईस्‍वी निर्धारित की। उनका विश्‍लेषण Indian Antiquity, February, 1920 Edition में प्रकाशित हुआ। श्री मजुमदार का स्‍पष्‍ट मत है कि मुंडेश्‍वरी शिलालेख समकोणीय ब्राह्मी लिपि में है, जो 500 ईस्‍वी के बाद देश में कहीं भी देखने को नहीं मिलती। उनके मुताबिक हर्षवर्धन के काल में जिस ब्राह्मी लिपि का प्रयोग देखने को मिलता है वह न्‍यूनको‍णीय है।

तीसरा मत उन विद्वानों का है जो मुंडेश्‍वरी शिलालेख को गुप्‍तकाल से भी प्राचीन मानते हैं। बताया जाता है कि एक जगह भारतीय अभिलेखों की चर्चा करते हुए विख्‍यात इतिहासकार डीआर भंडारकर ने भी इस तरह की संभावना की ओर संकेत किया है। हाल में हुए कुछ शोधों के आधार पर शिलालेख में उल्‍लेखित संवत्‍सर को शक संवत् मानते हुए इसे कुषाण युग में हुविष्‍क के शासनकाल में 108 ईस्‍वी सन् में उत्‍कीर्ण माना गया है। इस मान्‍यता के पक्ष में ठोस तर्क दिए गए हैं, जिनमें कुछ मुख्‍य निम्‍नलिखित हैं :

1. गुप्‍तकालीन अभिलेखों की शुरुआत शासकों की प्रशंसा से होती थी, जबकि कुषाणकालीन अभिलेखों की पहली पंक्ति में ही अभिलेख की तिथि मिलती है। मुंडेश्‍वरी शिलालेख में भी पहली पं‍क्ति में ही तिथि अंकित है।

2. अठारह पंक्तियों के मुंडेश्‍वरी शिलालेख में 11 व्‍याक‍रणिक अशुद्धियां हैं। इससे इस संभावना को बल मिलता है कि यह शिलालेख गुप्‍तकाल से पूर्व का है। गुप्‍तकाल से पूर्व के अधिकांश अभिलेखों पर प्राकृत भाषा का प्रभाव देखने को मिलता है तथा पाणिनी के व्‍याकरण का उस समय कड़ाई से पालन नहीं होता था। जबकि गुप्‍तकालीन अभिलेखों में पाणिनीय व्‍याकरण का बिना किसी त्रुटि के साथ पालन किया गया है तथा वे परिनिष्ठित संस्‍कृत के अच्‍छे उदाहरण हैं।

3. गुप्‍तकालीन अभिलेखों में मास और दिवस के साथ पक्ष (शुक्‍ल या कृष्‍ण) का भी उल्‍लेख रहता था, जबकि कुषाणकालीन अभिलेखों में पक्ष की चर्चा नहीं है। मुंडेश्‍वरी शिलालेख में भी मास और दिवस के साथ पक्ष की चर्चा नहीं है (कार्तिकदिवसेद्वाविंशतिमे)।

यह तो हुई शिलालेख की बात, अब मुंडेश्‍वरी मंदिर के समीप मिले श्रीलंका के शासक की राजकीय मुद्रा के बारे में भी कुछ चर्चा कर लें। श्रीलंका के जिस शासक दुत्‍तगामनी की मुद्रा (royal seal) मिली है, उनका शासनकाल ईसा पूर्व 101-77 बताया जाता है।

मुंडेश्‍वरी धाम में मिले पुरातात्विक साक्ष्‍य (शिलालेख और दुत्‍तगामनी की मुद्रा) जब इतने प्राचीन हैं तो जाहिर है कि मंदिर उससे पहले ही बना होगा। इस तरह से मंदिर का निर्माण ईस्‍वी सन् से पूर्व का भी हो सकता है। यदि ऐसा है तो यह मंदिर युनेस्‍को द्वारा विश्‍व धरोहर (World Heritage) घोषित किए जाने का हकदार है और इस दिशा में हो रही कोशिश को समर्थन दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही मंदिर में पर्यटक सुविधाओं का विस्‍तार कर हमारे गौरवशाली अतीत के इस स्‍मारक को विश्‍व मानचित्र पर लाया जाना चाहिए। सनद रहे कि यह प्राचीन मंदिर वाराणसी से गया जाने के रूट में हैं, जिन स्‍थलों के भ्रमण हेतु हर साल बड़ी संख्‍या में विदेशी पर्यटक आते हैं।