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Sunday, July 5, 2009

गे ग्‍लोबलाइजेशन का जश्‍न....साभार बीबीसी हिन्‍दी ब्‍लॉग

भारतीय मीडिया लाख दावे करे लेकिन जनता की नब्‍ज पकड़ने की बात आती है तो बीबीसी से बेहतर शायद कोई नहीं. समलैंगिकता के सवाल पर बीबीसी हिन्‍दी ब्‍लॉग पर राजेश प्रियदर्शी की एक बहुत ही यथार्थ टिप्‍पणी आयी है, जिसे आप जरूर पढ़ें. ब्‍लॉगर मित्रों की सुविधा के लिए हम उसे यहां भी साभार प्रस्‍तुत कर रहे हैं. चित्र यहां से लिया गया है, जो थोड़ा असहज करनेवाला है....लेकिन समलैंगिक मान्‍यताओं वाले समाज में इन दृश्‍यों से आप बच कैसे सकते हैं. बहरहाल आप पढ़ें राजेश प्रियदर्शी के विचारों को और अपने विचारों से भी हमें अवगत कराना नहीं भूलिएगा :

अब से दसेक साल पहले तक लोग आँख मारकर कहते थे, "इनके शौक़ ज़रा अलग हैं." 'नवाबी शौक़', 'पटरी से उतरी गाड़ी', 'राह से भटका मुसाफ़िर' जैसे जुमलों में तंज़ था लेकिन तिरस्कार या घृणा की जगह एक तरह की स्वीकार्यता भी थी.

हमारे स्कूल में बदनाम मास्टर थे, हमारी गली में मटक-मटकर चलने वाले 'आंटी जी' थे, भारत की राजनीति में कई बड़ी हस्तियाँ थीं जिनकी 'अलग तरह की रंगीन-मिजाज़ी' के क़िस्से मशहूर थे लेकिन धारा 377 का नाम अशोक राव कवि के अलावा ज्यादा लोगों को पता नहीं था.

भारत ऐसा देश है जहाँ अर्धानारीश्वर पूजे जाते हैं, किन्नरों का आशीर्वाद शुभ माना जाता है, बड़े-बड़े इज़्ज़तदार नवाब थे जिनकी वजह से 'नवाबी शौक़' जैसे मुहावरे की उत्पत्ति हुई, वहीं छक्के और हिजड़े दुत्कारे भी जाते हैं.

ये सब अलग-अलग दौर की, अलग-अलग तबक़ों की, अलग-अलग सामाजिक संरचनाओं की बातें हैं लेकिन भारतीय चेतना में विवाह के दायरे में संतानोत्त्पति से जुड़े सर्वस्वीकृत विषमलिंगी सेक्स के इतर एक पूरा इंद्रधनुष है जिसमें सेक्स और मानव देह से जुड़े सभी तरह के रंग रहे हैं, उसकी बराबरी किसी और समाज में नहीं दिखती.

लेकिन नए मिलेनियम में ऐसा कैसे हुआ कि क्वीर, ट्रांसवेस्टाइट, ट्रांससेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, थर्ड सेक्स, ट्रैप्ड इन रॉन्ग बॉडी....न जाने कितने नए विशेषण अचानक हमारे बीच चले आए जिनका सही अर्थ ढूँढ पाना विराट यौन बहुलता वाली भारतीय संस्कृति के लिए बड़ी चुनौती बन गया.

नए मिलेनियम में ऐसा क्या था जिसने भारतीय समाज के भीतर चुपचाप बह रही समलैंगिकता की धारा को सड़कों पर ला दिया, गे प्राइड मार्च सिर्फ़ कुछ वर्ष पहले तक भारत में कल्पनातीत बात थी.

मेरी समझ से सिर्फ़ एक चीज़ नई थी वह है ग्लोबलाइज़ेशन.

'गर्व से कहो हम गे हैं' का नारा 1960 के दशक के अंत में अमरीका के स्टोनवाल पब से शुरू हुए दंगों से जन्मा और दो दशक के भीतर पूंजीवादी पश्चिमी समाज में एक मानवाधिकार आंदोलन के रूप में फैल गया, 1990 आते आते यूरोप और अमरीका में लगभग पूरी राजनीतिक स्वीकार्यता मिली लेकिन समाजिक स्वीकार्यता आज भी बेहद मुश्किल है.

दिल्ली हाइकोर्ट ने सहमति से होने वाले समलैंगिक यौनाचार को क़ानूनन अपराध की श्रेणी से हटा दिया तब जिस तरह का जश्न मना उससे यही लगा कि भारत में यही एक बड़ा मुद्दा था जो हल हो गया है, अब भारत दुनिया के अग्रणी देशों की पांत में खड़ा हो गया है.

निस्संदेह आधुनिक पूंजीवादी पाश्चात्य लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरुप यह न्यायसम्मत फ़ैसला है, जो जश्न मना रहे हैं उनमें सिर्फ़ एलजीटीबी (गे, लेस्बियन, ट्रांससेक्सुअल एंड बाइसेक्सुअल) समुदाय के ही लोग नहीं हैं, मेरे पढ़े-लिखे, विवाहित, बाल-बच्चेदार, फेसबुक वाले, मल्टीनेशनल वाले, शिक्षित-सभ्य सुसंकृत शहरी दोस्त भी हैं.

जश्न मनाने वालों से मुझे कोई शिकायत नहीं बल्कि उन्हें ही मुझसे है कि मैं इसे एक महान क्रांतिकारी घटना के तौर पर देखकर उनकी तरह हर्षित क्यों नहीं हो रहा हूँ.

मेरे दोस्तों, मेरा मानना है कि यह उन चंद सौ लोगों का दबाव था जो भारत को पश्चिमी पैमाने पर एक विकसित लोकतंत्र के तौर पर सेलिब्रेट करना चाहते हैं. जल्दी ही आप देखेंगे कि भारत में 'क्रुएलिटी अगेंस्ट एनिमल' को रोकने के लिए आंदोलन चलेगा, एक कड़ा क़ानून बनेगा और आप फिर जश्न मनाएँगे.

जब मैं छत्तीसगढ़ और झारखंड की लड़कियों की तस्करी, किसानों की आत्महत्या, आदिवासियों और दलितों के शोषण, भूखे बेघर बच्चों की पीड़ा का मातम मनाता हूँ, जब मैं उम्मीद की क्षीण किरण 'नरेगा' को लेकर उत्साहित हो जाता हूँ तब आप मेरे सुख-दुख कहाँ शामिल होते हैं.

Saturday, November 1, 2008

तब बुद्धदेव कहते, क्‍यों नहीं बनाते सस्‍ते ट्रैक्‍टर !

यह विडंबना ही है कि जिस देश की अधिकांश जनता किसान है, जहां का महान बुद्धिजीवी वर्ग जनवाद की बातें करते नहीं अघाता, वहां कार पर तो खूब बहस होती है लेकिन ट्रैक्‍टर कभी मुद्दा नहीं बनता। एक कार को लेकर बेकार का हाहाकार शीर्षक से 'राष्‍ट्रीय सहारा' में प्रकाशित कृष्‍ण प्रताप सिंह के विवेचन के कुछ अंश यहां इस संदर्भ में प्रस्‍तुत हैं।

भूमंडलीकरण का बाजा बजा रही सरकारें गांवों व गरीबों की ओर से मुंह मोड़कर उन्हें निर्मम बाजार व्यवस्था के हवाले करने पर न तुल जातीं, अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को थोड़ा बहुत समझतीं, किसानों–मजदूरों के हकों का अतिक्रमण रोकने में दिलचस्पी रखतीं और पूंजी को ब्रह्म व मुनाफे को मोक्ष न मानने लगतीं, तो आज किस तरह के सवाल उठाए जा रहे होते?

क्या तब भी अखबारों में ‘बंगाल ने खोया रतन (टाटा)’ जैसे शीर्षक आते और संपादकीय में तर्क दिए जाते कि सिंगुर में भूमि गंवाने वाले किसानों ने उन्हें मिले मुआवजे की राशि से ऐसे दोमंजिला भवन बनवा लिए हैं, जैसे कई पीढ़ियों में न बना पाते?

नहीं, तब निश्चित ही बुद्धदेव भट्टाचार्य टाटा को नहीं, टाटा बुद्धदेव भट्टाचार्य को मनाते दिखाई देते। यानी पूंजी की सत्ता राजनीति की सत्ता से ऊपर नहीं होती। बुद्धदेव कहते कि आप सस्ती कार ही क्यों बनाना चाहते हैं, सस्ती साइकिलें, रिक्शे या ट्रैक्टर क्यों नहीं बनाते? फिर हमसे अपनी शर्तें क्यों मनवाना चाहते हैं? सिंगुर की वह उपजाऊ कृषि भूमि ही क्यों चाहिए, आपको? इसे तो हम किसी भी कीमत पर आपको नहीं दे सकते, क्योंकि बड़े से बड़ा मुआवजा भी किसानों की कृषि भूमि का विकल्प नहीं हो सकता।

इन सवालों के साथ बुद्धदेव तब उन लोगों के साथ खड़े होते, जिनका वे आज विरोध करते दिखाई देते हैं। वे नैनो कार के खतरे गिनाते, उसे अर्थव्यवस्था के भीतरी ढांचे में कर्ज के विस्तार की नयी रणनीति का हिस्सा बताते और कहते कि संतृप्त होते ऊपरी कार बाजार से निकल कर टाटा को निम्न मध्य वर्ग की ‘ऊंची इच्छाओं’ को भुनाने यानी कर्ज लेने व आगे उसकी डेढ़ गुनी कीमत चुकाने की व्यवस्था के हवाले करने की इजाजत हम नहीं देंगे।

उन्हें अर्जुन सेनगुप्ता समिति की वह रपट भी याद आती, जिसमें कहा गया है कि देश की 80 फीसदी मेहनतकश आबादी बीस रूपए रोज से कम कमाती है। उनके साथ उनके लोग भी पूछते कि इस आबादी को आपकी नैनो से क्या सरोकार? टाटा जी, वह आम आदमी हमारे देश में कहां बसता है जिसे पत्नी-बच्चों के साथ भीगते देखकर आप करूणा विगलित हो उठे और उसकी कार–सेवा करने चल पड़े?

वे ऐसा न करते और ममता को मजबूरी में टाटा का स्वाभाविक साथ छोड़कर वही करना पड़ता, जो उन्होंने किया तो वे भी आज इतने अपराध-बोध से पीड़ित और रक्षात्मक नहीं होतीं। तब वे टाटा के सिंगुर से जाने को टाटा और बुद्धदेव का गेमप्लान न बतातीं, कहतीं कि यह उन किसानों के संघर्ष की जीत है, जिन्हें भूमिहीन बना दिया जा रहा था।

तब टाटा की हैसियत यह नहीं होती कि वे ममता या कि मोदी को बैड और गुड एम से संबोधित करते। उनके सामने साफ होता कि यह कृषि प्रधान देश कृषि की कीमत पर उद्योगों का विस्तार पसंद नहीं करता।

अब कुछ अपनी बात : इतने दिनों से ब्‍लॉगजगत से मेरी गैरमौजूदगी पर कुछ मित्र सोचते होंगे कि आखिर यह बंदा कर क्‍या रहा है। कविवर भाई योगेन्‍द्र मौदगिल तो पूछ ही बैठे कि किसी जरूरी कीड़े की तलाश में हो क्या..? ..तो भैया मैं किसी कीड़े की तलाश में नहीं हूं। हमेशा यही करता रहा तो खाऊंगा क्‍या :) दरअसल इतने दिनों से पानी के अभाव में सूख रही अपनी धान की फसल को बचाने में लगा था। अब धान की कटनी-दौनी और रबी फसल के लिए खाद-बीज के इंतजाम में जुटा हूं। वैसे अभी भी खेत की मेड़ पर बैठा अपने मोबाइल फोन पर आपकी पोस्‍टें पढ़ना नहीं भूलता..खेती का काम निपटाते ही शीघ्र ही टिप्‍पणियों में भी दिखने लगूंगा। उम्‍मीद करता हूं कि ब्‍लॉगर मित्र छुट्टी की इस अर्जी को मंजूर करने में कृपणता नहीं दिखाएंगे :)