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Tuesday, April 21, 2009

जहरीला प्रोटीन पैदा करनेवाला जीन ही बीटी बैगन में !

आप यह बात जानते होंगे कि भारत का पहला जीन संवर्धित खाद्य पदार्थ बीटी बैगन सरकार की सर्वोच्‍च प्रौद्योगिकी नियामक संस्‍था जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) की स्‍वीकृति पाने के अंतिम चरण में है। उम्‍मीद है कि वर्ष 2009 के अंत तक वाणिज्यिक उत्‍पादन के लिए इसके बीज बाजार में आ जाएंगे। लेकिन क्‍या आप यह भी जानते हैं कि बीटी का मतलब क्‍या है ?

बीटी मतलब बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस (Bacillus thuringiensis)। जी हां, यह मिट्टी में पाया जानेवाला वही बैक्‍टीरिया है जिसके जीन को मोंसैंटो के जीएम मक्‍का मोन 810 में मिलाया गया है, जिसकी खेती जर्मनी में प्रतिबंधित कर दी गयी।

कहने का तात्‍पर्य है कि बीटी बैगन में भी उसी तरह का जीन डाला गया है, जिसकी वजह से मोंसैंटो के जीन संवर्धित बीटी मक्‍का मोन 810 की खेती पर जर्मनी, फ्रांस सहित छह यूरोपीय देशों में रोक लगी हुई है। रोक संबंधी पूरी खबर आप हमारे पूर्व के लेख में देख सकते हैं। बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस बैक्‍टीरिया का जीन मक्‍का में एक ऐसा जहरीला प्रोटीन पैदा करता है, जिससे मक्‍के को नुकसान पहुंचानेवाली कॉर्नबोरर तितली का लार्वा मर जाता है। बीटी बैगन में इस जीन के मिलावट के पीछे भी पौधे में नुकसानदेह कीटों को मारने की क्षमता विकसित करने की ही सोच है। संभव है इस जीन प्रोद्यौगिकी की मदद से कीटनाशकों पर होनेवाला किसानों का व्‍यय बचे तथा उपज में वृद्धि हो। लेकिन मानव स्‍वास्‍थ्‍य व पर्यावरण पर इसका कितना दुष्‍प्रभाव पड़ेगा, इसका समूचा आकलन अभी शेष है।

मोंसैंटो कंपनी द्वारा तैयार किए गए जीन परिवर्तित (gnentically engineered) मक्‍के की किस्‍मों के बारे में पर्यावरणवादियों का कहना है कि ये पर्यावरण, मिट्टी, मानव स्‍वास्‍थ्‍य व वन्‍य प्राणियों के लिए नुकसानदेह हैं। उनका कहना है कि इनकी वजह से अन्‍य फसलें भी प्रदूषित हो जाएंगी, जिससे पर्यावरण व मानव स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरा पैदा हो जाएगा। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि चूहों पर किए गए परीक्षणों में इस मक्‍का के खाने से उनकी रक्‍त-सरंचना में परिवर्तन, जनन क्षमता में ह्रास और लीवर व किडनी जैसे आंतरिक अंगों को क्षति पहुंचने की बात सामने आयी है। कहा जा रहा है कि खुद जर्मन कृषि मंत्रालय के सामने ऐसे कई वैज्ञानिक अध्ययन हैं, जो कहते है कि इस मक्के की खेती से तितलियों और गुबरैलों को ही नहीं, मिट्टी और पानी में रहने वाले कुछ दूसरे जीवधारियों को भी ख़तरा है।

गौर करने की बात है कि बीटी मक्‍का की खेती यूरोप में खाने के लिए नहीं, जानवरों को खिलाने के लिए होती है। लेकिन बीटी बैगन तो भारत में हमारे आप के जैसे इंसान खाएंगे। जब पशु चारा के रूप में जीएम फूड की खेती का इतना खतरा है तो आदमी के खाद्य पदार्थ के रूप में इसके उत्‍पादन का क्‍या दुष्‍प्रभाव होगा आप खुद ही आंक लीजिए।

Saturday, September 27, 2008

जीएम फूड : दाने दाने पर लिखा होगा बनानेवाले का नाम


दाने दाने पर लिखा है, खानेवाले का नाम। यह कहावत आपने जरूर सुनी होगी। लेकिन अब हमें उस समय के लिए तैयार रहना चाहिए, जब कहना पड़े, 'दाने दाने पर लिखा है, बनानेवाले का नाम।' हाल के वर्षों में मोंसैंटो, सिनजेंटा, बीएएसएफ आदि जैसी बहुराष्‍ट्रीय निजी कंपिनयों द्वारा तैयार जीन संवर्धित (Genetically Modified) बीजों का दबदबा जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उसका यही निहितार्थ है।

जीएम पौधों का उत्‍पादन जेनेटिक इंजीनियरिंग विधि से किया जाता है। इसमें आनुवांशिक सामग्री मिलाकर फसल के गुण बदलते हैं। जींस के हस्‍तांतरण का यह कार्य प्रयोगशाला में होता है। उसके बाद उस फसल की प्रायोगिक खेती (Field Trials) कर उसे परखा जाता है। तत्‍पश्‍चात व्‍यापारिक रूप से फसल का उत्‍पादन किया जाता है।

जीएम फूड की स्‍वीकार्यता को लेकर दुनिया भर में विवाद रहा है। जीन का हस्‍तांतरण प्रकृति के विधान के विरुद्ध कार्य है तथा जरूरी नहीं कि इसके परिणाम अच्‍छे ही हों। इसको लेकर अनेक लोगों की नैतिक और धार्मिक आपत्तियां रहती हैं। खासकर शाका‍हारियों को आशंका रहती है कि इस भोजन में मानव व पशु जीन न हों। पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पर जीएम फसलों के साइड इफेक्‍ट होने की खबरें भी आती रहती हैं। वैसे भी निजी कंपनियों का मुख्‍य उद्देश्‍य मुनाफा होता है तथा इसके लिए वे बहुत सी अनुचित बातों को नजरअंदाज कर सकती हैं। इन कंपनियों पर भारत जैसे गरीब देशों में चोरी-चुपके फील्‍ड ट्रायल करने के आरोप भी लगते रहे हैं।

अभी तो एशियाई देशों खासकर भारत में पारंपरिक फसलों का महत्‍व बरकरार है। लेकिन भारत में भी मोनसेंटो और महीको (महाराष्‍ट्र हाइब्रिड सीड कंपनी) कंपनियों के बीटी (बैसिलस थ्यूरेनजिएन्सिस) कपास बीज तमाम विरोध के बावजूद देश के कई हिस्‍सों में उगाए जा चुके हैं और उनके रकबे में लगातार विस्‍तार हो रहा है। यही नहीं, बीटी बैगन जैसे कई अन्‍य जीन संवर्धित फसलों की प्रायोगिक खेती शुरू हो चुकी है और अगले वर्ष से उन्‍हें बाजार में व्‍यावसायिक तौर पर उपलब्‍ध कराए जाने की योजना है।

जीएम सीड के बढ़ते हुए दबदबे का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके कारोबार में लगी अमरीकी कंपनी मोनसेंटो, यूरोपीय कंपनी सिनजेंटा तथा जर्मन कंपनी बीएएसएफ ने पिछले वर्ष अरबों रुपये डॉलर का मुनाफा बटोरा। कुछ साल पहले तक विश्‍वव्‍यापी विरोध के कारण मोंसैंटो को जहां वर्ष 2003 में 2 करोड़ 30 लाख डालर का घाटा उठाना पड़ा था, उसीने वर्ष 2007 में एक अरब डॉलर का मुनाफा कमाया। यूरोप की जिनसेटा ने बीते वर्ष एक अरब 10 करोड़ डॉलर का शुद्ध लाभ अर्जित किया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 75 फीसदी अधिक रहा। इन कंपनियों के बीज आज पराग्वे से लेकर चीन तक और भारत से लेकन अर्जेंटीना तक धड़ल्ले से बिक रहे हैं।

भारत में घाटे का सौदा हो चुकी खेती के भंवरजाल में फंसे किसानों को जीन संवर्धित हाइब्रिड बीज काफी लुभा रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों द्वारा भी कहा जा रहा है कि कृषि उपज वृद्धि में आ चुके ठहराव को हाइब्रिड बीज ही गति दे सकते हैं। विश्‍वव्‍यापी खाद्य संकट ने भी जीन संवर्धित फसलों की स्‍वीकार्यता की राह आसान बनायी है।

जीएम फसल जब अधिक उपज देंगे तो कोई भी किसान गैर-जीएम पारंपरिक फसल नहीं उगाना चाहेगा। भविष्‍य में यह भी हो सकता है कि जीएम फसलों के अपमिश्रण से पारंपरिक फसल दूषित होकर विलुप्‍त हो जाएं। चूंकि जीएम बीजों के उत्‍पादन का करीब सारा कारोबार निजी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है, इसलिए वह दिन दूर नहीं जब हमारे भोजन के हरेक दाने पर किसी न किसी बहुराष्‍ट्रीय कंपनी का नाम लिखा हो। यह भी संभव है कि तब हम फसलों को धान, गेहूं, अरहर, आलू, बैंगन, कपास जैसे उनके पारंपरिक नामों के बजाय ब्रांडनेम (पेप्‍सी व कोकाकोला की तरह) से जानें।

(फोटो बीबीसी हिन्‍दी से साभार)