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Monday, December 7, 2009

अंतरिक्ष के जौ की ‘स्‍पेस बीयर’, जापान में मची धूम, सिर्फ खुशकिस्‍मतों को मिलेगी

राब के शौकीन लोगों के लिए यकीनन यह एक रोचक खबर है। वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में जौ उपजाकर बीयर तैयार की है और इसका नाम 'स्पेस बार्ली' रखा है। जापान में इन दिनों इसकी धूम मची है, और अंतरिक्ष में उपजाए गए जौ से बने होने के कारण इसे ‘स्‍पेस बीयर’ कहा जा रहा है।

गौरतलब है कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) पर रूसी लैबोरेटरी में पहली बार जौ उपजाया गया है। पांच माह तक चले इस मिशन में रशियन एकेडेमी ऑफ साइंस, जापान की ओकायामा यूनिवर्सिटी और शराब तैयार करने वाली कंपनी सपोरो बेवरीज शामिल रहे। बताते चलें कि अंतरराष्‍ट्रीय अंतरिक्ष स्‍टेशन में जौ गेहूं, चना, मटर आदि जैसी खाद्य फसलों को उपजाने की एक योजना के तहत जौ उपजाया गया। योजना के तहत भविष्‍य में अंतरिक्ष में आलू की खेती भी की जा सकती है।

सपोरो ब्रेवरीज लिमिटेड के अधिकारियों ने सोमवार को बताया कि 'स्पेस बीयर' के 250 बोतलों के स्पेशल एडिशन की जबर्दस्त मांग है। कंपनी का कहना है कि यह बीयर उस जौ से बनेगा, जिसका बीज अंतरिक्ष के स्पेस स्टेशन की रूसी प्रयोगशाला में पांच महीने तक रहा।

कंपनी के प्रवक्ता यूकी हत्तोरी ने कहा कि हमें कल तक 2000 लोगों से आर्डर मिल गए थे। इसके दाम को देखते हुए हमें लगता है लोगों की इस बीयर में बेहद रूचि है। स्पेस बीयर के एक बोतल की कीमत 20 डालर के लगभग है।

सपोरो ब्रेवरीज लिमिटेड ने कहा कि इस बीयर का आर्डर वह क्रिसमस तक लेगी और फिर लकी ड्रा के द्वारा खुशकिस्मत विजेता और ग्राहकों का चयन किया जाएगा। बीयर की बिक्री से मिले पैसों को शोधकार्यो के लिए दान दे दिया जाएगा।

Sunday, November 29, 2009

मेंथा यानी पिपरमिंट : यूपी ने अकेले पछाड़ दिया चीन को

ताकत, शोहरत और बाजार में सस्ते उत्पादों के दम पर चीन की चौधराहट का डंका भले ही दुनिया भर में रहा हो, लेकिन एक मामले में भारत क्या वह उत्तर प्रदेश के सामने ही घुटने टेक चुका है। मेंथा ऑयल के उत्पादन में दशकों तक ग्लोबल मार्केट में धाक रखने वाला चीन आज भारत के सामने बौना साबित हो चुका है। अकेले यूपी में पूरे देश का 92 फीसदी मेंथा का उत्पादन होता है। विश्व के कुल निर्यात मार्केट में इसकी 86 फीसदी हिस्सेदारी है।

खाने पीने की चीजों में होने वाले ठंडेपन का अहसास असल में मेंथा यानी पिपरमिंट की देन है। इस ठंडे में यूपी के किसानों का फंडा लगा हुआ है। कम लागत और दो फसलों के बीच मेंथा पैदा करने की कला के दम पर कभी मेंथा का चीन से आयात करने वाले भारत ने उसे पीछे छोड़ दिया है। भारत आज इसके उत्पादन में दुनिया का सिरमौर बन गया है।

कन्नौज स्थित प्रतिष्ठित संस्थान एफएफडीसी (फ्रेगनेंस एंड फ्लेवर डेवलमेंट सेंटर) के डिप्टी डायरेक्टर शक्ति विनय शुक्ला ने बताया कि मेंथा की खेती की शुरुआत भारत में 70 के दशक के बाद ही शुरू हुई। 1954 में जापान से इसके सात पौधे लाकर लगाए गए थे। तब जापान ही इसका सबसे बड़ा उत्पादक देश था। बाद के दशकों में चीन ने इस मामले में सभी को पीछे छोड़ दिया। 1980 तक भारत चीन से ही अपनी जरूरत का मेंथा ऑयल आयात करता रहा। जापान से लाए गए पौधों पर लंबे समय तक शोध किया गया। सबसे पहले एच-77 के नाम से मेंथा की हाइब्रिड नस्ल तैयार की गई। बाद में गोमती, हिमालया बाजार में आई। 1998 में मेंथा की कोसी नस्ल तैयार हुई। इसके बाद से ही देश ने मेंथा उत्पादन में बढ़त बनाना शुरू कर दिया।

विश्व में 22 हजार टन मेंथा ऑयल का उत्पादन होता है। इसमें 19 हजार टन तेल अकेले भारत में निकाला जाता है। इसका भी 90 फीसदी हिस्सा यूपी में पैदा होता है। देश के कुल 1 लाख 60 हजार हेक्टेयर में मेंथा की खेती होती है। इसमें भी 95 फीसदी रकबा अकेले यूपी में है। यूपी के बाराबंकी, सीतापुर, बलरामपुर, लखनऊ, बदायूं, रामपुर और बरेली में इसकी खेती होती है।

एसेंसियल ऑयल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष शैलेंद्र जैन ने बताया कि दशकों तक मेंथा बाजार पर काबिज रहे चीन का वर्चस्व खत्म हो गया है। यह सब यूपी की दम पर ही हुआ है। शक्ति शुक्ला के मुताबिक वायदा बाजार में आज मेंथा की धूम है। कन्नौज स्थित एफएफडीसी सेंटर में मेंथा ऑयल शुद्धता की जाच को हर रोज दर्जनों नमूने देशभर से आते हैं।
दैनिक जागरण से साभार
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Tuesday, November 3, 2009

तब बाढ़ में भी नहीं डूबेंगे धान के पौधे !

तेज बरसात की वजह से चावल के पौधे पानी में बिलकुल डूब जाते हैं। अब जापानी वैज्ञानिकों ने ऐसे जीनों का पता लगाया है जिनके जरिए चावल के पौधे का विकास इस तेजी से बढ़ाया जा सकता है कि वह पानी में डूबे ही नहीं।

भारत में चावल उगाने वाले किसान जहां बरसात के लिए तरसते हैं, वहीं उससे बहुत डरते भी हैं। उनके मन में कई सवाल होते हैं, क्या बरसात ठीक वक्त पर आएगी, ज़्यादा तेज और लंबी तो नहीं होगी, कितनी बार फसल बरसात की वजह से खराब हो जाती है और हज़ारों किसानों के लिए भारत में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और दूसरे एशियाई देशों में भी गुजारा करना मुश्किल हो जाता है।

अक्सर यह देखा गया है कि तेज बरसात की वजह से चावल के पौधे पानी में बिलकुल डूब जाते हैं। खेतों मे बढ़ता हुआ जलस्तर चावल के पौधों के लिए सामान्‍यत: अच्छा ही रहता है, लेकिन यह ज़रूरी है कि पौधे के उपरी हिस्से हवा के संपर्क में बने रहें। हालांकि मानसूनी इलाकों में बरसात और बाढ की वजह से चावल के खेतों में पानी इतना ज्‍यादा भर जाता है कि धान के पौधे बिल्कुल डूब जाते हैं तथा इससे वे सड़ने लगते हैं और मर भी जाते हैं।

गौरतलब है कि गहरे पानी में उगनेवाले चावल की प्रजाति को जलजमाव से कोई समस्या नहीं होती। पानी के साथ-साथ उसके तने वाले डंठल भी बढ़ते जाते हैं। जापान के नागोया विश्वविद्यालय के मोतोयुकी अशिकारी कहते हैं:
गहरे पानी में उगने वाले चावल के पौधे, पानी की गहराई से ऊपर बने रहने के लिए, एक मीटर तक बढ़ सकते हैं। वे हवा के संपर्क में बने रहने के लिए ऐसा करते है। वे अंदर से खोखले होते हैं, लेकिन उसके जरिए पौधा पानी की सतह से उपर पहुंच सकता है और ऑक्सीजन पा सकता है। यह कुछ ऐसा ही है कि जब आप गोताखोरी कर रहे होते हैं, तो पानी से ऊपर निकली एक नली से सांस लेते हैं।
बरसात के समय ऐसे चावल के तने 25 सेंटीमीटर प्रतिदिन की एक अनोखी गति से बढ़ सकते हैं। अशिकारी और उनकी टीम ने इस प्रक्रिया को समझने के लिए इस चावल के जीनों से यह समझने की कोशिश की कि चावल बरसात के वक्त अपने विकास को किस तरह नियंत्रित करता है। अध्ययनों से अब तक जितना पता चला है वह यह है कि एक गैसीय विकास-हॉर्मोन एथीलिन इसके लिए जिम्मेदार है, जैसाकि नीदरलैंड के उएतरेश्त विश्वविद्यालय के रेंस वोएसेनेक बताते हैं:
जब पौधा पूरी तरह पानी में डूब जाता है तब यह गैस ठीक तरह से मुक्त नहीं हो पाती। यू कहें कि वह पौधे में ही कैद हो जाती है। यानी पौधे में एथिलिन की मत्रा बढ़ने लगती है। यह पौधे के लिए संकेत है कि वह पानी में डूब रहा है और उसे कुछ करना है।
जापानी विशेषज्ञों ने पता लगाने की कोशिश की कि कौन से जीन इस स्थिति में सक्रिय होते हैं। उन्होने ऐसे जीन पाए जिनको वे गोताखोरी में इस्तेमाल होनेवाली नली के अनुरूप स्नोर्कल जीन कहते हैं। ये जीन तभी सक्रिय होते हैं जब पौधे के तने में एथिलिन की मात्रा बढ़ने लगती है। वे पौधे के विकास को तेज करने वाले दूसरे तत्वों का उत्पादन शुरू कर देते हैं। मोतोयुकी अशिकारी कहते हैं:
हमने क्रॉमोसोम 1,3 और 12 पर यह तथाकथित नलिका जीन पाए। उन्हें यदि सामान्य चावल के पौधों में भी मिलाया जा सके, तो बरसात के वक्त सामान्य चावल के पौधे भी वही करेंगे जो गहरे पानी में उगने वाला चावल करता है। मुझे पूरा विश्वास है कि हम चावल की हर प्रजाति को गहरे पानी में उगने वाले चावल की प्रजाति बना सकते हैं।
यानी इन जीनों की मदद से चावल की उस फसल को बचाया जा सकता है जो पानी की अधिकता के प्रति बहुत संवेदनशील है। जहां अक्सर बाढ आती है वहां के किसानों की इस बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है। एक और समस्या भी दूर हो सकती है - गहरे पानी में उगने वाला चावल बहुत ही कम फसल देता है, प्रति हेक्टेयर सिर्फ एक टन जो उपजाऊ क़िस्मों की तुलना में सिर्फ 20 फीसदी के बराबर है। नीदरलैंड के विशेषज्ञ रेंस वोएसेनेक बहुत ही आशावादी हैं:
विकास के लिए जिम्मेदार इन जीनों के बारे में पता चल जाने के बाद अब हम चावल की अलग-अलग प्रजातियों के बीच प्रकृतिक संवर्धन के जरिए, यानी वर्णसंकर के जरिए भी इन जीनों को उनके पौधे में डाल सकते हैं। इसके लिए किसी जीन तकनीक जरूरत ही नहीं हैं।
जापान के विशेषज्ञों ने यह काम शुरू कर भी दिया है। उनके अध्ययनों से एक बार फिर पता चलता है कि पौधों के संवर्धन के लिए उनके जीनों में असामान्य गुणों की तालाश कितनी जरूरी है।

फोटो नेचर पत्रिका से साभार (बांग्‍लादेश में गहरे पानी में उगनेवाला धान)
आलेख रेडियो डॉयचवेले पर प्रकाशित प्रिया एसेलबोर्न और राम यादव की रिपोर्ट पर आधारित

Tuesday, June 30, 2009

धरती का सर्वाधिक संपूर्ण डिजीटल नक्‍शा प्रकाशित

अमेरिकी अंतरिक्ष संगठन नासा और जापानी अर्थव्‍यवस्‍था, वाणिज्‍य व उद्योग मंत्रालय ने मिलकर पृथ्वी की सतह का अब तक का सबसे संपूर्ण और विहंगम नक्शा तैयार किया है। अपनी तरह के इस पहले डिजीटल टोपोग्राफिक नक्शे के डेटा में क़रीब 13 लाख छवियां हैं, जिनमें अमेरिका की मौत की घाटी से लेकर हिमालय की अथाह ऊंचाइयों तक धरती के करीब सभी दुर्गम कोने शामिल हैं।

धरती की लगभग यह संपूर्ण तस्‍वीर अमेरिका के टेरा (Terra) नामक उपग्रह से जापान के एस्‍टर (ASTER - Advanced Spaceborne Thermal Emission and Reflection Radiometer) नामक शक्तिशाली डिजीटल कैमरा से उतारी गयी है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस अभूतपूर्व नक्शे में पृथ्वी की 99 फीसदी सतह कवर हो गयी है। इसे नाम दिया गया है ग्लोबल डिजीटल इलिवेशन मैप (Global Digital Elevation Map)। यह नक्शा प्रकाशित कर दिया गया है और कोई भी इसे डाउनलोड या इस्तेमाल कर सकता है।

एस्‍टर परियोजना से जुड़े नासा के वैज्ञानिक वुडी टर्नर कहते हैं – ‘’यह दुनिया में उपलब्‍ध अब तक का सबसे संपूर्ण व सुसंगत ग्‍लोबल डिजीटल इलेवेशन डेटा है। आंकड़ों का यह अनूठा भूमंडलीय संग्रह उन उपयोगकर्ताओं व अनुसंधानकर्ताओं के लिए काफी काम का होगा जिन्‍हें धरती के सतह व उठाव संबंधी जानकारियों की जरूरत होती है। परियोजना से जुड़े वैज्ञानिक माइक अब्राम्स के मुताबिक यह डेटा इंजीनियरिंग, ऊर्जा-दोहन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, पर्यावरणीय प्रबंधन, लोक निर्माण उद्यमों, अग्निशमन, भूगर्भ विज्ञान, मनोरंजन और शहर नियोजन जैसे क्षेत्रों में अपनी बेमिसाल भूमिका निभा सकता है।

इससे पहले इस तरह का सबसे संपूर्ण टोपोग्राफिक डेटा नासा के शटल रडार टोपोग्राफी मिशन का था, जिसने पृथ्वी के 80 फ़ीसदी भूभाग का मानचित्र उतारा था। यदि आप इस संबंध में ज्‍यादा जानकारी के इच्‍छुक हैं तो निम्‍नलिखित कडि़यों का अवलोकन कर सकते हैं :

NASA, Japan Release Most Complete Topographic Map of Earth

ASTER Global Digital Elevation Map Announcement