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Wednesday, August 19, 2009

सम्‍मान उस क्रांति का जो शौचालयों के जरिए आयी!

भारत में अनेक बड़े राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक व आर्थिक परिवर्तनों का सूत्रपात बिहार से हुआ है। लेकिन मौजूदा बिहार में वैसे नवाचारों की कल्‍पना नहीं की जाती। इसलिए बिहारी मिट्टी से जन्‍मा कोई शख्‍स शौचालय जैसी तुच्‍छ चीज के जरिए संभावनाओं का सूर्योदय करा डाले तो बात गौर करने की जरूर है। जी हां, हम बात कर रहे हैं बिन्‍देश्‍वर पाठक की, जिन्‍होंने भारत में सुलभ शौचालय के जरिए एक ऐसी क्रांति लायी, जिसने बहुतों की जिंदगी बदल दी। उनके बनाए सुलभ शौचालयों में जहां भंगियों को रोजगार मिला और सिर पर मैला ढोने के अमानवीय यंत्रणा से उन्‍हें मुक्ति मिली, वहीं ये शौचालय स्‍वच्‍छता के साथ गैर पारंपरिक उर्जा उत्‍पादन के भी स्रोत बने।

इन दिनों स्‍टॉकहोम में विश्‍व जल सप्‍ताह मनाया जा रहा है, जहां भारत के बिन्‍देश्‍वर पाठक को विश्‍व जल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया जा रहा है। निश्चित तौर पर यह सम्‍मान उस क्रांति का भी है, जो शौचालयों के जरिए आयी। बिन्‍देश्‍वर पाठक को भारत में शौचालय क्रांति का जनक माना जाता है। उनकी यह टिप्‍पणी सोचने लायक ही है, ‘’टॉयलेट सोचने की जगह है। हम वहां बैठ सकते हैं और अपने सवालों के जवाब सोच सकते हैं। बैठते हुए हम नीचे की ओर देखते हैं, सोचने के लिए यह सबसे अच्छी पॉज़िशन है। टॉयलेटों में कितनी समस्याओं के समाधान मिल जाते हैं।"

बिन्‍देश्‍वर पाठक का जन्‍म 1943 में बिहार में हुआ था। उन्‍होंने पटना विश्‍वद्यालय से 1964 में समाजशास्‍त्र में ग्रेजुएशन किया। अपने काम की शुरुआत उन्‍होंने 1970 में की और फिर उनके संगठन ने सस्ते और सुलभ शौचालय बनाना शुरू किया। आज सुलभ इंटरनैशनल के सौजन्य से 12 लाख घरों में रह रहे लोग स्वच्छ जीवन का आनंद ले रहे हैं और 7 हज़ार से ज्यादा सार्वजनिक शौचालयों के जरिए चलते-फिरते लोगों की परेशानी भी दूर की जा सकी है। नई दिल्ली में एक ख़ास टॉयलेट संग्रहालय भी खोला गया है। इसमें पाठक का बनाया पहला शौचालय भी देखा जा सकता है।

बिन्‍देश्‍वर पाठक कहते हैं, "जो टॉयलेट मैंने सबसे पहले बनाया था, वह मेरे लिए सबसे दिलचस्प है। क्योंकि मैंने इससे पहले फ़्लश वाले टॉयलेट का इस्तेमाल नहीं किया था। जब मैं गांव में रहता था, तब हम खेतों में जाते थे। और फिर शहर में साधारण लैट्रीन में। जब मैंने पहली बार सुलभ टॉयलेट बनाया और उसे खुद इस्तेमाल किया, तो मुझे बड़ी ख़ुशी हुई।"
उनके संगठन ने न केवल दस्त जैसी बीमारियों की रोकथाम करने में मदद की है, बल्कि सामाजिक रूप से मैला ढोने के लिए मजबूर कई लोगों की ज़िंदगियों को बदल डाला। विश्व जल सप्ताह की निर्देशक सीसीलिया मार्टिनसेन का कहना है कि बिंदेश्वर पाठक की वजह से मानवीय मल को किस तरह संभाला जा सकता है, यह सवाल विश्व एजेंडे में शामिल हुआ।

Friday, July 24, 2009

मात्र 23 साल की उम्र में रच डाला ज्‍योतिष का सबसे वैज्ञानिक ग्रंथ... इतने महान थे आर्यभट।

प्राचीन भारत के महान खगोलविद व गणितज्ञ आर्यभट के बारे में काफी कुछ कहा जाता है और लिखा जाता है, लेकिन सच्‍चाई यह है कि उनके बारे में प्रामाणिक तौर पर बहुत कम जानकारी उपलब्‍ध है। उनके व्‍यक्तिगत अथवा पारिवारिक जीवन के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं मिलती। हम यह भी नहीं जानते कि वे कहां के रहनेवाले थे और उनका जन्‍म किस जगह पर हुआ था। यहां प्रस्‍तुत उनकी प्रतिमा का फोटो विकिपीडिया से उद्धृत है। यह प्रतिमा पुणे में है, लेकिन चूंकि आर्यभट की वेश-भूषा के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए यह प्रतिरूप कलाकार की परिकल्पना की ही उत्पत्ति है।

आर्यभट के बारे में हमारी जानकारी का एकमात्र आधार उनकी अमर कृति आर्यभटीय है, जिसके बारे में कहा जाता है कि ज्‍योतिष पर प्राचीन भारत की सर्वाधिक वैज्ञानिक पुस्‍तक है। आर्यभटीय आर्यभट का एकमात्र उपलब्‍ध ग्रंथ है। उन्‍होंने अन्‍य ग्रंथों की रचना भी की होगी, पर वे वर्तमान में नहीं मिलते। आर्यभटीय के एक श्‍लोक में आर्यभट जानकारी देते हैं कि उन्‍होंने इस पुस्‍तक की रचना कुसुमपुर में की है और उस समय उनकी आयु 23 साल की थी। वे लिखते हैं : ‘’कलियुग के 3600 वर्ष बीत चुके हैं और मेरी आयु 23 साल की है, जबकि मैं यह ग्रंथ लिख रहा हूं।‘’

भारतीय ज्‍योतिष की परंपरा के अनुसार कलियुग का आरंभ ईसा पूर्व 3101 में हुआ था। इस हिसाब से 499 ईस्‍वी में आर्यभटीय की रचना हुई। अत: आर्यभट का जन्‍म 476 में होने की बात कही जाती है।

बिहार की मौजूदा राजधानी पटना को प्राचीनकाल में पाटलीपुत्र, पुष्‍पपुर और कुसुमपुर भी कहा जाता था। इसी आधार पर माना जाता है कि आर्यभट का कुसुमपुर आधुनिक पटना ही है। लेकिन इस मत से सभी सहमत नहीं हैं। आर्यभट के ग्रंथ का दक्षिण भारत में अधिक प्रचार रहा है और मलयालम लिपि में इस ग्रंथ की हस्‍तलिखित प्रतियां मिली हैं। इस आधार पर आर्यभट के कर्नाटक या केरल का निवासी होने की संभावना भी जताई जाती है।

प्राचीन भारत के खगोलविदों में आर्यभट के विचार सर्वाधिक वैज्ञानिक व क्रांतिकारी थे। प्राचीन काल में पृथ्‍वी को स्थिर माना जाता था। किंतु आर्यभट ने कहा कि पृथ्‍वी गोल है और यह अपने अक्ष पर घूमती है, यानी इसकी दैनंदिन गति है। इस सत्‍य वचन को कहनेवाले आर्यभट भारत के एकमात्र ज्‍योतिषी थे। हालांकि आर्यभट ने यह नहीं कहा था कि पृथ्‍वी सूर्य की परिक्रमा करती है।

आर्यभट ग्रहणों के असली कारण जानते थे। उन्‍होंने स्‍पष्‍ट तौर पर लिखा है, ‘’ चंद्र जब सूर्य को ढक लेता है और इसकी छाया पृथ्‍वी पर पड़ती है तो सूर्यग्रहण होता है। इसी प्रकार पृथ्‍वी की छाया जब चंद्र को ढक लेती है तो चंद्रग्रहण होता है।‘’

वस्‍तुत: आर्यभट ने भारत में गणित-ज्‍योतिष के अध्‍ययन की एक स्‍वस्‍थ परंपरा को जन्‍म दिया था। उनकी रचना आर्यभटीय भारतीय विज्ञान की ऐसी महान कृति है जो यह साबित करती है कि उस समय हमारा देश गणित-ज्‍योतिष के क्षेत्र में किसी भी अन्‍य देश से पीछे नहीं था। आर्यभट ने आधुनिक त्रिकोणमिति और बीजगणित की कई विधियों की खोज की थी। इस महान खगोलशास्‍त्री के नाम पर ही भारत द्वारा प्रक्षेपित पहले कृत्रिम उपग्रह का नाम आर्यभट्ट रखा गया था। 360 किलो का यह उपग्रह अप्रैल 1975 में छोड़ा गया था।

ध्‍यान रखने की बात है कि भारत में आर्यभट नाम के एक दूसरे ज्‍योतिषी भी हुए हैं, परंतु वे पहले आर्यभट जैसे प्रसिद्ध नहीं हैं। दूसरे आर्यभट का काल ईसा की दसवीं सदी माना जाता है तथा आर्यसिद्धांत नामक उनका एक ग्रंथ भी मिलता है।

आर्यभट की वेधशाला और दो रुपए में परिवार की खुशी खरीदते लोग!

‘’खट्टा-मिट्ठा चूस, दो रुपए में बाल-बच्‍चा खुश।‘’ दोनों हथेलियों में सस्‍ते लेमनचूस के छोटे-छोटे पैकेट लिए इन्‍हीं लफ्जों के साथ सुरीले अंदाज में अपने सामान का विज्ञापन करता दुर्बल-सा आदमी। और, डिब्‍बे की भीड़-भाड़ में खड़े होने की जगह के लिए संघर्ष कर रहे मटमैले कपड़े पहने दबे-कुचले लोग जो दो रुपए में बच्‍चों की खुशी खरीदकर खुद भी खुश दिख रहे हैं। पटना-गया लाइन के तरेगना और छोटे-बड़े अन्‍य स्‍टेशनों व हाल्‍टों की मेरे लिए अभी तक पहचान यही थी। यह कयास लगाना काफी रोचक है कि क्‍या भविष्‍य में भी मैं उस जगह को इन्‍हीं बिम्‍बों के जरिए पहचानूंगा!

बिहार के तरेगना गांव को इतनी अंतरराष्‍ट्रीय प्रसिद्धि सैकड़ों सालों में पहले कभी नहीं मिली होगी। राजधानी पटना से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस छोटे-से गांव में 22 जुलाई की सुबह हुए 21-वीं सदी के सबसे लंबे सूर्यग्रहण को सबसे अधिक समय तक देखा जाना था। अंतरिक्षवैज्ञानिकों का कहना था कि तरेगना सूर्यग्रहण के 'सेंट्रल लाइन' पर स्थित है, और इसलिए यहां ग्रहण को साफ और अधिक समय तक देखने-परखने में आसानी होगी। हालांकि आकाश में बादलों के घिर आने के चलते वहां दुनिया भर से इकट्ठा हुए हजारों लोगों को निराशा ही हाथ लगी। इनमें आम लोगों के अलावा अमेरिकी अंतरिक्ष संगठन नासा सहित देश-विदेश से आए वैज्ञानिक, खगोलविद, छात्र और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व उपमुख्‍यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी शामिल थे। इसके बावजूद लोग दिन में रात जैसा अंधेरा देखकर उत्‍साहित थे और मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने तरेगना में खगोलीय अध्ययन के लिए एक केंद्र की स्थापना करने की घोषणा की। अब देखना है कि वे अपनी घोषणा कितनी जल्‍द और किस सीमा तक पूरी करते हैं।

माना जाता है कि तरेगना में प्राचीन भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ व खगोलविद आर्यभट (476 ईस्वी) तारों का अध्‍ययन किया करते थे। बताया जाता है कि तरेगना के पूर्व में 70 फुट की एक मीनार थी। इसी मीनार पर आर्यभट की वेधशाला (ऑब्जर्वेटरी) थी जहां बैठकर वह अपने शिष्यों के साथ ग्रहों की चाल का अध्ययन किया करते थे। तारे गिनने के चलते ही इस जगह का नाम तरेगना पड़ा। ऐसा माना जाता है कि इस जगह का संस्कृत नामाकरण तारक-गणना कालांतर में तरेगना कहा जाने लगा।

उपर दिया गया चित्र, तरेगना गांव के उसी स्‍थल का है, जहां आर्यभट की वेधशाला होने की बात कही जाती है। हालांकि अब उस जगह पर निजी मकान है।

उल्‍लेखनीय है कि पटना के समीप ही एक अन्‍य जगह है जिसका नाम खगौल है। अक्‍सर कहा जाता है कि यह जगह भी प्राचीन काल में खगोलीय अनुसंधान का केन्‍द्र था और इसीलिए उसका नाम खगौल पड़ा।

इन जनश्रुतियों में सच्‍चाई कितनी है, यह कहना मुश्किल है। लेकिन यह तो निश्चित जान पड़ता है कि बिहार की मौजूदा राजधानी पटना का इलाका आर्यभट का कर्मस्‍थल रहा था। अपनी एकमात्र उपलब पुस्‍तक आर्यभटीय के एक श्‍लोक में वे कहते हैं कि उन्‍होंने इस पुस्‍तक की रचना कुसुमपुर में की। इतिहासकारों की मान्‍यता है कि आधुनिक पटना को ही प्राचीनकाल में पाटलीपुत्र, कुसुमपुर और पुष्‍पपुर भी कहा जाता था।

(फोटो बीबीसी हिन्‍दी से साभार)

Saturday, June 13, 2009

बिहारी कंपनी समेत तीन भारतीय परियोजनाओं को ग्‍लोबल ग्रीन एनर्जी अवार्ड

बिहार की एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी सहित भारत में अपनी परियोजनाओं पर काम कर रहे तीन संगठनों को वर्ष 2009 के लिए अक्षय ऊर्जा के प्रतिष्ठित ऐशडेन अवार्ड (Ashden Awards) से सम्‍मानित किया गया है। स्‍थानीय समुदायों के बीच नवीकरण योग्‍य ऊर्जा के क्षेत्र में इनके योगदान के लिए गुरुवार की शाम लंदन में प्रिन्‍स चार्ल्‍स ने बिहार के सारन रिन्‍युएबल एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड और फ्रांसीसी एनजीओ जीइआरइएस (GERES) को हरेक को बीस हजार पौंड, जबकि इंटरनेशनल डेवलपमेंट इंटरप्राइजेज इंडिया (IDEI) को पंद्रह हजार पौंड के पुरस्‍कार प्रदान किए।

ऐशडेन पुरस्‍कारों को ग्‍लोबल ग्रीन एनर्जी अवार्ड अथवा ग्रीन ऑस्‍कर भी कहा जाता है।

बिहार के सारन रिन्‍युएबल एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को प्रतिदिन 11 घंटे बिजली प्रदान करनेवाले गैसीफिकेशन संयत्र के लिए ऐशडेन रिन्‍यूएबल्‍स फॉर इकोनोमिक डेवलपमेंट अवार्ड दिया गया। स्‍थानीय नवीकरण योग्‍य स्रोतों से प्राप्‍त होनेवाले बायोमास से चलनेवाला यह संयत्र रह-रह कर धोखा देनेवाली ग्रिड की विद्युत आपूर्ति का एक सस्‍ता और टिकाउ विकल्‍प है। लिमिटेड कंपनी द्वारा बिहार के सारण जिले में स्‍थापित इस संयत्र से प्रति वर्ष 200 मेगावाट बिजली पैदा होती है, जिसे स्‍थानीय उद्यमियों, किसानों, अस्‍पताल और स्‍कूल को बेचा जाता है। इसके गैसीफायर प्‍लांट और उसमें इस्‍तेमाल होनेवाले जैविक ईंधन को बगल के चित्रों में देखा जा सकता है।

फ्रांसीसी स्‍वयंसेवी संस्‍था जीइआरइएस (GERES) को लद्दाख के हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में ग्रामीणों के पोषण (nutrition) में सुधार और उनकी आमदनी में बढ़ोतरी लाने के लिए ऐशडेन अवार्ड फॉर इंप्रूव्‍ड न्‍यूट्रीशन दिया गया। संस्‍था ने स्‍थानीय संगठनों को सोलर ग्रीनहाउस के जरिए सालों भर ताजी सब्जियां उगाने में मदद की, जिससे यह उपलब्धि हासिल हो सकी।

इंटरनेशनल डेवलपमेंट इंटरप्राइजेज इंडिया (IDEI) को उसके द्वारा तैयार किए गए पांव-पंप (ट्रेडिल पंप / Treadle Pump) के लिए ऐशडेन आउटस्‍टैंडिंग अचीवमेंट अवार्ड से नवाजा गया। कहा जा रहा है कि इस विधि से खेतों की सिंचाई कर साढ़े सात लाख किसान अपनी गरीबी दूर भगाने में सक्षम हुए हैं। इस संगठन को 2006 में भी ऐशडेन पुरस्‍कार मिला था। तब से यह ड्रिप सिंचाई पद्धति के क्षेत्र में भी काम कर रहा है तथा दुनिया भर में अपने उत्‍पादों को बेच रहा है।

Saturday, July 5, 2008

बिहार से जुड़े हैं विकास के प्रतिमान : सुलभ इंटरनेशनल और सुधा डेयरी

भारत जैसे जनसंख्‍याबहुल व कृषिप्रधान देश के लिये विकास के जो अनुकरणीय प्रतिमान हो सकते हैं, उनमें सुलभ इंटरनेशनल और सुधा डेयरी के नाम प्रमुखता से लिये जा सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की सर्वसमावेशी विकास से संबंधित एक रिपोर्ट में मानव प्रगति के साथ संपत्ति-सृजन में सुलभ इंटरनेशनल की भूमिका को खासा महत्‍व दिया गया है। सुधा डेयरी की सफलता की कहानी भी समाचार माध्‍यमों की सूर्खियां बनती रही है। खास बात यह है कि इन दोनों का संबंध उसी बिहार प्रदेश से है, जिसके नाम से ही कई लोग मुंह बनाने लगते हैं। खेती-बाड़ी में हम पेश कर रहे हैं उन दोनों संस्‍थाओं से संबंधित दो खबरें :

सर्वसमावेशी विकास से दूर हो सकती है गरीबी

सर्वसमावेशी विकास (इंक्लूसिव ग्रोथ) से संपत्ति का सृजन हो सकता है और इससे निजी उद्यमों के कारोबारी मॉडल में गरीबों को जोड़कर सामाजिक परिवर्तन को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। यूएनडीपी की 2006 में शुरू किए गए 'बढ़ते सर्वसमावेशी बाजार पहल' के तहत यह अध्ययन किया गया है। इस रिपोर्ट में विकसित और विकासशील देशों के उन 50 केस स्टडी को शामिल किया गया है जिनमें मानव प्रगति और संपत्ति के सृजन के लिए प्रभावी सर्वसमावेशी कारोबारी मॉडल अपनाया गया।

इसमें भारत से सुलभ इंटरनैशनल के केस स्टडी को शामिल किया गया है जिसने एक ऐसा मॉडल बनाया है जिसमें आमदनी भी होती है और सामाजिक समस्याओं का भी समाधान होता है। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के भारतीय अनुसंधान केंद्र के द्वारा लिखित रिपोर्ट में बताया गया है कि किस प्रकार बिंदेश्वरी पाठक ने सुलभ इंटरनेशनल के माध्यम से मैला ढोने वाले भंगियों को मुक्ति दिलाई।

सुलभ ने विभिन्न तरह के बजट और जगह के हिसाब से कुल 26 तरह के टॉयलट का विकास किया है और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पदार्थों की मदद से टॉयलट बनाने के लिए 19,000 राजगीरों को प्रशिक्षण दिया गया है। इस अभियान से 60,000 लोग भंगी जीवन छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ सके हैं।

रिपोर्ट में उन रास्तों को रेखांकित किया गया है जिससे न केवल निजी क्षेत्र, बल्कि सरकारें, समुदाय और गैर सरकारी संगठन गरीबी और भूख को दूर करने और पर्यावरण सुरक्षा के साथ सामाजिक बराबरी को हासिल करने के सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य को पाने में योगदान कर सकते हैं। रिपोर्ट में एक कारोबारी रणनीति भी बताई गई है जिससे गरीबों के साथ सफल कारोबार के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर किया जा सकता है।
(इकनॉमिक टाइम्‍स से साभार)

सुधा डेयरी से निकली जीवन की धारा

पटना से 25 किलोमीटर दूर इटकी के काथाटोली गांव का सुमन कुमार अब जिंदगी अपनी शर्तों पर जी रहा है। आज उसके पास आम जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त धन और साधन हैं।

बिहार की सहकारी दुग्ध योजना सुधा डेयरी ने उसकी किस्मत को बदल दी है। एक समय था, जब वह इलाके के दूध माफिया को दूध बेचने को मजबूर था, लेकिन आज वह सारा दूध सुधा डेयरी को देता है और उसे उसकी सही कीमत मिलती है। सुधा डेयरी की स्थापना 1983 को को-ऑपरेटिव सोसाइटी के तहत की गई थी। सुधा डेयरी दूध और इसके उत्पादों से करोड़ों का व्यापार करती है।

बिहार में सुधा डेयरी ने सफलता की जो कहानी लिखी है, वह अन्य क्षेत्रों के लिए प्रेरणा भी है और मिसाल भी। इस डेयरी के बिहार और आसपास के राज्यों के 84 शहरों में 6,000 से ज्यादा आउटलेट हैं। सुधा डेयरी में प्रतिदिन 6 लाख लीटर दूध का संग्रहण होता है। लगभग 5 लाख से ज्यादा दूधवाले सुधा डेयरी से जुड़े हुए हैं। इसकी सफलता ने ऐसे प्रतिमान गढ़े हैं कि अब निजी क्षेत्र के बैंकों ने भी इन ग्वालों को जरूरत पड़ने पर ऋण मुहैया कराने की पेशकश की है। सुधा डेयरी ने श्वेत क्रांति की जो कहानी बिहार में लिखी है, उससे आज हजारों किसान और ग्वाले लाभान्वित हो रहे हैं।

सुधा डेयरी के प्रबंध निदेशक सुधीर कुमार सिंह ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि सुधा डेयरी दो नए प्लांट खोलने जा रही है। इनमें 26 एकड़ में फैला बिहारशरीफ प्लांट प्रमुख है। उन्होंने बताया कि बिहार में छह दुग्ध यूनियन हैं, जो पटना, सिमुल (मुजफ्फरपुर), समस्तीपुर, भोजपुर, बरौनी और भोजपुर में स्थित हैं। उन्होंने कहा कि सुधा डेयरी से 5 लाख से ज्यादा दुग्ध उत्पादकों को फायदा हो रहा है। डेयरी संगठन ने मवेशियों के स्वास्थ्य बीमा की भी व्यवस्था की है। इस संगठन से जुड़े किसानों को टीकाकरण की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।

उन्होंने कहा कि यूनिसेफ की मदद से सुधा डेयरी ने गांवों में कम कीमत वाले शौचालय बनाने की योजना भी चला रही है। उन्होंने कहा कि हालांकि राज्य में राज डेयरी और अमूल डेयरी का भी छोटा-मोटा बाजार है, लेकिन अगर डेयरी उद्योग की बात की जाए तो सुधा डेयरी ही लोग जानते हैं। पशु चिकित्सक संजय कुमार झा ने क हते हैं कि निश्चित तौर पर सुधा डेयरी ने बिहार में श्वेत क्रांति की दिशा बदल दी है। बिहार में कृषि और पशुपालन एक प्रमुख व्यवसाय है, लेकिन सटीक रणनीति के अभाव में यहां दुग्ध उत्पादन की स्थिति अच्छी नहीं है।

इस दिशा में सुधा डेयरी एक उम्मीद की रोशनी बनकर आई है। को-ऑपरेटिव सोसाइटी के अंतर्गत काफी कम लाभ लेकर लोगों को सेवाएं उपलब्ध करवाकर सुधा डेयरी ने व्यापार और प्रबंधन का एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया है। उन्होंने कहा कि ऐसे किसान, जो को-ऑपरेटिव दुग्ध सोसाइटी के सदस्य हैं, वे ही निजी बैंकों द्वारा दिए जा रहे ऋण और अन्य पैकेजों का लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह से सुधा ने किसानों और ग्वालों को एक बेहतर जिंदगी जीने का रास्ता दिखाया है।
(बिजनेस स्‍टैंडर्ड से साभार)

Monday, June 9, 2008

धान की खेती के लिए घातक हो सकती है अपना ही बीज चलाने की जिद

हमारे गांवों में एक कहावत है, 'जिसकी खेती, उसकी मति।' हालांकि हमारे कृषि वैज्ञानिक व पदाधिकारी शायद ऐसा नहीं सोचते। किसान कोई गलत कृषि परिपाटी अपनाए है, तो उसे सही रास्‍ता दिखाना जरूरी है। लेकिन मंत्रियों के विभाग की तरह उसे बीज व प्रौद्योगिकी बदलने को कहना कृषि का नुकसान ही करेगा। इस दुष्‍प्रवृत्ति के चलते परंपरागत कृषि प्रौद्योगिकी व बीजों के मामले में हमारा देश पहले ही काफी नुकसान उठा चुका है। खासकर हरित क्रांति के बाद आधुनिक पद्धति अपनाकर कृषि उपज बढ़ाने की दौड़ में हमने परंपरा से मिले अनुभव व ज्ञान को दरकिनार कर दिया। विश्‍वव्‍यापी खाद्य संकट की मौजूदा स्थिति में यह चिंता और अधिक प्रासंगिक हो गयी है।

पिछले कुछ समय से हमारे यहां किसानों के बीच खरीफ धान का एक प्रभेद एमटीयू-7029 काफी लोकप्रिय हुआ है। अर्ध बौने प्रजाति के इस धान को स्‍वर्णा अथवा नाटी मंसूरी (महसूरी) भी कहा जाता है। भारत के बिहार, आंध्रप्रदेश, प.बंगाल, उत्तरप्रदेश, झारखंड, उत्तरांचल, महाराष्‍ट्र, उड़ीसा, कर्नाटक, महाराष्‍ट्र, छत्तीसगढ़, मध्‍यप्रदेश आदि प्रांतों में बड़ी मात्रा में यह उपजाया जाता है। बांग्‍लादेश, श्रीलंका, चीन, म्‍यांमार आदि देशों में भी इसकी खासी पूछ है। बांग्‍लादेश में तो इसकी धूम है। हमारे लिये गर्व की बात है कि धान का यह प्रभेद बाहर से नहीं आया। इसका विकास भारत में ही आंध्रप्रदेश के मरूतेरू नामक गांव में हुआ। वहां एनजी रंगा कृषि विश्‍वविद्यालय के एक छोटे से अनुसंधान केन्‍द्र में आंध्रप्रदेश राइस रिसर्च इंस्‍टीट्यूट द्वारा इसे तैयार किया गया। इसे 1982 ई. में जारी किया गया। तब से यह आज भी हमारे देश में धान का सबसे लोकप्रिय अधिक उत्‍पादन वाला आधुनिक प्रभेद है।

लेकिन बिहार के कृषि विभाग की नजर में शायद अब यह धान-प्रभेद त्‍याग देने लायक हो चुका है। यहां के कृषि पदाधिकारी व वैज्ञानिक किसानों को इसके बदले राजेन्‍द्र मंसूरी नामक प्रभेद की खेती करने की सलाह दे रहे हैं। बिहार राज्‍य बीज निगम लिमिटेड अपने पंजीकृत धान बीज उत्‍पादकों को आधार बीज बेचकर अपनी देखरेख में उनसे प्रमाणित बीज तैयार कराता है। लेकिन खरीफ वर्ष 2008 में बिहार राज्‍य बीज निगम एमटीयू-7029 का प्रमाणित बीज तैयार नहीं करा रहा है। यहां ऐसा पहली बार हुआ है और किसान इससे असमंजस में हैं। किसान यह समझ नहीं पा रहे हैं कि धान के जिस प्रभेद को बो कर वे दशकों से भरपूर पैदावार हासिल करते आये हैं, उसे हटा क्‍यों दें। स्थिति यह है कि कृषि पदाधिकारी राजेन्‍द्र मंसूरी की खूबियां बताते नहीं थकते और किसान एमटीयू-7029 की तुलना में किसी अन्‍य प्रभेद को बेहतर मानने को तैयार नहीं।

किसानों के बीच एमटीयू-7029 की लोकप्रियता के कुछ जायज कारण हैं। 50 से 60 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर उपज देनेवाला यह धान प्रतिकूल दशाओं को भी बर्दाश्‍त कर लेता है। खासकर बिहार के मैदानी इलाकों में कहीं सूखा तो कहीं जलजमाव जैसी स्थितियां देखने को मिलती हैं। एमटीयू-7029 जलजमाव झेलने में समर्थ तो है ही, इसके बारे में बताया जाता है कि इसे नाइट्रोजन की जरूरत भी कम ही होती है। अर्ध बौना प्रभेद होने के चलते अधिक बढ़वार से इसके पौधों के गिरने का खतरा कम रहता है। इसके अलावा किसानों का अनुभव है कि धान की दौनी के समय इसके दाने बहुत आसानी से अलग हो जाते हैं। किसान समझ नहीं पा रहे कि इतनी खूबियों वाले प्रभेद को आखिर क्‍यों त्‍याग दिया जाए। कहीं ऐसा तो नहीं कि बिहार सरकार के लिए राजेन्‍द्र मंसूरी इसलिए अच्‍छा है कि उसका विकास राजेन्‍द्र कृषि विश्‍वविद्यालय, पूसा (बिहार) द्वारा किया गया। नाटी मंसूरी इसलिए त्‍याज्‍य है कि उसका विकास आंध्रप्रदेश राइस रिसर्च इंस्‍टीट्रयूट द्वारा किया गया। यदि सचमुच ऐसा है तो अपना ही सिक्‍का चलाने की मानसिकता अत्‍यंत घातक हो सकती है।

सच तो यह है कि हमारे यहां के किसान अपने अनुभव व परंपरागत कृषि ज्ञान के बूते कृषि विशेषज्ञों के दावों को भी झुठलाते रहे हैं। अभी तक कृषि विशेषज्ञ एक हेक्‍टेयर भूमि के लिए 40 किलोग्राम धान बीज का बिचड़ा डालने की अनुशंसा करते आये हैं। लेकिन बिहार के धान उत्‍पादक इलाकों में किसान मात्र 6 से 12 किलो धान बीज का बिचड़ा डालकर भरपूर उपज ले रहे हैं। अब तो कृषि विशेषज्ञ भी इस तकनीक को सही मानने लगे हैं। जाहिर है, किसानों के अनुभव व उनकी परंपरागत जानकारी का सम्‍मान न कर, उनपर कृषि वैज्ञानिकों व अधिकारियों ने अपनी पसंद थोपने की कोशिश की, तो इससे सबका नुकसान होगा। एमटीयू-7029 जैसे अधिक उपजवाले प्रभेदों से एक झटके से मुंह फेर लेने से धान की पैदावार घटना निश्चित है।