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Tuesday, April 21, 2009

जहरीला प्रोटीन पैदा करनेवाला जीन ही बीटी बैगन में !

आप यह बात जानते होंगे कि भारत का पहला जीन संवर्धित खाद्य पदार्थ बीटी बैगन सरकार की सर्वोच्‍च प्रौद्योगिकी नियामक संस्‍था जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) की स्‍वीकृति पाने के अंतिम चरण में है। उम्‍मीद है कि वर्ष 2009 के अंत तक वाणिज्यिक उत्‍पादन के लिए इसके बीज बाजार में आ जाएंगे। लेकिन क्‍या आप यह भी जानते हैं कि बीटी का मतलब क्‍या है ?

बीटी मतलब बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस (Bacillus thuringiensis)। जी हां, यह मिट्टी में पाया जानेवाला वही बैक्‍टीरिया है जिसके जीन को मोंसैंटो के जीएम मक्‍का मोन 810 में मिलाया गया है, जिसकी खेती जर्मनी में प्रतिबंधित कर दी गयी।

कहने का तात्‍पर्य है कि बीटी बैगन में भी उसी तरह का जीन डाला गया है, जिसकी वजह से मोंसैंटो के जीन संवर्धित बीटी मक्‍का मोन 810 की खेती पर जर्मनी, फ्रांस सहित छह यूरोपीय देशों में रोक लगी हुई है। रोक संबंधी पूरी खबर आप हमारे पूर्व के लेख में देख सकते हैं। बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस बैक्‍टीरिया का जीन मक्‍का में एक ऐसा जहरीला प्रोटीन पैदा करता है, जिससे मक्‍के को नुकसान पहुंचानेवाली कॉर्नबोरर तितली का लार्वा मर जाता है। बीटी बैगन में इस जीन के मिलावट के पीछे भी पौधे में नुकसानदेह कीटों को मारने की क्षमता विकसित करने की ही सोच है। संभव है इस जीन प्रोद्यौगिकी की मदद से कीटनाशकों पर होनेवाला किसानों का व्‍यय बचे तथा उपज में वृद्धि हो। लेकिन मानव स्‍वास्‍थ्‍य व पर्यावरण पर इसका कितना दुष्‍प्रभाव पड़ेगा, इसका समूचा आकलन अभी शेष है।

मोंसैंटो कंपनी द्वारा तैयार किए गए जीन परिवर्तित (gnentically engineered) मक्‍के की किस्‍मों के बारे में पर्यावरणवादियों का कहना है कि ये पर्यावरण, मिट्टी, मानव स्‍वास्‍थ्‍य व वन्‍य प्राणियों के लिए नुकसानदेह हैं। उनका कहना है कि इनकी वजह से अन्‍य फसलें भी प्रदूषित हो जाएंगी, जिससे पर्यावरण व मानव स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरा पैदा हो जाएगा। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि चूहों पर किए गए परीक्षणों में इस मक्‍का के खाने से उनकी रक्‍त-सरंचना में परिवर्तन, जनन क्षमता में ह्रास और लीवर व किडनी जैसे आंतरिक अंगों को क्षति पहुंचने की बात सामने आयी है। कहा जा रहा है कि खुद जर्मन कृषि मंत्रालय के सामने ऐसे कई वैज्ञानिक अध्ययन हैं, जो कहते है कि इस मक्के की खेती से तितलियों और गुबरैलों को ही नहीं, मिट्टी और पानी में रहने वाले कुछ दूसरे जीवधारियों को भी ख़तरा है।

गौर करने की बात है कि बीटी मक्‍का की खेती यूरोप में खाने के लिए नहीं, जानवरों को खिलाने के लिए होती है। लेकिन बीटी बैगन तो भारत में हमारे आप के जैसे इंसान खाएंगे। जब पशु चारा के रूप में जीएम फूड की खेती का इतना खतरा है तो आदमी के खाद्य पदार्थ के रूप में इसके उत्‍पादन का क्‍या दुष्‍प्रभाव होगा आप खुद ही आंक लीजिए।

Sunday, April 19, 2009

जीन संवर्धित फसल : किसानों के लिए टेंशन लेने का नहीं, देने का !

इस शीर्षक में तल्‍खी है, इस बात से हमें इंकार नहीं। लेकिन जीएम फसलों की वजह से क्षुब्‍ध किसानों को तसल्‍ली देने के लिए इससे बेहतर शब्‍दावली शायद नहीं है। वैसे यह बात गलत भी नहीं है। भारत में जीएम फसलों के प्रति बढ़ते रूझान से अब समय ही ऐसा आ रहा है कि देश के किसान आपके खाने के लिए जहरीला खाद्यान्‍न उपजाएंगे। सृष्टि का चक्र शायद कुछ इसी तरह घूमता है। अब तक उपेक्षा सह रहे किसानों को संभवत: इसी रूप में न्‍याय मिलनेवाला है।

जहां यूरोपीय देशों की सरकारें प्राणियों व पर्यावरण पर जीन संवर्धित फसलों के दुष्‍प्रभाव को लेकर उन पर रोक लगा रही हैं, भारत की सरकारी संस्‍थाएं उनके प्रचार में जुटी हैं। चिंता की बात यह है कि भारत के आम शहरी भी इस मामले में उदासीन बने हुए हैं, मानो उनके लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है। वे सोचते होंगे कि जीएम फसल से उन्‍हें क्‍या मतलब, इसके बारे में किसान जानें, पर्यावरणवादी जानें या सरकार। हालांकि उनकी यह उदासीनता उनके लिए बहुत बड़ा संकट उत्‍पन्‍न करनेवाली है, जिससे बचने का बाद में शायद कोई विकल्‍प न हो। वे यदि उदासीन न रहते तो सरकार पर इस मामले में गंभीर रहने का दबाव पड़ता।

देश में कृषि संबंधी सारी समस्‍याओं का खामियाजा अब तक सिर्फ किसान भुगतते आए हैं, लेकिन जीन संवर्धित फसलों के मामले में ऐसा नहीं होनेवाला। इनका सबसे अधिक नुकसान इन्‍हें उपजानेवालों को नहीं, बल्कि इन्‍हें खानेवालों को उठाना होगा। किसान को तो जीएम फसलों की वजह से पैदावार बढ़ने या कीटनाशकों पर लागत कम आने का शायद फायदा भी हो जाए, लेकिन गैर किसानों को तो सिर्फ क्षति ही क्षति है। किसान तो शायद अपने खाने के लिए थोड़ी मात्रा में परंपरागत फसल उपजा ले, लेकिन गैर किसानों के लिए तो बाजार सिर्फ और सिर्फ जीएम फसलों से ही पटा होगा।

हाल ही में जीन संवर्धित मक्‍के की खेती पर जर्मनी में रोक लगा दी गयी है। मोन 810 (MON810) नामक मोंसैंटो (Monsanto) कंपनी के जिस मक्‍के पर यह कार्रवाई हुई, उसकी खेती पर यूरोपीय संघ के पांच अन्‍य देशों फ्रांस, आस्ट्रिया, हंगरी, ग्रीस और लक्‍जेमबर्ग पर पहले से ही रोक लगी हुई थी। यूरोप में पशु चारे के लिए इस मक्‍के की खेती होती थी। आस्ट्रिया में मोंसैंटो के ही एक अन्‍य जीन संवर्धित मक्‍के मोन 863 (MON863) के आयात पर भी प्रतिबंध लगा हुआ है। जीएम मक्‍के की इस किस्‍म की अमेरिका व कनाडा में खेती होती है।

हालांकि भारत की सरकार और उसकी संस्‍थाएं जीन संवर्धित फसलों के प्रति सहिष्‍णु रवैया अपनाए हुए हैं। भारत में मोंसैंटो के आंशिक स्‍वामित्‍व वाली कंपनी माहीको (Mahyco) के जीन संवर्धित बीटी कपास का बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उत्‍पादन हो रहा है तथा बीटी बैगन के वाणिज्यिक उत्‍पादन की तैयारी भी अंतिम चरण में है। जिन फसलों से जीव व पर्यावरण को होनेवाली क्षति को देखेते हुए यूरोप में प्रतिबंधित किया जा रहा है, उनके प्रति भारत के रवैये का एक नमूना तमिलनाडु कृषि विश्‍वविद्यालय के अधिकृत बयान में देखा जा सकता है। संस्‍था के रजिस्‍ट्रार ने जीन संवर्धित मक्‍का को परंपरागत मक्‍का की किस्‍मों की तुलना में वरदान मानते हुए कहा है कि यह नुकसानदेह नहीं है। देश में जैव प्रौद्योगिकी का नियमन करनेवाली शीर्ष संस्‍था जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) है जो केन्‍द्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय के अधीन काम करती है। लेकिन वह जीन संवर्धित फसलों से पर्यावरण व मानव स्‍वास्‍थ्‍य को होनेवाली क्षति वाले पहलू पर गंभीरता से विचार करते नहीं जान पड़ती। खुद तत्‍कालीन केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री अंबुमणि रामदास ने कुछ माह पूर्व जीन संवर्धित फसलों का विरोध करते हुए कहा था कि बीटी बैगन को इसकी सुरक्षा पर बिना पर्याप्‍त शोध किए भारत में लाया गया है।

जाहिर है हमारी सरकारी संस्‍थाएं जीन संवर्धित फसलों के प्रति सहिष्‍णु बनी हुई हैं। बहरहाल हम जर्मन कृषि मंत्री सुश्री इल्‍जे आइगनर को जीएम मक्‍के की खेती पर प्रतिबंध के उनके साहसिक निर्णय के लिए धन्‍यवाद देते हुए यह सोचकर हैरान-परेशान हैं कि हमारे मंत्री इस तरह का फैसला क्‍यों नहीं कर पाते!

Wednesday, April 15, 2009

जीन संवर्धित मक्‍के की खेती पर जर्मनी में लगी रोक


पर्यावरण पर खतरे से चिंतित लोगों को यह जानकर खुशी हो सकती है कि जर्मनी में जीन संवर्धित मक्‍के की खेती पर रोक लगा दी गयी है। यह रोक विख्‍यात अमेरिकी बायोटेक कंपनी मोंसैंटो (Monsanto) के जीन संवर्धित मक्के मोन 810 (MON810) की खेती पर लगायी गयी है। बताया जाता है कि मोन 810 में इस तरह का जीन डाला गया है जो पौधे को नुकसान पहुंचानेवाले कीड़े कॉर्नबोरर को मारने के लिए विष का काम कर सके।

मोन 810 की खेती पर रोक लगानेवाला जर्मनी यूरोपीय संघ का छठा देश है। फ़्रांस, ऑस्ट्रिया, हंगरी, ग्रीस और लक्ज़ेमबर्ग में पहले से ही इसकी खेती पर रोक लगी हुई है। इसके अलावा ऑस्ट्रिया में मोंसैंटो के ही जीन संवर्धित मक्‍का मोन 863 (MON863) के आयात पर भी प्रतिबंध लगा हुआ है। इस फैसले का महत्‍व इसलिए और अधिक बढ़ जाता है क्‍योंकि मोन 810 ऐसी एकमात्र जीन संवर्धित फसल है, जिसकी यूरापीय संघ में वाणिज्यिक तौर पर खेती हो रही है। वहां पर इसकी खेती मुख्‍य रूप से पशु चारे के लिए की जाती है। यूरोपीय संघ में इसकी खेती का दस सालों का लाइसेंस समाप्‍त होनेवाला है और अब उसके नवीकरण की जरूरत पड़ेगी।

जर्मन कृषिमंत्री इल्जे आइगनर ने मोन 810 की खेती पर प्रतिबंध के अपने फ़ैसले की वजह बताते हुए कहा है कि इस बात का संदेह है कि जीन परिवर्तित मक्का दूसरे प्राणियों को नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि उन्‍होंने दावा किया कि उनका फैसला विज्ञान पर आधारित है और इसका अभिप्राय सभी तरह के जीन संवर्धित फसलों पर प्रतिबंध नहीं है। सुश्री आइगनर ने कहा कि जीन अभियांत्रिकी में मनुष्‍य, जानवर, पौधों व पर्यावरण की सुरक्षा की संपूर्ण गारंटी समावेशित होना जरूरी है।

मोंसैंटो कंपनी द्वारा तैयार किए गए इन जीन परिवर्तित (gnentically engineered) मक्‍के की किस्‍मों के बारे में पर्यावरणवादियों का कहना है कि ये पर्यावरण, मिट्टी, मानव स्‍वास्‍थ्‍य व वन्‍य प्राणियों के लिए नुकसानदेह हैं। उनका कहना है कि इनकी वजह से अन्‍य फसलें भी प्रदूषित हो जाएंगी, जिससे पर्यावरण व मानव स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरा उत्‍पन्‍न हो जाएगा। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि चूहों पर किए गए परीक्षणों में इस मक्‍का के खाने से उनकी रक्‍त-सरंचना में परिवर्तन, जनन क्षमता में ह्रास और लीवर व किडनी जैसे आंतरिक अंगों को क्षति पहुंचने की बात सामने आयी है। कहा जा रहा है कि मोंसैंटो के जीएम मक्‍के की इन किस्‍मों में डाले गए जीन की वजह से जो कीटनाशी विष तैयार होता है, वह मिट्टी में रिसकर केंचुआ जैसे मृदा स्‍वास्‍थ्‍य के लिए उपयोगी जीवों को हानि पहुंचाता है। इसके अतिरिक्‍त उसकी वजह से तितली, मकड़ी, चींटी आदि वन्‍य जीवों को भी नुकसान होता है।

ग्रीनपीस जैसे कई पर्यावरणवादी संगठन जीन परिवर्धित मक्‍के की इन किस्‍मों की खेती और इनके आयात पर प्रतिबंध की अरसे से यूरोप में मांग करते रहे हैं।

Saturday, August 23, 2008

आत्‍महत्‍या करनेवाले का भी गला दबा रहे मनमोहन जी?

केन्‍द्र की मनमोहन सिंह की सरकार किसानों को तबाह करने पर तुली हुई है। किसान और कृषि से संबंधित हाल में लिए गए तमाम फैसले इसी बात का संकेत दे रहे हैं। हो सकता है यह सरकार गांवों के बदले शहर बसाने के अपने घोषित इरादे को पूरा करने के लिए ऐसा कर रही हो। शायद उसकी यह सोच हो कि किसान खेती छोड़ देंगे तो गांव भी उजड़ जाएंगे।

केन्‍द्र सरकार द्वारा लिया गया सबसे ताजा किसान विरोधी फैसला गैर-बासमती चावल और मक्‍के के बीजों के निर्यात की अनुमति देना है। गौरतलब है कि सरकार ने चावल और मक्‍का के निर्यात पर पाबंदी लगा रखी थी। उन अनाजों के निर्यात पर पाबंदी अभी जारी रहेगी, अनुमति सिर्फ बीजों के निर्यात को मिली है। वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि बीज के इन पैकेटों पर साफ-साफ लिखा होगा कि ये मानव उपभोग के लायक नहीं हैं। बयान में कहा गया है कि पैकेट पर यह भी लिखा होगा कि इन बीजों में केमिकल मिला हुआ है, लिहाजा यह न तो मानव के उपभोग के काबिल हैं और न ही इनका इस्तेमाल चारे के रूप में किया जा सकता है।

लाख माथापच्‍ची करने पर भी इस निर्णय का औचित्‍य हमारी समझ में नहीं आया। आखिर किसके हित में यह फैसला लिया गया? प्रत्‍यक्ष तौर पर तो इस फैसले से दो को ही लाभ होता दिख रखा है- बीज उत्‍पादक कंपनियों को और विदेशी किसानों को। तो हम मान लें कि हमारी सरकार को अनाज उपजानेवाले अपने देश के किसानों से अधिक चिंता अनाजों की तिजारत करनेवाले कृषि निर्यातकों और विदेशी किसानों की है। कहीं इस फैसले द्वारा अनाज निर्यातकों को भ्रष्‍टाचार की पतली गली तो मुहैया नहीं करायी जा रही? कहीं ऐसा तो नहीं कि निर्यातित पैकेटों पर लिखा होगा 'केमिकल मिला बीज' और उनके अंदर भरा रहेगा 'खाने लायक अनाज'!

जहां तक भारत के किसानों की बात है तो यह फैसला उनके हित में तो नहीं ही है। इसके विपरीत इस तरह का निर्णय लेना खुद ही जान दे रहे उस समुदाय का गला घोंटने के समान है। आप स्‍वयं सोच कर देखें। चावल और मक्‍का के निर्यात पर पाबंदी के पक्ष में केन्‍द्र सरकार का तर्क है कि इससे महंगाई की ऊंची दर काबू में रहेगी। सरकार का कहना है कि इन अनाजों के निर्यात पर पाबंदी से देसी बाजार में इनकी आपूर्ति बनी रहेगी, लिहाजा कीमत में बढ़ोतरी की गुंजाइश नहीं होगी। क्‍या यही तर्क गैर-बासमती धान और मक्‍का के बीजों पर भी लागू नहीं होता? क्‍या उनके निर्यात की अनुमति से देसी बाजारों में उनकी आपूर्ति कम नहीं होगी और लिहाजा उनकी कीमतें नहीं बढ़ेंगी?

क्‍या विडंबना है? सरकार को किसानों के लिए सस्‍ता बीज मुहैया कराना चाहिए तो उलटे वह उसे और अधिक महंगा करने का उपाय कर रही है। बढ़ती महंगाई के दौर में किसानों के जीवन निर्वाह के खर्च और कृषि लागत में पहले ही काफी बढ़ोतरी हो चुकी है। बीज के मामले में तो किसानों का जमकर शोषण हो रहा है। कई कंपनियां उनसे बीज पर ढाई हजार फीसदी से भी अधिक मुनाफा वसूल कर रही है। क्‍या अभी भी सरकार का मन नहीं भरा?

अरे, माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन जी, कुछ तो रहम कीजिए देश के किसानों पर। आखिर कितना और कब तक गला दबाएंगे इस निरीह समुदाय का? जो खुद ही आत्महत्‍या कर रहा, उसका गला क्‍या दबाना? सही बात है, सरकार सरकार है, वह जो चाहे करे। लेकिन आपकी सरकार किसान हितैषी होने का दावा भी तो करती है। आप लोगों ने ही तो नारा दिया है- कांग्रेस का हाथ, अन्‍नदाता के साथ?

Tuesday, August 5, 2008

केंद्र बुझाने चला महंगाई की आग, बिहार में जल उठा मक्का

हम आरंभ से ही कहते आए हैं कि केन्‍द्र सरकार अनाजों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर भारतीय किसानों का गला घोंटने का काम कर रही है। महंगाई का सबसे अधिक बोझ किसानों को उठाने के लिए विवश किया जा रहा है। शायद केन्‍द्र सरकार की यह धारणा रही हो कि गरीब व अशिक्षित किसान उसकी इस चालाकी को समझ नहीं पाएंगे। लेकिन सरकार की चालबाजी धीरे-धीरे किसानों की समझ में आने लगी है। खेती-बाड़ी की कल की पोस्‍ट में हमने बिहार के मक्‍का उत्‍पादक किसानों की त्रासदी के बारे में चर्चा की थी। साभार प्रस्‍तुत है आज के बिजनेस स्‍टैंडर्ड की इससे संबंधित टॉप स्‍टोरी :

महंगाई की आंच से देश को बचाने की केंद्र सरकार की जुगत के नतीजे भले ही कुछ भी निकलें, मगर आग बुझाने की इसी कवायद के चलते बिहार में मक्का जरूर जलने लगा है।

इसकी भड़कती आग का आलम यह है कि इसमें राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए राज्य का कोई छोटा-बड़ा राजनीतिक दल कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ रहा है। दूसरी ओर, राज्य में इस साल हुई मक्के की बंपर पैदावार को लेकर किसान इसे बेचने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।

मक्के में लगी इस आग की वजह है, इसके निर्यात पर केंद्र द्वारा महंगाई की आग बुझाने के नाम पर हाल ही में लगाई गई पाबंदी। हालांकि मक्के को लेकर मची इस आपाधापी में सोमवार किसानों को थोड़ी राहत की खबर जरूर लेकर आया है, जिसके तहत बिहार सरकार ने राज्य में मक्के की खरीद के लिए नैफेड को अधिकृत कर दिया।

मगर यह ताजातरीन फैसला भी किसानों के लिए ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होने जा रहा है। इसकी वजह यह है कि नैफेड के जरिए सरकार इसे महज 620 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद रही है जबकि इस समय इसका बाजार भाव 1000 रुपये प्रति क्विंटल है।

बहरहाल, राज्य के खाद्य आपूर्ति सचिव त्रिपुरारी शरण ने बिजनेस स्टैंडर्ड से हुई बातचीत में आदेश की पुष्टि करते हुए बताया कि नैफेड राज्य के सभी जिलों में मक्का क्रय केन्‍द्र खोलने जा रही है। यह पूछने पर कि इस समय बाजार में मक्के का भाव 1,000 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास है, ऐसे में किसानों को बाजार मूल्य का महज 60 फीसदी ही क्यों अदा किया जा रहा है? शरण ने कहा कि राज्य सरकार एमसपी नहीं तय करती लिहाजा वह इसी कीमत पर किसानों से खरीदारी करने को मजबूर है।

कितना है मक्के का उत्पादन?

अनुमान है कि इस साल राज्य में 17 लाख टन, देश के कुल उत्पादन का 10 फीसदी, मक्के का उत्पादन हुआ है। राज्य के कई जिलों से खबर मिली है कि मक्के की बंपर पैदावार होने और निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिए जाने से इसके भंडार बारिश में यूं ही बर्बाद हो रहे हैं। कठेला, भागलपुर के राकेश चौधरी का कहना है कि प्रतिबंध से पहले इसकी आपूर्ति कोलकाता और मुंबई को की जा रही थी। लेकिन प्रतिबंध के बाद महेशकूट और मानसी स्टेशनों पर मक्के की सैकड़ों बोरियां बर्बाद होने के लिए पड़ी हैं।

हर कोई कर रहा हितैषी का दावा

राज्य का हर राजनीतिक दल खुद को मक्का किसानों का हितैषी साबित करने की कवायद में जुटा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा का दावा है कि मक्का किसानों की समस्या को सबसे पहले उन्होंने ही उठाया है। कुशवाहा के मुताबिक उनकी पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय कृषि मंत्री और राकांपा अध्यक्ष शरद पवार के सामने सबसे पहले इस मसले को उठाया।

इसके बाद मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा। बकौल कुशवाहा पवार ने उन्हें आश्वस्त किया कि इस हफ्ते से एफसीआई राज्य में मक्के की खरीद शुरू कर देगी। लेकिन एफसीआई (पटना) में अतिरिक्त महाप्रबंधक ए.एस. सैफी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि मक्के की खरीद के लिए अब तक उन्हें केंद्र से कोई आदेश नहीं मिला है।

क्या है मसला?

केंद्र ने महंगाई को थामने के लिए 3 जुलाई को मक्के के निर्यात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। यह प्रतिबंध आगामी 15 अक्टूबर तक प्रभावी रहना है। लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री ने चंद रोज पहले ही पत्र लिखकर प्रधानमंत्री से कहा कि राज्य में इस बार मक्के की बंपर पैदावार हुई है। इसलिए इस प्रतिबंध से राज्य के किसानों का उनकी फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिल सकेगा। फसल की कम कीमत से किसानों के लिए जहां लागत निकालना दूभर हो जाएगा, वहीं भीषण महंगाई के बीच उनका जीना मुश्किल हो जाएगा। लिहाजा इस प्रतिबंध को हटा लेना चाहिए।

Sunday, August 3, 2008

कितनी किसान हितैषी है केन्‍द्र सरकार : संदर्भ डब्‍ल्‍यूटीओ की जेनेवा वार्ता

विश्‍व व्‍यापार को बेहतर बनाने के लिए जेनेवा में चल रही दोहा दौर की डब्‍ल्‍यूटीओ वार्ता बिना सहमति के समाप्‍त हो गयी। कृषि और गैर कृषि वस्‍तुओं पर सब्सिडी तथा शुल्‍कों में कमी कर बहुपक्षीय विश्‍व व्‍यापार प्रणाली को उदार बनाने के समझौते के लिए 21 से 26 जुलाई तक आयोजित यह बैठक 29 जुलाई तक चली, लेकिन किसानों की आजीविका से जुड़े मुद्दों पर मुख्‍यत: अमेरिका के अडि़यल रवैये के चलते अंतत: विफल रही। जेनेवा बैठक में भारत का प्रतिनिधित्‍व करनेवाले केन्द्रीय वाणिज्य एवं उघोग मंत्री कमलनाथ के बयान जिस तरह मीडिया में देखने को मिले, उससे लगता है कि केन्‍द्र सरकार किसानों की बहुत बड़ी हितैषी है। लेकिन सच्‍चाई खाने और दिखावे के दांत भिन्‍न-भिन्‍न वाली है।

जेनेवा बैठक में भारत की ओर से कमलनाथ का स्‍टैंड निश्चित रूप से सराहनीय रहा, लेकिन घरेलू मोर्चे पर केन्‍द्र सरकार की कृषि नीति विरोधाभासी रही है। जिस समय विश्‍व व्‍यापार संगठन बैठक में जेनेवा में केन्द्रीय वाणिज्य एवं उघोग मंत्री भारतीय किसानों के हितों की दुहाई दे रहे थे, नई दिल्‍ली में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को 850 रुपये से बढ़ाकर 1,000 रुपये करने की सिफारिश को खारिज कर दिया। किस मुंह से यह सरकार किसानों की मददगार होने की बात कहती है? अमेरिका में किसानों की आबादी मात्र दो फीसदी है, फिर भी वहां उन्‍हें इतनी अधिक सब्सिडी दी जाती है कि भारत जैसे देशों को उसमें कटौती की मांग करनी पड़ती है। भारत में आबादी का दो तिहाई हिस्‍सा किसानों का ही है, फिर भी यहां की सरकार उन्‍हें उपज की वाजिब कीमत तक देने को तैयार नहीं होती। आसमान छू रही महंगाई की वजह से किसानों की कृषि लागत और जीवन निर्वाह का व्‍यय का काफी बढ़ गया है। ऐसे में उन्‍हें उपज की वाजिब कीमत भी नहीं मिलेगी तो आत्‍महत्‍या करने के अलावा और कौन-सा विकल्‍प रहेगा उनके पास?

न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य ही नहीं, कृषि उपज के व्‍यापार के मामले में भी केन्‍द्र सरकार का रवैया किसान विरोधी है। डब्‍ल्‍यूटीओ वार्ता में भारतीय किसानों के हितों के संरक्षण की ढपोरशंखी बातें करनेवाली सरकार व्‍यवहार में इसके विपरीत काम कर रही है। इस सरकार ने भारतीय किसानों पर बंदिशें थोपते हुए गेहूं, चावल व मक्‍का के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा है। भारतीय किसानों की उपज के निर्यात पर प्रतिबंध से किसके हित का संरक्षण हो रहा है, भारतीय किसानों का अथवा विदेशी किसानों का?

देश के माननीय कर्णधारो, अमेरिका से अधिक तो आप ही भारतीय किसानों का गला दबा रहे हैं। यदि गैर कृषक आबादी को सस्‍ता अनाज मुहैया कराने के लिए चावल-गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रहे हैं, तो स्‍वीकार कर लीजिए डब्‍ल्‍यूटीओ वार्ता में अमेरिकी शर्तें। आपके ही कहे अनुसार भारत में मौजूदा कीमतों से भी सस्‍ता मिलेगा लोगों को अनाज। यह अलग बात है कि तब शायद आपको महंगी दरों पर घटिया गेहूं के आयात का सुअवसर न मिले। लेकिन आप तो दोनों में से कोई भी काम नहीं कर रहे – न किसानों को वाजिब कीमत दे रहे हैं, न ही गैर किसान आबादी को सस्‍ता खाद्य पदार्थ। घोटालेबाज व जमाखोर आपकी नीतियों की वजह से जरूर मालामाल हो रहे हैं।

खबर है कि केन्‍द्र सरकार गैर बासमती चावल के निर्यात पर लगी पाबंदी की अब समीक्षा करने जा रही है। अब यदि सरकार यह पाबंदी हटा भी लेगी तो फिलहाल किसानों को कोई लाभ मिलने से रहा। जो भी लाभ होगा, व्‍यापारियों को होगा। किसान तो अपना धान, चावल कब का औने-पौने दामों पर बेच चुके हैं। अगली फसल चार-पांच माह बाद तैयार होगी।

केन्‍द्र सरकार द्वारा इस्‍पात के मूल्‍य को नियंत्रित करने की कोशिशों का विरोध घरेलू इस्‍पात उद्योग यह कह कर रहा है कि इससे औद्योगिक विकास प्रभावित होगा। तो क्‍या इसी तरह से घरेलू कृषि उपज की कीमतों को नियंत्रित करने से देश में कृषि के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ रहा? किसानों की आवाज उठानेवाली कोई मजबूत लॉबी नहीं है तो आप उन्‍हें भट्ठी में झोंक दीजिएगा?

केन्‍द्र सरकार की किसान विरोधी नीति के चलते इन दिनों बिहार के मक्‍का उत्‍पादक किसान त्राहि त्राहि कर रहे हैं। मक्‍का की बंपर उपज के बावजूद केन्‍द्र सरकार द्वारा गत जुलाई माह में उसके निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। प्रतिबंध के बाद बिहार में मक्‍के की कीमत 750 रुपये से घटकर 500 रुपये प्रति क्‍वींटल पर आ गयी है। बिहार के कोसी क्षेत्र के मक्‍का उत्‍पादक किसानों में इससे हाहाकार मचा हुआ है। मक्‍का उत्‍पादक किसानों की दुर्दशा देख सूबे के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार सहित कई राजनेताओं ने मक्‍का निर्यात पर लगी पाबंदी हटाने की मांग की है। लेकिन केन्‍द्र सरकार निर्यात पर लगी पाबंदी हटाने के बजाय बिहार से मक्‍का की खरीदारी पर विचार कर रही है। यदि मक्‍के की सरकारी खरीदारी होती भी है तो किसानों को मात्र 620 रुपये प्रति क्‍वींटल का ही न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य मिलेगा। मतलब मक्‍का उत्‍पादक किसानों के लिए हर हालत में इस साल खेती घाटे का सौदा ही होने जा रही है। यही है - कांग्रेस का हाथ, अन्‍नदाता के साथ?

Friday, July 4, 2008

गेहूं, चावल, खाद्य तेल और दालों के बाद अब मक्‍का के निर्यात पर भी प्रतिबंध

मुद्रास्फीति की बढ़ती दर से जूझ रही सरकार ने 15 अक्टूबर तक के लिए मक्का के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया, ताकि घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाई जा सके और मुर्गी के चारे व अन्य उत्पादों की कीमतों पर नियंत्रण किया जा सके।

वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के जरिए इस प्रतिबंध की घोषणा की गई जो 15 अक्टूबर तक लागू रहेगी तब तक नई फसल तैयार होगी। वित्त वर्ष 2007-08 की बंपर पैदावार के बावजूद जुलाई में मक्के की कीमत 40 फीसदी बढ़कर 970 रुपये प्रति क्विंटल हो गई जो जनवरी में 700 रुपये प्रति क्विंटल थी। सरकार ने गेहूं, गैर बासमती चावल, खाद्य तेल और दालों पर पहले ही प्रतिबंध लगा दिया है।

वाणिज्य और उद्योग मंत्री कमलनाथ ने हाल ही में कहा था कि कोई और उत्पाद है जो प्रतिबंध से बचा हुआ है। कारोबारियों ने कहा कि विशेषकर अमेरिका में जैव ईधन में मक्का के इस्तेमाल के कारण बढ़ रही वैश्विक मांग का असर घरेलू कीमतों पर भी हुआ। मक्के का इस्तेमाल कलफ [स्टार्च] उद्योग के अलावा मुर्गी और पशुओं के चारे के तौर पर होता है जिसके लिए सालाना 1.2 टन मक्के की जरूरत होती है।

उन्होंने कहा कि भारत मक्का का विश्व में छठा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। भारत द्वारा मक्के के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए जाने से अंतरराष्ट्रीय बाजार पर असर पड़ेगा। भारत ने वित्तवर्ष 2007-08 के दौरान 25 लाख टन मक्के का निर्यात किया था, जबकि इसके पिछले साल 10 लाख टन मक्के का निर्यात किया गया था। दिल्ली स्थित मुर्गी चारा विनिर्माता राम विलास मंगला ने कहा कि निर्यात में बढ़ोतरी से घरेलू बाजार की उपलब्धता और कीमत पर असर पड़ा।

कीमतों में फर्क होने के कारण भारत से निर्यात की मांग मुख्यत: पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया और पश्चिम एशिया से आती है। अमेरिका के मुकाबले भारत में मक्का लगभग आधी कीमत पर मिलता है। मुर्गी पालक और कलफ निर्माता निर्यात पर पाबंदी लगाने की मांग कर रहे थे, ताकि घरेलू कीमतों को नियंत्रित किया जा सके।

आल इंडिया स्टार्च मेन्युफेक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अमोल एस शेठ ने कहा कि भारत को चीन का अनुसरण करना चाहिए और मक्का के निर्यात का नियमन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि नई फसल की आवक से पहले इस उद्योग को 35 लाख टन मक्के की जरूरत होगी।

(दैनिक जागरण से साभार)