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Saturday, July 11, 2009

बुंडानून : आस्‍ट्रेलियाई शहर जिसने दुनिया में पहली बार लगाया बोतलबंद पानी पर प्रतिबंध, प्रांतीय सरकार ने भी खरीद की मनाही की।

आज हम आस्‍ट्रेलिया के ग्रामीण इलाके के उस छोटे-से शहर के बारे में बात करेंगे, जो अपने पर्यावरण हितैषी निर्णय के कारण दुनिया भर में सामुदायिक चेतना का मिसाल बन गया है। मात्र ढाई हजार लोगों की आबादी वाले इस कस्‍बाई शहर के बाशिंदों ने आपसी एकजुटता से ऐसा निर्णय लिया कि पर्यावरण की दुनिया में एक नयी क्रांति का सूत्रपात हुआ है।

जनसंख्‍या की दृष्टि से वहां के सबसे बड़े प्रांत न्‍यू साउथ वेल्‍स के कस्‍बाई शहर बुंडानून के निवासियों ने फैसला किया है कि शहर की दुकानों पर बोतलबंद पानी नहीं बेचा जाएगा और वहां आनेवाले बाहरी लोगों को भी इनका इस्‍तेमाल नहीं करने के लिए प्रोत्‍साहित किया जाएगा। बोतलबंद पानी के स्‍थान पर नगर की दुकानों पर अब दुबारा इस्‍तेमाल हो सकने योग्‍य बोतल बेचा जाएगा, जिस पर बुंडी ऑन टैप लेबल लगा होगा। इस बोतल में सड़क पर लगे सार्वजनिक नलों या फिल्‍टर्ड वाटर के स्रोतों से नि:शुल्‍क पानी भरा जा सकेगा। विदित हो कि बुंडानून को बोलचाल में संक्षेप में बुंडी नाम से पुकारा जाता है।

करीब 2500 लोगों की आबादी वाले इस प्राकृ‍तिक सुंदरता से भरपूर ग्रामीण नगर के करीब 250-300 नागरिक वहां के टाउन हॉल में चंद रोज पहले रात्रि में इकट्ठा हुए और प्रचंड बहुमत से नगर में बोतलबंद पानी पर प्रतिबंध का निर्णय लिया। सिर्फ दो आदमियों ने इनके पक्ष में मतदान नहीं किया, जिनमें एक स्‍थानीय नागरिक और एक बोतलबंद पानी बनानेवाली कंपनी का प्रतिनिधि था। आस्‍ट्रेलिया में यह अपने तरह की पहली घटना तो है ही, माना जा रहा है कि दुनिया में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी शहर ने बोतलबंद पानी पर प्रतिबंध लगाया है। जनमत के इस अभूतपूर्व निर्णय ने वहां एक आंदोलन का रूप धारण कर लिया है, जिसे बुंडी ऑन टैप कहा जा रहा है। इस फैसले से शहर के दुकानदारों को आर्थिक क्षति होनेवाली है, लेकिन पर्यावरण के हित को देखते हुए वे इसे अंजाम देने पर एकजुट हैं।

बताया जाता है कि नोर्लेक्‍स नामक एक कंपनी द्वारा वहां पानी निकालने वाला प्‍लांट लगाने की योजना बनायी जा रही थी। इस घटना ने लोगों को पर्यावरण के प्रति सचेत करने में उत्‍प्रेरक का काम किया। शहरवासियों को यह बात नागवार गुजरी कि उनका ही पानी सिडनी में बोतलबंद कर उन्‍हें ही बेचा जाए।

एक छोटे ग्रामीण शहर का यह आंदोलन कितना महत्‍व का है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि न्‍यू साउथ वेल्‍स की प्रांतीय सरकार ने भी सरकारी विभागों व एजेंसियों पर बोतलबंद पानी खरीदने से रोक लगा दी है। भारतीय मीडिया ने इस खबर को महत्‍व भले न दिया हो, लेकिन पाश्‍चात्‍य मीडिया ने इसे प्रमुखता से कवर किया। इससे संबंधित खबर को यदि आप अंग्रेजी में पढ़ना चाहें तो यह बीबीसी, एबीसी, टाइम्‍स ऑनलाइन, रायटर्स एलर्टनेट व कई अन्‍य साइटों पर उपलब्‍ध है।

8 comments:

राज भाटिय़ा said...

आशोक जी , बोतल बन्द पानी, या जुस यह सब हमारे यहां भी मिलता है, लेकिन उच्च स्तर का, ओर हमे खाली बोतल के पेसे देने पडते है, जो कही से भी लो ओर किसी भी दुकान पर वापिस कर दो, अगर यह तरीका भारत मै भी हो तो सडक पर या कही भी खाली बोतलो ना दिखे, लेकिन हमारे यहां कोई भी किसी किस्म का कानून नही , देश भगवान भरोसे ही चल रहा है. राम राम जी की

P.N. Subramanian said...

बहुत ही सुन्दर प्रेरणादायक जानकारी. कर्णाटक के किसी समुद्री किनारे चट्टानों के पीछे हजारों की संख्या में खाली बोतल (पानी के) पड़े देखे थे. संभवतः समुद्र ने उन्हें लौटा दिया था.

अभिषेक ओझा said...

अनुकरण करने लायक कदम है ये तो.

Pramod Singh said...

बहुत सही.

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

sukhad aashchrya huaa ..par vaikalpik vyawstha honi hi chahiye iski jisse ki waise log jo ytra par hain unhe pine ki pani ki smsya na ho.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

दिल्ली में दो कारणों से कभी-कभी पोलीथीन के कैरी बैग नहीं मिलते (1) जब दुकान वालों को चालान का डर सताता है (2) दुकान वालों की यूनियन कुछ नेताओं को खुश करने के लिए 'पोलीथीन बायकाट' के फ़ैशन की मुहिम चलाती है. अलबत्ता - दाल,चावल,मसाले,तेल,घी बगैहरा पहले से ही पोलीथीन में पैक होकर आता है.
हम डंडे के पीर हैं...जाओ जो करना है, कर लो, हम नहीं सुधरेंगे. यही हमारा नारा है...

काजल कुमार Kajal Kumar said...
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ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

ओह, रेलवे ने यह बोतल भरने के कियोस्क लगाये।
पर पानी स्वच्छ करने की मशीनें खराब कर दीं या ट्रेन आने के समय बिजली गुल करने का काम किया बोतल माफिया ने!

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