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Friday, July 17, 2009

वो जो चाहेंगे, आप खाएंगे... वो जो चाहेंगे, किसान उगाएंगे... आप खेत और पेट की गुलामी को तैयार तो हैं !

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने संसद में एक सवाल के जवाब में बताया कि अगले तीन सालों के अंदर देश में जीन संवर्धित टमाटर, बैगन और फूलगोभी की खेती आरंभ कर देने की योजना है। पूरी खबर यहां है और यह रही इस संबंध में सरकार की प्रेस विज्ञप्ति। भारत सरकार की नीति-रीति से तो सभी परिचित हैं, लेकिन इस महत्‍वपूर्ण खुलासे की जैसी प्रतिक्रिया मीडिया में होनी चाहिए थी, महसूस नहीं की गयी। शायद हमारे अंदर भ्रष्‍टाचार की तरह प्रकृति-विनाश के प्रति भी तटस्‍थ रहने का सामर्थ्‍य विकसित हो चुका है।

अजीब बात है कि जहां यूरोप और अमेरिका में प्रकृति की ओर लौटने की चाहत देखने को मिल रही है, भारत में इसके विनाश की कवायद चल रही है। कुछ समय पहले जर्मनी में जीन संवर्धित मक्‍के की खेती पर रोक लगा दी गयी। चंद रोज पहले आस्‍ट्रेलिया के न्‍यू साउथ वेल्‍स प्रांत की सरकार द्वारा बोतलबंद पानी की सरकारी खरीद पर रोक लगायी गयी। हाल ही में अमेरिका के फ्लोरिडा प्रांत में शहद के प्राकृतिक स्‍वरूप को बरकरार रखने के लिए कानून बनाए गए हैं, जिसके तहत उसमें किसी भी तरह की मिलावट पर दंड का प्रावधान किया गया है। लेकिन पुण्‍यसलिला गंगा के देश में तो उलटी गंगा ही बहती है।

सवाल यह उठता है कि आखिर किसके फायदे के लिए भारत की सरकार जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती देश में आरंभ करने की जल्‍दबाजी में है। कृषि और किसानों का तो इसमें कोई भला नहीं। इनमें बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस (Bacillus thuringiensis) जैसी बैक्‍टीरिया के जीन डाले गए तो खानेवालों के लिए ये जहर का काम ही करेंगी। जहां तक भारतीय किसानों की बात है तो वे बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों का बीज खरीदने में बरबाद ही हो जाएंगे। अभी घर में बचाकर रखे बीज से उनका काम चल जाता है, लेकिन जीएम बीज हर साल खरीदना पड़ेगा, वह भी मौजूदा कीमतों से करीब बीस-तीस गुना अधिक कीमत पर। यह भी कुप्रचार ही है कि जीएम बीज से उपज में भारी वृद्धि होती है। यदि उपज में थोड़ी बहुत बढ़ोतरी होती भी हो तो उससे होनेवाली कमाई से अधिक पैसा महंगा बीज खरीदने में लग जाता है। मानसून पर निर्भर खेती करनेवाले भारतीय किसान पूरी पूंजी महंगा बीज खरीदने में ही लगा देंगे तो मौसम के दगा देने पर गले में फंदा डालने के सिवाय उनके पास कोई विकल्‍प नहीं बचेगा। कृषि को जो नुकसान पहुंचेगा उसकी कल्‍पना ही भयावह है। सृष्टि की वह रचना जो खेतों में हरियाली लाती है और मानव शरीर व मस्तिष्‍क का पोषण करती है, चंद बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की मुट्ठी में कैद हो जाएगी। जो सरकार इस अपूरणीय क्षति की भरपाई नहीं कर सकती, इसकी राह आसान करने का नैतिक अधिकार उसे कहां से मिल गया ?

सच तो यह है कि जीन संवर्धित फसलों के मूल स्रोत अमेरिका में भी अभी तक सोयाबीन और मक्‍का ही ऐसी खाद्य फसलें हैं, जिनकी जीन संवर्धित किस्‍मों को मंजूरी दी गयी है। वहां भी इन दोनों फसलों का अधिकांश उपयोग जानवरों के चारे के रूप में होता है। यूरोपीय संघ में अभी तक सिर्फ मोंसैंटो के जीएम मक्‍का प्रभेद मोन 810 की खेती की अनुमति है। उसमें भी जर्मनी, फ़्रांस, ऑस्ट्रिया, हंगरी, ग्रीस और लक्ज़ेमबर्ग जैसे उसके सदस्‍य देखों ने उसकी खेती पर रोक लगा रखी है। जाहिर है कि यदि जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती भारत में आरंभ करने की सरकार की योजना अमल में आती है तो इन अप्राकृतिक फसलों के लिए प्रयोगशाला के चूहे करोड़ों भारतवासी ही बनेंगे।

ध्‍यान देने योग्‍य बात यह भी है कि जीन संवर्धित फसलें हमारी आर्थिक गुलामी का मार्ग प्रशस्‍त करेंगी। जीएम बीजों के उत्‍पादन और विक्रय का समूचा कारोबार मोंसैंटो, सिनजेंटा, बायर, बीएएसएफ आदि जैसी कुछ बड़ी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है। वे बाजार पर अपने एकाधिकार को सुनिश्चित करने के लिए फसलों की जीन-सरंचना के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ से नहीं चूकेंगी। देश में एक बार जीएम खाद्य फसलों की खेती शुरू हुई तो बीज के लिए बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों पर पूरी तरह से निर्भर होने में हमें देर नहीं लगेगी। तब क्‍या करेंगे मनमोहन, सोनिया, पवार, प्रवण व चिदंबरम जब बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां अचानक अपने बीजों की आपूर्ति रोक दें ? जीन संवर्धित फसलों की देश में बहुतायत होने पर हमारा कृषि निर्यात भी बुरी तरह से प्रभावित होगा।

आदमी की पहली जरूरत उसकी भूख से जुड़ी होती है। जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती से हमारे खेत ही नहीं, पेट भी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की मर्जी का गुलाम हो जाएगा। ईस्‍ट इंडिया कंपनी भी एक दिन इस देश में व्‍यापार करने ही आयी थी और लालची व गद्दार लोगों की मदद से पूरी कौम को गुलाम बना डाला। जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती के जरिए भी इसी तरह की गुलामी की पृष्‍ठभूमि तैयार हो रही है। हम भारतवासियों के पास अब दो ही विकल्‍प हैं – औपनिवेशिक साम्राज्‍यवाद के इस नए रूप को पहचानें या अपने खेत व पेट की जरूरतों को मुट्ठी भर बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की इच्‍छा का गुलाम बनाने को तैयार रहें।

(फोटो यहां से साभार लिया गया है।)

12 comments:

  1. ज्ञानवर्धन का आभार काफ़ी जानकारी प्राप्त हुई
    ---
    पढ़िए: सबसे दूर स्थित सुपरनोवा खोजा गया

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  2. कुछ देशों में जीन संवर्धित फसलों के बारे में जो रोक लगी है उसका एक कारण यह भी है कि कुछ खतरनाक जीन कई सालों तक अपने गुणधर्म दबाये रहते हैं और अचानक सक्रिय हो जाते हैं। और पूरे फसल चक्र को खतरनाक ढंग से बदल सकते हैं इसका पता लगाना काफी टेढी खीर है।
    शायद यह भी एक कारण है कि जीन संवर्धित फसलों पर रोक लगाई जाती है। लेकिन भारत कब समझेगा यह बात। उसे तो इंडिया बनना है।

    अच्छी पोस्ट।

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  3. विषय संबंधित बढिया जानकारी उपलब्ध हुई. बहुत धन्यवाद.

    रामराम.

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  4. मुझे प्रीमोनीशन था कि अशोक पांड़े की पोस्ट आयेगी इस विषय पर! :-)

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  5. बुरी खबर है ये - भारत मेँ जैसी फूलगोभी मिलती है वैसी यहाँ नहीँ मिलती - यहाँ की बेस्वाद और पानी से भरी रहती है - विरोध करेँ इस मुहीम का और रोका जाये इसे :-(
    - लावण्या

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  6. आँख खोलने वाला लेख है .साथ ही ये बताता भी मीडिया क्यों अपने सरोकारों को सिर्फ सनसनी वाली न्यूज़ तक केन्द्रित रखता है

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  7. बेहद तथ्‍यपरक आलेख। बधाई।

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  8. लगता है आण आले टैम में रोटियों के लाले पड़ने वाले है.ढंग का कुछ भी हाथ नहीं लगता. यहाँ कायदे का घी आजकल नहीं मिल रहा.सब्जियां इतनी सुंदर और भड़कीली आ रही है जैसे उन्हें सौंदर्य प्रतियोगिताओं में उतारा जाने वाला हो.
    जीन परिवर्तित खाद्य पदार्थ ५० साल बाद भी आने वाली नस्लों में अपना असर दिखा सकते है. साफ़ है तब किसी की जवाब देही तो होगी नहीं.

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  9. हमें एकजुट होकर इस षडयंत्र का विरोध करना होगा. हम वापस दासता की और जा रहे हैं.आभार.

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  10. शायद हमारे अन्दर भ्रष्टाचार की तरह प्रकृति विनाश के प्रति तटस्थता की सामर्थ्य विकसित हो चुकी है। इस एक वाक्य में ही आप ने सब समेट दिया। वस्तुत: हमें ऐसी किसी बात से कोई फर्क नही पड़ता।
    बेहतर है कि यह आलेख किसी अखबार में भेजें ताकि अधिक से अधिक लोग इसे पढ़ें।

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  11. मूक दर्शक बने रहना तो हमारी आदत हो चुकी है :(

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  12. जीन संवर्धित खाद्य फसलों की खेती से हमारे खेत ही नहीं, पेट भी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की मर्जी का गुलाम हो जाएगा
    aap ki यह बात विचारणीय है.
    न जाने कौन किस फायदे में जनसाधारण का नुक्सान करा रहा है.

    [Ashok ji,
    aap ka page load hone mein bahut samay leta hai...
    post padhne ke baad bhi 'post comment' ka button nahin dikhta ...bahut wait karni padti hai...]

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अपना बहुमूल्‍य समय देने के लिए धन्‍यवाद। अपने विचारों से हमें जरूर अवगत कराएं, उनसे हमारी समझ बढ़ती है।

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