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Wednesday, August 27, 2008

किसानों के लिए बीज व पानी से भी अहम है हिन्‍दी का मुद्दा

आज हम आपसे हिन्‍दी के विषय में बातचीत करना चाहते हैं। हो सकता है, हमारे कुछ मित्रों को लगे कि किसान को खेती-बाड़ी की चिंता करनी चाहिए। वह हिन्‍दी के पचड़े में क्‍यों पड़ रहा है। लेकिन हमारा मानना है कि हिन्‍दी के कल्‍याण के बिना हिन्‍दुस्‍तान के आमजन खासकर किसानों का कल्‍याण संभव नहीं।

राष्‍ट्र की आजादी के बाद भी यहां की आम जनता आर्थिक रूप से इसलिए गुलाम है, क्‍योंकि उसकी राष्‍ट्रभाषा गुलाम है। विशेष रूप से किसानों के लिए तो हिन्‍दी का मुद्दा बीज, खाद और पानी से भी अधिक महत्‍वपूर्ण है। किसी फसल के लिए अच्‍छा बीज व पर्याप्‍त सिंचाई नहीं मिले तो वह फसल मात्र ही बरबाद होगी, लेकिन राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी की पराधीनता भारत के बहुसंख्‍यक किसानों व उनकी भावी पीढि़यों के संपूर्ण जीवन को ही नष्‍ट कर रही है।

देश के करीब सत्‍तर करोड़ किसानों में अधिकांश हिन्‍दी जुबान बोलते व समझते हैं। लेकिन देश के सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों की राजकाज की भाषा आज भी अंगरेजी ही है। यह एक ऐसा दुराव है, जो इस भूमंडल पर शायद ही कहीं और देखने को मिले। जनतंत्र में जनता और शासक वर्ग का चरित्र अलग-अलग नहीं होना चाहिए। लेकिन हमारे देश में उनका भाषागत चरित्र भिन्‍न-भिन्‍न है। जनता हिन्‍दी बोलती है, शासन में अंग्रेजी चलती है। इससे सबसे अधिक बुरा प्रभाव किसानों पर पड़ रहा है, क्‍योंकि वे गांवों में रहते हैं, जहां अंगरेजी भाषा की अच्‍छी शिक्षा संभव नहीं हो पाती। आजाद होते हुए भी जीवनपर्यन्‍त उनकी जुबान पर अंगरेजी का ब्रितानी ताला लगा रहता है।

आज के समय में कस्‍बाई महाविद्यालयों से बीए की डिग्री लेनेवाले किसानपुत्र भी पराये देश की इस भाषा को ठीक से नहीं लिख-बोल पाते। कुपरिणाम यह होता है कि किसान न शासकीय प्रतिष्‍ठानों तक अपनी बात ठीक से पहुंचा पाते हैं, न ही सत्‍तातंत्र के इरादों व कार्यक्रमों को भलीभांति समझ पाते हैं। सबसे बड़ा दुष्‍परिणाम यह होता है कि वे रोजगार के अवसरों से वंचित हो जाते हैं।

हिन्‍दी आज बाजार की भाषा भले हो, लेकिन वह रोजगार की भाषा नहीं है। किसी भी देश में रोजगार की भाषा वही होती है, जो राजकाज की भाषा होती है। चूंकि हमारे देश में राजकाज की वास्तविक भाषा अंगरेजी है, इसलिए रोजगार की भाषा भी वही है। रोजगार नहीं मिलने से किसान गरीब बने रहते हैं, उनकी खेती भी अर्थाभाव में पिछड़ी रहती है, और आर्थिक-सामाजिक-शैक्षणिक विषमता की खाई कभी भी पट नहीं पाती।

जाहिर है यदि भारत के राजकाज की भाषा हिन्‍दी होती तो देश की बहुसंख्‍यक किसान आबादी अपनी जुबान पर ताला लगा महसूस नहीं करती। तब देश के किसान सत्‍ता के साथ बेहतर तरीके से संवाद करते एवं रोजगार के अवसरों में बराबरी के हिस्‍सेदार होते।

20 comments:

  1. भाई अशोक जी आपने बिल्कुल सही मुद्दा उठाया है !
    दर असल ये एक भ्रम है की किसान को खाद बीज की चिंता करनी चाहिए ना की
    भाषा की ! जब किसान भाषा ही नही समझेगा तो क्या ख़ाक अपने काम करवा पायेगा ?
    क्या आज वो बैंक से लोन लेने के समय सही किए गए कागजो की भाषा समझता है ?
    क्या वो खाद बीज की जानकारी समझता है ! और वो कितनी और कैसी हिन्दी में है ?
    राज काज में तो किसान सिर्फ़ वोट बैंक तक ही हिस्सेदार है ! मुझे नही लगता की कही पर
    भी किसान आराम से संवाद स्थापित कर सकता हो !
    और बाजार की भाषा भी सिर्फ़ किसान को लूटने तक ही हिन्दी है ! बाक़ी कुछ नही है !
    इस पोस्ट के लिए आपको धन्यवाद !

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  2. सुन्दर है भाई अशोक जी। अपने विषय से गुजरते हुए भाषा या किसी भी अन्य मुद्दे को रखना तो अच्छा ही है। मेरा तो मानना है कि हमें अपने विषय में रह्ते हुए दूसरे विषय में हस्तछेप करना ही चाहिए। पसंद आया भाई आपका यह अंदाज। मेरी शुभकामनाएं।

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  3. आभार इस आलेख के लिए.बिल्कुल सही मुद्दा उठाया है.शुभकामनाएं.

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  4. अशोक जी
    आपने बहुत ही सही प्रश्न उठाए हैं। हम आज भी विदेशी भाषा की गुलामी कर रहे हैं। परिणाम वही है जो आपने बताया। इसी कारण भारतेन्दु जी ने कहा था- निज भाषा उन्नत्ति अहै, सब उन्नत्ति को मूल
    बिन निज भाषा ग्यान के, मिटै न हिय को शूल।।
    एक विचारप्रधान लेख के लिए बधाई।

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  5. अशोक जी, बहुत सही मसला उठाया है। हिंदी का उत्थान महज भाषा का नहीं, एम्पावरमेंट से जुड़ा सवाल है। इसे हल किए बगैर किसानों को सत्तासंपन्न नहीं बनाया जा सकता।

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  6. सोच रहे हैं यह लड़ाई अभी लड़ी जानी है, कि अतीत की बात हुई..

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  7. bahut sahit vishay uthaya hai aapne, ye sirf kisaano ke liye nahi balki har chote sehar ke vaashinde ke saath ki samasya hai

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  8. सही बात है... अजीब ही कहेंगे की सारे शोध और गरीबी पर लिखी गई किताबों और आलेखों का हिन्दी अनुवाद तक नहीं मिलता !

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  9. सही बात की हे अशोक भाई आप ने, किसान क्या यह मुस्किल हर आम आदमी को हे ओर अपने ही देश मे पराया बना हुआ हे.
    धन्यवाद

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  10. पाण्डेय जी, बहुत प्रासंगिक मुद्दा उठाया है आपने - आपकी सारी चिंताएं वाजिब हैं. हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को रुपये के नोट और हिन्दी-दिवस से बाहर हर तरफ़ आना ही चाहिए.

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  11. आपने एक अत्यन्त महान विचार को इतने सरल शब्दों में प्रकट कर दिया है। साधुवाद। इस विचार के समर्थन में आपने जो तर्क दिये हैं वे भी बहुत कारगर एवं प्रभावी हैं।

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  12. अशोक जी आपने एक बहुत अच्छा विषय लिया है | आज के समय में अपनी ही भाषा अजनबी हो गई है |
    मुझे आपका यहाँ इ मेल एड्रेस नही दिख रहा है ,आपसे कुछ जानकारी लेनी है क्या आप मुझे अपना इ मेल एड्रेस देंगे
    शुक्रिया

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  13. "देश के करीब सत्‍तर करोड़ किसानों में अधिकांश हिन्‍दी जुबान बोलते व समझते हैं। लेकिन देश के सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों की राजकाज की भाषा आज भी अंगरेजी ही है।"
    यही तो हमारे देश का दुर्भाग्य है।
    जाकिर अली "रजनीश"

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  14. अब मैं क्या कहूं। अब भी बहुत सा सोचना मैं अंग्रेजी में करता हूं और कई बार विचारों का हिन्दी अनुवाद करना होता है। बहुत कुछ अन-लर्न कर रहा हूं। :)

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  15. आप एक बेहतर कार्य कर रहे हैं। बधाई स्‍वीकारें।

    'तस्‍लीम' ने अपनी एक पोस्‍ट में आपकी चर्चा की है, समय निकाल कर अवश्‍य देखें।

    जाकिर अली 'रजनीश'

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  16. "गणपति बब्बा मोरिया अगले बरस फ़िर से आ"
    श्री गणेश पर्व की हार्दिक शुभकामनाये .....

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  17. एक नीरस विषय पर, रस लेकर यह खुबसूरत ब्लाग चलाने के लिए आपको शुभकामनाएं !

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  18. Khti bari par itana rochak blog wah kabile tareef hai yah.

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  19. किसान पुत्र मनन-चिन्तन करे आप के अध्यन के लिये-आपने महसूस किया होगा कि पिछले कुछ दिनों से चीनी के लिये आपको अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है (फसल खत्म होने के बाद बाजार भाव)। ऐसा तब है जब कि गेहूं की तरह चीनी के भी रिकार्ड उत्‍पादन हुआ हैं। ऐसा भी नहीं कि आपके अधिक कीमत देने से गन्‍ना उत्‍पादक किसानों को उनके उपज की बेहतर कीमत मिल रही है। इसके विपरीत वे तो उचित कीमत नहीं मिलने की वजह से इसकी खेती से विमुख हो रहे हैं। किसान गन्‍ना की खेती छोड़ देंगे तो उनका जो नफा नुकसान होगा सो होगा, भविष्‍य में चीनी की कीमतें भी आम उपभोक्‍ताओं की पहुंच से बाहर हो जायेंगी। आखिर कौन है इन सबके लिये दोषी? चौधरी सँजीव त्यागी (कुतुबपुर वाले)३३,गाज़ावाली रूडकी रोड.
    मुज़फ्फर नगर (उ.प ).
    09457392445,09760637861,08802222211

    ReplyDelete
  20. किसान पुत्र मनन-चिन्तन करे आप के अध्यन के लिये-आपने महसूस किया होगा कि पिछले कुछ दिनों से चीनी के लिये आपको अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है (फसल खत्म होने के बाद बाजार भाव)। ऐसा तब है जब कि गेहूं की तरह चीनी के भी रिकार्ड उत्‍पादन हुआ हैं। ऐसा भी नहीं कि आपके अधिक कीमत देने से गन्‍ना उत्‍पादक किसानों को उनके उपज की बेहतर कीमत मिल रही है। इसके विपरीत वे तो उचित कीमत नहीं मिलने की वजह से इसकी खेती से विमुख हो रहे हैं। किसान गन्‍ना की खेती छोड़ देंगे तो उनका जो नफा नुकसान होगा सो होगा, भविष्‍य में चीनी की कीमतें भी आम उपभोक्‍ताओं की पहुंच से बाहर हो जायेंगी। आखिर कौन है इन सबके लिये दोषी? चौधरी सँजीव त्यागी (कुतुबपुर वाले)३३,गाज़ावाली रूडकी रोड.
    मुज़फ्फर नगर (उ.प ).
    09457392445,09760637861,08802222211

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अपना बहुमूल्‍य समय देने के लिए धन्‍यवाद। अपने विचारों से हमें जरूर अवगत कराएं, उनसे हमारी समझ बढ़ती है।

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