‘बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद’ जैसे सदियों से चले आ रहे मुहावरे सुनते-सुनते जो लोग बोर हो गए होंगे, वे अब एक नए मुहावरे का लुत्फ उठा सकते हैं : ‘राष्ट्रपति से पंगा, बदरों को पड़ा महंगा।‘ आधुनिक युग के इस नूतन मुहावरे के साथ एक प्लस प्वाइंट यह है कि यह ठोस सच्चाइयों पर अधारित है। अफ्रीकी देश जांबिया में बीते जून माह में एक बंदर ने राष्ट्रपति रूपिया बांदा पर उस समय पेशाब कर दिया, जब वे संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे। उस समय तो राष्ट्रपति महोदय ने हलके-फुलके मजाक के जरिए अपनी झेंप मिटा ली। मसलन उन्होंने मज़ाक में कहा कि वो बंदरों को नेता प्रतिपक्ष को भेंट कर देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि शायद ये घटना उनके लिए कोई खुशखबरी लेकर आए।
लेकिन बंदरों को राष्ट्रपति से पंगा लेने की सजा तो मिलनी ही थी। आखिर बंदर की यह औकात कि वह राष्ट्रपति पर पेशाब कर डाले, वह भी संवाददाताओं के सामने। लिहाजा राष्ट्रपति महोदय ने घटना के फौरन बाद बंदरों को राजधानी लुसाका से बाहर निकाल कर पार्कलैंड ले जाने का निर्देश दिया। अब तक राष्ट्रपति निवास से करीब 200 बंदरों को खदेड़ा जा चुका है। इनमें से करीब 61 बंदरों को पकड़कर वहां के एक वनस्पति उद्यान में ले जाया गया है।
अब आप सोच रहे होंगे कि इस मामले में हमें कौन-सी गुड़ की डली मिल गयी है। भाई, इस महंगाई के जमाने में गुड़ की डली तो मंत्रियों-संतरियों को मुबारक, हम जैसी आम प्रजा तो छोटी-छोटी बातों में ही खुश हो जाती है। तो हम खुश है कि हमें एक नया मुहावरा मिल गया। मुहावरों के वार भले इंसान पर होते हों, लेकिन वे गढ़े जाते हैं अक्सर जानवरों पर ही। वैसे भी राष्ट्राध्यक्षों पर जूते-चप्पलों से दिन-प्रतिदिन हो रहे वार और उसके प्रतिकार को लेकर एक नए संदर्भों वाले मुहावरे की कमी शिद्दत से महसूस की जा रही थी। वैसे आप के पास इन नए संदर्भों वाला कोई बेहतर मुहावरा हो तो उसे बताना नहीं भूलिएगा :)