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Wednesday, July 9, 2014
Thursday, June 26, 2008
बुरा होगा वह दिन जब भारतीय किसान बीज के लिए विदेश पर निर्भर रहेगा
''किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीजों की उपलब्धता पक्का करने के लिए सरकार ने बीज विधेयक में संशोधन करने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में तय किया गया कि बीज विधेयक 2004 में सरकारी संशोधन लाया जायेगा। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चाह्वाण ने नई दिल्ली में संवाददाताओं को बताया कि प्रस्तावित संशोध्ान से उच्च क्वालिटी वाले बीजों की उपलब्धता किसानों को पक्का की जा सकेगी। उन्होंने बताया कि विधेयक में प्रावधान होगा कि घटिया क्वालिटी के बीजों की बिक्री रुके, बीज उत्पादन में निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़े, बीजों का भली-भांति परीक्षण हो और बीजों के आयात को उदार बनाकर किसानों के हितों की सुरक्षा हो सके।''
यह खबर 26 जून, 2008 को बीज विधेयक में संशोधन करेगी केन्द्र सरकार शीर्षक से प्रभासाक्षी पोर्टल पर प्रकाशित हुई है। ख्ाबर से स्पष्ट है कि बीजों का महंगा होना सरकार की चिंता नहीं है। खबर में कहीं भी किसानों को सस्ते दर पर बीजों को उपलब्ध कराने की बात नहीं है। सरकार चिंतित है घटिया क्वालिटी के बीजों की बिक्री से। वह किसानों को अच्छे क्वालिटी के बीज उपलब्ध कराना चाहती है। इसके लिये उसे बीज उत्पादन में निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ाना और बीजों के आयात को उदार बनाना जरूरी जान पड़ता है। बीज विधेयक 2004 में प्रस्तावित संशोधन में वह इसके लिये आवश्यक प्रावधान करेगी।
घटिया क्वालिटी के बीजों की बिक्री पर रोक लगे और किसानों को अच्छे क्वालिटी के बीज मिलें, इससे भला किसे एतराज हो सकता है। लेकिन इसके लिये बीजों के आयात और निजी क्षेत्र की सहभागिता को जरूरी बताना उचित नहीं जान पड़ता। क्या राष्ट्रीय बीज निगम और राज्य बीज निगमों द्वारा उत्पादित बीज घटिया होते हैं, जो निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ाना जरूरी बताया जा रहा है। वैसे भी सरकार के बीज निगम सिर्फ सरकारी फार्मों पर ही बीज उत्पादन नहीं कराते, बल्कि किसानों को आधार बीज उपलब्ध कराकर अपनी देखरेख में उनके खेतों में भी प्रमाणित बीज उत्पादित कराते हैं। वह भी तो निजी क्षेत्र की सहभागिता ही है। जाहिर है सरकार इतना से संतुष्ट नहीं है। जो काम आज नेशनल सीड कॉरपोरेशन की अगुवाई में हो रहा है, उस काम में वह शायद निजी कंपनियों को अगुवा बनाना चाहती है।
सरकार का इरादा विदेश से अधिक मात्रा में बीज के आयात का भी है। इसके लिये वह नियमों को उदार बनाना चाहती है। हालांकि सरकार की यह नीयत कई सवाल खड़ा करती है। मसलन, क्या अपने देश में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, विभिन्न कृषि विश्वविद्यालय व अन्य शोध संस्थाओं के कृषि वैज्ञानिक जिन बीजों का विकास कर रहे हैं, वे सही नहीं हैं? क्या हमारे कृषि वैज्ञानिक बीज के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाये रखने में अक्षम हैं? क्या हमारे देश में दूसरी हरित क्रांति आयातित बीजों के बूते होगी? अपनी मिट्टी पर उपजनेवाले जिन फसल-प्रभेदों पर हमें नाज रहा है, विदेशों में भी जिनकी मांग रही है, उन्हें हम त्याग कर विदेशी प्रभेदों को अपनायें?
बीज विधेयक में ऐसे संशोधन से तो सिर्फ बीज उत्पादन से जुड़ी विदेशी कंपनियों और बीज आयातकों व अन्य कारोबारियों का भला होगा। बाहर से बीजें आयेंगी, तो निश्चित है कि उसमें बड़ा परिमाण जीन संवर्द्धित बीजों का होगा, जिनके औचित्य को लेकर दुनिया भर में विवाद है। इससे तो हमारी परंपरागत कृषि प्रणाली को नुकसान होगा ही, कृषि लागत अत्यधिक बढ़ जायेगी। ये परिस्थितियां किसान ओर किसानी दोनों को बरबाद करेंगी, जिसका खामियाजा सारे देशवासियों को उठाना होगा। कितना बुरा होगा वह दिन जब हम फसलों के बीज के लिये भी विदेश पर आश्रित हो जायेंगे? कहीं जाने या अनजाने में सरकार बीजों के मामले में हमारी आत्मनिर्भरता को समाप्त करने की साजिश का हिस्सा तो नहीं बन रही?
हमारे यहां यह विडंबना ही है कि रिकार्ड उत्पादन होने के बावजूद हमारी उपज के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है, और महंगा होने के बावजूद विदेशी बीजों के आयात को सरल बनाया जा रहा है। गौरतलब है कि भारत सरकार ने इस समय चावल व कुछ अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा है। इस बेमेल नीति का नतीजा सामने भी आ रहा है - किसानों की कृषि लागत इतनी बढ़ती जा रही है कि फसल बेचकर उसे निकालना भी मुश्किल हो रहा है।
यह खबर 26 जून, 2008 को बीज विधेयक में संशोधन करेगी केन्द्र सरकार शीर्षक से प्रभासाक्षी पोर्टल पर प्रकाशित हुई है। ख्ाबर से स्पष्ट है कि बीजों का महंगा होना सरकार की चिंता नहीं है। खबर में कहीं भी किसानों को सस्ते दर पर बीजों को उपलब्ध कराने की बात नहीं है। सरकार चिंतित है घटिया क्वालिटी के बीजों की बिक्री से। वह किसानों को अच्छे क्वालिटी के बीज उपलब्ध कराना चाहती है। इसके लिये उसे बीज उत्पादन में निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ाना और बीजों के आयात को उदार बनाना जरूरी जान पड़ता है। बीज विधेयक 2004 में प्रस्तावित संशोधन में वह इसके लिये आवश्यक प्रावधान करेगी।
घटिया क्वालिटी के बीजों की बिक्री पर रोक लगे और किसानों को अच्छे क्वालिटी के बीज मिलें, इससे भला किसे एतराज हो सकता है। लेकिन इसके लिये बीजों के आयात और निजी क्षेत्र की सहभागिता को जरूरी बताना उचित नहीं जान पड़ता। क्या राष्ट्रीय बीज निगम और राज्य बीज निगमों द्वारा उत्पादित बीज घटिया होते हैं, जो निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ाना जरूरी बताया जा रहा है। वैसे भी सरकार के बीज निगम सिर्फ सरकारी फार्मों पर ही बीज उत्पादन नहीं कराते, बल्कि किसानों को आधार बीज उपलब्ध कराकर अपनी देखरेख में उनके खेतों में भी प्रमाणित बीज उत्पादित कराते हैं। वह भी तो निजी क्षेत्र की सहभागिता ही है। जाहिर है सरकार इतना से संतुष्ट नहीं है। जो काम आज नेशनल सीड कॉरपोरेशन की अगुवाई में हो रहा है, उस काम में वह शायद निजी कंपनियों को अगुवा बनाना चाहती है।
सरकार का इरादा विदेश से अधिक मात्रा में बीज के आयात का भी है। इसके लिये वह नियमों को उदार बनाना चाहती है। हालांकि सरकार की यह नीयत कई सवाल खड़ा करती है। मसलन, क्या अपने देश में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, विभिन्न कृषि विश्वविद्यालय व अन्य शोध संस्थाओं के कृषि वैज्ञानिक जिन बीजों का विकास कर रहे हैं, वे सही नहीं हैं? क्या हमारे कृषि वैज्ञानिक बीज के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाये रखने में अक्षम हैं? क्या हमारे देश में दूसरी हरित क्रांति आयातित बीजों के बूते होगी? अपनी मिट्टी पर उपजनेवाले जिन फसल-प्रभेदों पर हमें नाज रहा है, विदेशों में भी जिनकी मांग रही है, उन्हें हम त्याग कर विदेशी प्रभेदों को अपनायें?
बीज विधेयक में ऐसे संशोधन से तो सिर्फ बीज उत्पादन से जुड़ी विदेशी कंपनियों और बीज आयातकों व अन्य कारोबारियों का भला होगा। बाहर से बीजें आयेंगी, तो निश्चित है कि उसमें बड़ा परिमाण जीन संवर्द्धित बीजों का होगा, जिनके औचित्य को लेकर दुनिया भर में विवाद है। इससे तो हमारी परंपरागत कृषि प्रणाली को नुकसान होगा ही, कृषि लागत अत्यधिक बढ़ जायेगी। ये परिस्थितियां किसान ओर किसानी दोनों को बरबाद करेंगी, जिसका खामियाजा सारे देशवासियों को उठाना होगा। कितना बुरा होगा वह दिन जब हम फसलों के बीज के लिये भी विदेश पर आश्रित हो जायेंगे? कहीं जाने या अनजाने में सरकार बीजों के मामले में हमारी आत्मनिर्भरता को समाप्त करने की साजिश का हिस्सा तो नहीं बन रही?
हमारे यहां यह विडंबना ही है कि रिकार्ड उत्पादन होने के बावजूद हमारी उपज के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है, और महंगा होने के बावजूद विदेशी बीजों के आयात को सरल बनाया जा रहा है। गौरतलब है कि भारत सरकार ने इस समय चावल व कुछ अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा है। इस बेमेल नीति का नतीजा सामने भी आ रहा है - किसानों की कृषि लागत इतनी बढ़ती जा रही है कि फसल बेचकर उसे निकालना भी मुश्किल हो रहा है।
Sunday, June 15, 2008
आर्थिक प्रगति के अनुपात में मानव संसाधन विकास भी जरूरी
सिर्फ पूंजी पर ही नजर रखना और समाज की अनदेखी करना नैतिकता के लिहाज से गलत है ही, यह गलत अर्थनीति भी है। करीब एक दशक पहले जब देश में आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ तो लगातार यही गलती दुहरायी गयी। ऐसा जानते हुए किया गया या अनजाने में यह तो हमारे नीति निर्धारक जानें, लेकिन इसका कुप्रभाव अब साफ दिख रहा है। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि देश में उद्योग, सेवा, परामर्श, बैंकिंग आदि क्षेत्रों में लगतार तरक्की हो रही है, रोजगार के नित नये अवसर सृजित हो रहे हैं, फिर भी बेरोजगारी बढ़ते ही जा रही है। और जाहिर है कि बेरोजगारी बढ़ेगी तो असमानता भी बढ़ेगी। देश में कुछ लोग बहुत से लोगों को काम देने लायक होंगे लेकिन अधिकांश लोग वह काम पकड़ने लायक ही नहीं होंगे। खासकर गांवों व कस्बाई इलाकों में इस असमानता का दंश विशेष रूप से देखने को मिल रहा है।
आलोक पुराणिक जी ने अपने चिट्ठे अगड़म बगड़म में देश में रोजगार की संभावनाओं के बारे में आंख खोलनेवाला लेख लिखा है। वे अपने लेख में बताते हैं कि देश में मौजूदा समय में रोजगार बहुत ज्यादा हैं, लेकिन उपयुक्त लोग बहुत कम हैं। वे लिखते हैं-
''इन दिनों दिल्ली के कालेजों में बीकाम, बीए जर्नलिज्म, बेचलर आफ बिजनेस इकोनोमिक्स के छात्र कोर्स के दूसरे या तीसरे साल में ही कुछ काम में लग जाते हैं। इतना काम है, करने वाले नहीं हैं। तरह-तरह के काम हैं। बी काम का एक छात्र आउटसोर्सिंग का बहुत मजेदार काम करता है। वह अमेरिकी स्कूलों के बच्चों का होमवर्क दिल्ली में बैठकर कर देता है। अमेरिका में कई छात्र होमवर्क करवाने के लिए बीस-पचास डालर खर्च करने को तैयार हैं। पर यहां बीस डालर का मतलब है करीब नौ सौ रुपये।''
''आईसीआईसीआई बैंक को लोग चाहिए और वह इंतजार नहीं करना चाहता। देश के गांवों की बैंकिंग पर कब्जा करना है। बैंक ग्रेजुएटों को पहले से ही पकडना चाहता है।''
''इनफोसिस या टाटा कंसलटेंसी जैसी कंपनियों को सौ दो सौ नहीं चाहिए, इन्हे तीस -चालीस हजार लोग चाहिए एक साल में।''
''एक अध्ययन के मुताबिक २०१० तक भारत में दस लाख लोगों की कमी होगी, इनफोरमेशन टेक्नोलोजी के आउटसोर्सिंग से जुडे धंधों में।''
श्री पुराणिक इतनी बड़ी संख्या में उपलब्ध रोजगार की संभावनाओं की तुलना में उपयुक्त लोगों की कमी का कारण भी बताते हैं- ''दरअसल उद्योग, अर्थव्यवस्था की तस्वीर जितनी तेजी से बदल गयी, उतनी तेजी से भारतीय शैक्षिक ढांचा नहीं बदला। काल सेंटर का कारोबार इतना बडा कारोबार है, पर भारत के एक भी विश्लविद्यालय में इस पर फोकस कोर्स नहीं है। विज्ञापन कापीराइटिंग इतना बडा कारोबार है, देश के दस विश्वविद्यालय भी इस पर फोकस डिग्री कोर्स नहीं चलाते।''
श्री पुराणिक चेतावनी भी देते हैं- ''लोग हवा से नहीं आयेंगे., लोग तैयार करने पडेंगे। अगर लोग यहां तैयार नहीं होंगे, तो चीन तैयार कर लेगा। कारोबार चीन चला जायेगा। ऐसी सूरत में भारत चुकी हुई संभावनाओं का देश होगा, संभावनाओं का नहीं। दुर्भाग्य से यह मसला अभी नीति निर्माताओं के लिए किसी किस्म की प्राथमिकता का विषय नहीं है।''
दरअसल देश की अर्थव्यवस्था और मानव संसाधन दोनों पर समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। खासकर भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश के लिए तो यह निहायत ही जरूरी है। हालांकि आर्थिक उदारीकरण के हमारे प्रणेता गत एक दशक से भी अधिक समय से पूंजी के निवेश और उसके प्रवाह की धारा को आंकड़ों में निहार कर इतने आत्ममुग्ध होते रहे कि मानव संसाधन के विकास के तरीके में भी समानुपातिक सुधार पर उनका ध्यान ही नहीं रहा। पूंजी की चकाचौंध में समाज को भुला दिया गया। पूंजीवाद की प्रतिष्ठा में समाजवाद को तड़ीपार कर दिया गया। रोजगार की असीम संभावनाओं के बीच भी बेरोजगारी के 'पानी बीच मीन प्यासी' वाली स्थिति इस दोषपूर्ण नीति का ही कुफल है।
आलोक पुराणिक जी ने अपने चिट्ठे अगड़म बगड़म में देश में रोजगार की संभावनाओं के बारे में आंख खोलनेवाला लेख लिखा है। वे अपने लेख में बताते हैं कि देश में मौजूदा समय में रोजगार बहुत ज्यादा हैं, लेकिन उपयुक्त लोग बहुत कम हैं। वे लिखते हैं-
''इन दिनों दिल्ली के कालेजों में बीकाम, बीए जर्नलिज्म, बेचलर आफ बिजनेस इकोनोमिक्स के छात्र कोर्स के दूसरे या तीसरे साल में ही कुछ काम में लग जाते हैं। इतना काम है, करने वाले नहीं हैं। तरह-तरह के काम हैं। बी काम का एक छात्र आउटसोर्सिंग का बहुत मजेदार काम करता है। वह अमेरिकी स्कूलों के बच्चों का होमवर्क दिल्ली में बैठकर कर देता है। अमेरिका में कई छात्र होमवर्क करवाने के लिए बीस-पचास डालर खर्च करने को तैयार हैं। पर यहां बीस डालर का मतलब है करीब नौ सौ रुपये।''
''आईसीआईसीआई बैंक को लोग चाहिए और वह इंतजार नहीं करना चाहता। देश के गांवों की बैंकिंग पर कब्जा करना है। बैंक ग्रेजुएटों को पहले से ही पकडना चाहता है।''
''इनफोसिस या टाटा कंसलटेंसी जैसी कंपनियों को सौ दो सौ नहीं चाहिए, इन्हे तीस -चालीस हजार लोग चाहिए एक साल में।''
''एक अध्ययन के मुताबिक २०१० तक भारत में दस लाख लोगों की कमी होगी, इनफोरमेशन टेक्नोलोजी के आउटसोर्सिंग से जुडे धंधों में।''
श्री पुराणिक इतनी बड़ी संख्या में उपलब्ध रोजगार की संभावनाओं की तुलना में उपयुक्त लोगों की कमी का कारण भी बताते हैं- ''दरअसल उद्योग, अर्थव्यवस्था की तस्वीर जितनी तेजी से बदल गयी, उतनी तेजी से भारतीय शैक्षिक ढांचा नहीं बदला। काल सेंटर का कारोबार इतना बडा कारोबार है, पर भारत के एक भी विश्लविद्यालय में इस पर फोकस कोर्स नहीं है। विज्ञापन कापीराइटिंग इतना बडा कारोबार है, देश के दस विश्वविद्यालय भी इस पर फोकस डिग्री कोर्स नहीं चलाते।''
श्री पुराणिक चेतावनी भी देते हैं- ''लोग हवा से नहीं आयेंगे., लोग तैयार करने पडेंगे। अगर लोग यहां तैयार नहीं होंगे, तो चीन तैयार कर लेगा। कारोबार चीन चला जायेगा। ऐसी सूरत में भारत चुकी हुई संभावनाओं का देश होगा, संभावनाओं का नहीं। दुर्भाग्य से यह मसला अभी नीति निर्माताओं के लिए किसी किस्म की प्राथमिकता का विषय नहीं है।''
दरअसल देश की अर्थव्यवस्था और मानव संसाधन दोनों पर समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। खासकर भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश के लिए तो यह निहायत ही जरूरी है। हालांकि आर्थिक उदारीकरण के हमारे प्रणेता गत एक दशक से भी अधिक समय से पूंजी के निवेश और उसके प्रवाह की धारा को आंकड़ों में निहार कर इतने आत्ममुग्ध होते रहे कि मानव संसाधन के विकास के तरीके में भी समानुपातिक सुधार पर उनका ध्यान ही नहीं रहा। पूंजी की चकाचौंध में समाज को भुला दिया गया। पूंजीवाद की प्रतिष्ठा में समाजवाद को तड़ीपार कर दिया गया। रोजगार की असीम संभावनाओं के बीच भी बेरोजगारी के 'पानी बीच मीन प्यासी' वाली स्थिति इस दोषपूर्ण नीति का ही कुफल है।
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