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Tuesday, January 28, 2014

गोरख पाण्‍डेय का भोजपुरी गीत : समाजवाद

ऐसे दौर में जब लोग निजी लाभ के लिए रचना करते हैं, गोरख पाण्डेय ने जनहित के लिए लिखा। उन्होंने जनता की जिजीविषा बनाये रखने के लिए उसकी ही जुबान में गीत लिखे। लोकधुनों पर आधारित उनके गीत पूरे उत्तर भारत और गैर हिन्दीभाषी प्रांतों में भी जनांदोलनों की आवाज बने। अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने काफी समय दिल्ली के जेएनयू में गुजारा और जनांदोलनों के हिस्सेदार रहे। उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले में 1945 में जन्मे इस क्रांतिकारी जनकवि ने आज ही के दिन 29 जनवरी 1989 को अपनी इहलीला समाप्त कर ली थी।

खेती-बाड़ी में भी उनकी स्मृति बनी रहे, इस कोशिश में प्रस्तुत है उनका एक भोजपुरी गीत :

गोरख पाण्‍डेय
समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई, घोड़ा से आई
अंगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद...

नोटवा से आई, बोटवा से आई
बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद...

गांधी से आई, आंधी से आई
टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद...

कांगरेस से आई, जनता से आई
झंडा से बदली हो आई, समाजवाद...

डालर से आई, रूबल से आई
देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद...

वादा से आई, लबादा से आई
जनता के कुरसी बनाई, समाजवाद...

लाठी से आई, गोली से आई
लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद...

महंगी ले आई, ग़रीबी ले आई
केतनो मजूरा कमाई, समाजवाद...

छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन
बखरा बराबर लगाई, समाजवाद...

परसों ले आई, बरसों ले आई
हरदम अकासे तकाई, समाजवाद...

धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई
अंखियन पर परदा लगाई

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

गोरख पाण्डेय द्वारा ही स्थापित संगठन जन संस्कृति मंच से जुड़ी पटना की चर्चित नाट्य संस्था हिरावल के कलाकारों की आवाज में यह सुनने लायक है :
















(गीत कविता कोश से साभार)

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