Tuesday, April 5, 2011

आयल चैत उतपतिया हो.. पतिया न भेजे हो रामा

संगीत हमारी कृषि संस्‍कृति का जरूरी हिस्‍सा है। हमारे गांवों में कोई भी मांगलिक या कृषि संबंधी कार्य गीत-संगीत के बिना संपन्‍न नहीं होता। घर में बच्‍चा जन्‍म ले या खेत में पौधे उगाए जाएं, उनकी पूरी जीवन-अवधि में गीत गाए जाते रहते हैं। हर अवस्‍था के लिए अलग-अलग तरह के गीत बनाए गए हैं। इस समय चैत का महीना चल रहा है और उत्‍तरप्रदेश व बिहार के भोजपुरीभाषी क्षेत्रों में चैता या चैती गाने का रिवाज है। जैसा कि पिछली पोस्‍ट में भी हमने कहा था कि वैसे तो चैती में तृप्ति व स्थिरता का भाव देखने को मिलता है, लेकिन इसमें विरह का स्‍वर भी प्रमुखता से मौजूद रहता है। दरअसल होता यह यह है कि फागुन में आया बसंत चैत में ढलने लगता है, और बसंत का अवसान निकट देख प्रेमियों के मन में श्रृंगार का भाव प्रगाढ़ हो उठता है। लेकिन ऐसे समय में भी प्रियतम घर नहीं आता है तो विरहिणियों का मन व्‍याकुल हो जाता है। ऐसे में अगर प्रिय की पाती भी आ जाती तो थोड़ा चैन मिलता, क्योंकि चैत ऐसा उत्पाती महीना है जो प्रिय-वियोग की पीड़ा को और भी बढ़ा देता है- पतिया न भेजे हो रामा, आयल चैत उतपतिया हो रामा। आइए सुनते हैं पं. कुमार गंधर्व की सुपुत्री कलापिनी कोमकली के स्‍वर में यह सुंदर चैती :

पतिया न भेजे हो रामा
आयल चैत उतपतिया हो रामा
नीम निबौरा फूल गुलाबै
गंध सुगंध सुहाय न हो
पतिया ने भेजे हो रामा
बिरही कोयलिया कू कू करत
जोबन भार सहयो ना रामा
केरी पाकी रस चुअत है
कौन बिठाव खिलावहु हो रामा
पतिया न भेजे हो रामा