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Monday, January 13, 2014

विज्ञान की बड़ी उपलब्धि है चावल के दाने से भी छोटी पवनचक्‍की

मेरिका में रह रही भारतीय मूल की वैज्ञानिक डॉ. स्मिता राव का आविष्‍कार अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में मील का पत्‍थर है। डॉ. ऱाव ने अपने ताइवानी शिक्षक प्रोफेसर जे. सी. चिआओ के सहयोग से ऐसी पवनचक्‍की तैयार की है जो चावल के एक दाने के दसवें हिस्‍से के बराबर छोटी है - सूक्ष्‍म पवनचक्‍की (Micro Windmill)। माइक्रो इलेक्‍ट्रो मेकैनिकल सिस्‍टम्स (MEMS) बनानेवाली ताइवान की कंपनी विनमेम्‍स (WinMEMS Technologies Co.) को यह माइक्रो विंडमिल टेक्‍नोलॉजी इतनी पसंद आयी कि उसने शुरुआत से ही इसके व्‍यावसायिक उपयोग का करार कर रखा है। कंपनी अपनी वेबसाइट पर इसे प्रदर्शित भी कर रही है।

भारतीय मूल की वैज्ञानिक डॉ. स्मिता राव

अभी इस पवनचक्‍की का इस्‍तेमाल सेलफोन की बैटरी चार्ज करने के लिए होना है। लेकिन जाहिर है कि इस दिशा में और प्रगति होगी तो इन सूक्ष्‍म पवनचक्कियों से भविष्‍य में बैटरीचालित अन्‍य घरेलू इलेक्‍ट्रॉनिक उपकरण भी रिचार्ज किए जा सकेंगे। खुद डॉ. स्मिता राव भी मानती हैं कि सूक्ष्‍म पवनचक्कियों के इस्‍तेमाल की संभावनाओं की सतह को अभी उन्‍होंने खरोंचा भर है। लेकिन यह खरोंच इतनी गहरी है कि ऊर्जा के क्षेत्र में अनंत संभावनाओं के अनगिनत द्वार खुलते नजर आ रहे हैं।

अभी तक पवनचक्‍की का विकास सिर्फ विशालता की दिशा में होता आया है। पवनचक्‍की की बेहतरी का मतलब उसे विशालतर बनाना रहा है। दैत्‍याकार पवनचक्कियों के लिए खुली जगह तो चाहिए ही, इनके ब्‍लेड से टकराकर हर साल हजारों परिंदे अपनी जान गंवा देते हैं। डॉ. स्मिता राव ने इन्‍हें बौना बनाकर हमारे घर के अंदर, बल्कि हमारी जेब में, हमारी आस्‍तीन में ला दिया। बौना भी ऐसा बनाया कि चावल के एक दाने में दस पवनचक्कियां समा सकती हैं। पवनचक्‍की के विकास के हजारों साल के इतिहास में जिस डिजाइन की किसी ने कल्‍पना भी नहीं की थी, स्मिता ने उसे कर दिखाया। ऐसी पवनचक्कियां पोर्टेबल व सस्‍ती तो होंगी ही, इनसे किसी जीव को हानि भी नहीं पहुंचेगी। सबसे बड़ी बात है कि ऊर्जा के लिए कोयले और पेट्रोल पर हमारी निर्भरता खत्‍म हो जाएगी। अभी तक व़ैकल्पिक ऊर्जा की बात होती थी तो हमारी निगाहें सबसे अधिक सौर ऊर्जा को निहारती थीं। माइक्रो विंडमिल डिजाइन ने पवन ऊर्जा को भी बराबरी या कहीं उससे भी अधिक संभावना वाला स्रोत बना दिया है।
 डॉ. राव द्वारा बनायी गयी एक सूक्ष्‍म पवनचक्‍की

डॉ. स्मिता राव की खोज से एक बेहतर दुनिया का सपना हमारी आंखों में तैरने लगा है। एक ऐसा कल, जिसका पर्यावरण बेहतर होगा, जो ज्‍यादा ऊर्जामय व प्रकाशमय होगा। तब हवा की रफ्तार से जब हमारे वाहन चलेंगे तो उसी हवा की रफ्तार से उनमें लगी पवनचक्कियां भी घूमेंगी और इस तरह वाहनों का ईंधन भी रिचार्ज होते जाएगा। तब हर घर की छत पर या साइड में पोर्टेबल पवनचक्‍की होगी और उससे हमारी घरेलू ऊर्जा की जरूरतें पूरी होंगी। स्‍कूटर, टीवी, इन्‍वर्टर, कंप्‍यूटर, लैपटॉप, घड़ी, स्‍मार्टफोन, हमारे सारे घरेलू उपकरण नैनो पवनचक्‍की की ऊर्जा से चलेंगे। पवन ऊर्जा से हमारे शहर, गांव, घर रोशन रहेंगे। उस दिन हमें महसूस होगा कि मानव सभ्‍यता के लिए डॉ. स्मिता राव का आविष्‍कार आग या पहिए की तरह महत्‍वपूर्ण है।

अंगरेजी, कन्‍नड़ और हिन्‍दी भाषाओं की जानकार डॉ. स्मिता राव वर्तमान में अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्‍सास, अर्लिंग्‍टन के इलेक्‍ट्रीकल इंजीनियरिंग विभाग में फैकल्‍टी एसोसिएट-रिसर्च हैं। भारत में बंगलोर इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी से दूरसंचार में बी.ई. करने के बाद उन्‍होंने अमेरिका में यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्‍सास, अर्लिंग्‍टन से इलेक्‍ट्रीकल इंजीनियरिंग में एम.एस. और पीएच.डी. किया। डॉक्‍टरों व इंजीनियरों के परिवार से आनेवाली स्मिता की दिलचस्‍पी शुरू से ही चिकित्‍सा के क्षेत्र में भी रही है। व़े चिकित्‍सकीय उपयोग के लिए माइक्रो रोबोट निर्माण पर भी काम कर रही हैं।

मुझे नहीं लगता कि भारतीय मीडिया में स्मिता राव की उपलब्धि की वाजिब चर्चा हुई है। सिर्फ टाइम्‍स ऑफ इंडिया में मुझे यह खबर पढ़ने को मिली। शायद किसी दिन भारत सरकार को भी स्मिता राव को किसी नागरिक सम्‍मान से सम्‍मानित करने का खयाल आए। लेकिन मुझे पूरा विश्‍वास है कि डॉ. स्मिता राव भारत की वह रत्‍न हैं, जिसकी आभा से पूरी दुनिया एक दिन प्रकाशित होगी।

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