Tuesday, November 3, 2009

तब बाढ़ में भी नहीं डूबेंगे धान के पौधे !

तेज बरसात की वजह से चावल के पौधे पानी में बिलकुल डूब जाते हैं। अब जापानी वैज्ञानिकों ने ऐसे जीनों का पता लगाया है जिनके जरिए चावल के पौधे का विकास इस तेजी से बढ़ाया जा सकता है कि वह पानी में डूबे ही नहीं।

भारत में चावल उगाने वाले किसान जहां बरसात के लिए तरसते हैं, वहीं उससे बहुत डरते भी हैं। उनके मन में कई सवाल होते हैं, क्या बरसात ठीक वक्त पर आएगी, ज़्यादा तेज और लंबी तो नहीं होगी, कितनी बार फसल बरसात की वजह से खराब हो जाती है और हज़ारों किसानों के लिए भारत में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और दूसरे एशियाई देशों में भी गुजारा करना मुश्किल हो जाता है।

अक्सर यह देखा गया है कि तेज बरसात की वजह से चावल के पौधे पानी में बिलकुल डूब जाते हैं। खेतों मे बढ़ता हुआ जलस्तर चावल के पौधों के लिए सामान्‍यत: अच्छा ही रहता है, लेकिन यह ज़रूरी है कि पौधे के उपरी हिस्से हवा के संपर्क में बने रहें। हालांकि मानसूनी इलाकों में बरसात और बाढ की वजह से चावल के खेतों में पानी इतना ज्‍यादा भर जाता है कि धान के पौधे बिल्कुल डूब जाते हैं तथा इससे वे सड़ने लगते हैं और मर भी जाते हैं।

गौरतलब है कि गहरे पानी में उगनेवाले चावल की प्रजाति को जलजमाव से कोई समस्या नहीं होती। पानी के साथ-साथ उसके तने वाले डंठल भी बढ़ते जाते हैं। जापान के नागोया विश्वविद्यालय के मोतोयुकी अशिकारी कहते हैं:

गहरे पानी में उगने वाले चावल के पौधे, पानी की गहराई से ऊपर बने रहने के लिए, एक मीटर तक बढ़ सकते हैं। वे हवा के संपर्क में बने रहने के लिए ऐसा करते है। वे अंदर से खोखले होते हैं, लेकिन उसके जरिए पौधा पानी की सतह से उपर पहुंच सकता है और ऑक्सीजन पा सकता है। यह कुछ ऐसा ही है कि जब आप गोताखोरी कर रहे होते हैं, तो पानी से ऊपर निकली एक नली से सांस लेते हैं।
बरसात के समय ऐसे चावल के तने 25 सेंटीमीटर प्रतिदिन की एक अनोखी गति से बढ़ सकते हैं। अशिकारी और उनकी टीम ने इस प्रक्रिया को समझने के लिए इस चावल के जीनों से यह समझने की कोशिश की कि चावल बरसात के वक्त अपने विकास को किस तरह नियंत्रित करता है। अध्ययनों से अब तक जितना पता चला है वह यह है कि एक गैसीय विकास-हॉर्मोन एथीलिन इसके लिए जिम्मेदार है, जैसाकि नीदरलैंड के उएतरेश्त विश्वविद्यालय के रेंस वोएसेनेक बताते हैं:
जब पौधा पूरी तरह पानी में डूब जाता है तब यह गैस ठीक तरह से मुक्त नहीं हो पाती। यू कहें कि वह पौधे में ही कैद हो जाती है। यानी पौधे में एथिलिन की मत्रा बढ़ने लगती है। यह पौधे के लिए संकेत है कि वह पानी में डूब रहा है और उसे कुछ करना है।
जापानी विशेषज्ञों ने पता लगाने की कोशिश की कि कौन से जीन इस स्थिति में सक्रिय होते हैं। उन्होने ऐसे जीन पाए जिनको वे गोताखोरी में इस्तेमाल होनेवाली नली के अनुरूप स्नोर्कल जीन कहते हैं। ये जीन तभी सक्रिय होते हैं जब पौधे के तने में एथिलिन की मात्रा बढ़ने लगती है। वे पौधे के विकास को तेज करने वाले दूसरे तत्वों का उत्पादन शुरू कर देते हैं। मोतोयुकी अशिकारी कहते हैं:
हमने क्रॉमोसोम 1,3 और 12 पर यह तथाकथित नलिका जीन पाए। उन्हें यदि सामान्य चावल के पौधों में भी मिलाया जा सके, तो बरसात के वक्त सामान्य चावल के पौधे भी वही करेंगे जो गहरे पानी में उगने वाला चावल करता है। मुझे पूरा विश्वास है कि हम चावल की हर प्रजाति को गहरे पानी में उगने वाले चावल की प्रजाति बना सकते हैं।
यानी इन जीनों की मदद से चावल की उस फसल को बचाया जा सकता है जो पानी की अधिकता के प्रति बहुत संवेदनशील है। जहां अक्सर बाढ आती है वहां के किसानों की इस बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है। एक और समस्या भी दूर हो सकती है - गहरे पानी में उगने वाला चावल बहुत ही कम फसल देता है, प्रति हेक्टेयर सिर्फ एक टन जो उपजाऊ क़िस्मों की तुलना में सिर्फ 20 फीसदी के बराबर है। नीदरलैंड के विशेषज्ञ रेंस वोएसेनेक बहुत ही आशावादी हैं:
विकास के लिए जिम्मेदार इन जीनों के बारे में पता चल जाने के बाद अब हम चावल की अलग-अलग प्रजातियों के बीच प्रकृतिक संवर्धन के जरिए, यानी वर्णसंकर के जरिए भी इन जीनों को उनके पौधे में डाल सकते हैं। इसके लिए किसी जीन तकनीक जरूरत ही नहीं हैं।
जापान के विशेषज्ञों ने यह काम शुरू कर भी दिया है। उनके अध्ययनों से एक बार फिर पता चलता है कि पौधों के संवर्धन के लिए उनके जीनों में असामान्य गुणों की तालाश कितनी जरूरी है।

फोटो नेचर पत्रिका से साभार (बांग्‍लादेश में गहरे पानी में उगनेवाला धान)
आलेख रेडियो डॉयचवेले पर प्रकाशित प्रिया एसेलबोर्न और राम यादव की रिपोर्ट पर आधारित

5 comments:

अफ़लातून said...

अशोकजी ,
मऊ और बलिया जिले की सीमा पर स्थित कई किलोमीटर लम्बे चौड़े ताल - ताल रतोय में धान की ऐसी चार किस्में हैं जो जल स्तर बढ़ने के साथ बढ़ती जाती हैं । क्या उनके इस गुण का जापानी वि.वि. ने नई किस्म बनाने में इस्तेमाल किया हो ?

महफूज़ अली said...

bahut achchi lagi yeh jaankaari.........

अभिषेक ओझा said...

ये और पिछली दोनों खबरें मानवता के लिए बड़ी अच्छी खबरें हैं. वैसे अफ़लातूनजी वाली बात मैंने भी सुनी तो है.

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर खबर, लेकिन अफ़लातून जी की बात भी मायने रखती है, ओर्पक्की हिदुस्तानी

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

आपका ब्लॉग न पढ़ते तो स्नोर्कल जीन के बारे में जान ही न पाते! धन्यवाद।

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