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Friday, July 24, 2009

आर्यभट की वेधशाला और दो रुपए में परिवार की खुशी खरीदते लोग!

‘’खट्टा-मिट्ठा चूस, दो रुपए में बाल-बच्‍चा खुश।‘’ दोनों हथेलियों में सस्‍ते लेमनचूस के छोटे-छोटे पैकेट लिए इन्‍हीं लफ्जों के साथ सुरीले अंदाज में अपने सामान का विज्ञापन करता दुर्बल-सा आदमी। और, डिब्‍बे की भीड़-भाड़ में खड़े होने की जगह के लिए संघर्ष कर रहे मटमैले कपड़े पहने दबे-कुचले लोग जो दो रुपए में बच्‍चों की खुशी खरीदकर खुद भी खुश दिख रहे हैं। पटना-गया लाइन के तरेगना और छोटे-बड़े अन्‍य स्‍टेशनों व हाल्‍टों की मेरे लिए अभी तक पहचान यही थी। यह कयास लगाना काफी रोचक है कि क्‍या भविष्‍य में भी मैं उस जगह को इन्‍हीं बिम्‍बों के जरिए पहचानूंगा!

बिहार के तरेगना गांव को इतनी अंतरराष्‍ट्रीय प्रसिद्धि सैकड़ों सालों में पहले कभी नहीं मिली होगी। राजधानी पटना से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस छोटे-से गांव में 22 जुलाई की सुबह हुए 21-वीं सदी के सबसे लंबे सूर्यग्रहण को सबसे अधिक समय तक देखा जाना था। अंतरिक्षवैज्ञानिकों का कहना था कि तरेगना सूर्यग्रहण के 'सेंट्रल लाइन' पर स्थित है, और इसलिए यहां ग्रहण को साफ और अधिक समय तक देखने-परखने में आसानी होगी। हालांकि आकाश में बादलों के घिर आने के चलते वहां दुनिया भर से इकट्ठा हुए हजारों लोगों को निराशा ही हाथ लगी। इनमें आम लोगों के अलावा अमेरिकी अंतरिक्ष संगठन नासा सहित देश-विदेश से आए वैज्ञानिक, खगोलविद, छात्र और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व उपमुख्‍यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी शामिल थे। इसके बावजूद लोग दिन में रात जैसा अंधेरा देखकर उत्‍साहित थे और मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने तरेगना में खगोलीय अध्ययन के लिए एक केंद्र की स्थापना करने की घोषणा की। अब देखना है कि वे अपनी घोषणा कितनी जल्‍द और किस सीमा तक पूरी करते हैं।

माना जाता है कि तरेगना में प्राचीन भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ व खगोलविद आर्यभट (476 ईस्वी) तारों का अध्‍ययन किया करते थे। बताया जाता है कि तरेगना के पूर्व में 70 फुट की एक मीनार थी। इसी मीनार पर आर्यभट की वेधशाला (ऑब्जर्वेटरी) थी जहां बैठकर वह अपने शिष्यों के साथ ग्रहों की चाल का अध्ययन किया करते थे। तारे गिनने के चलते ही इस जगह का नाम तरेगना पड़ा। ऐसा माना जाता है कि इस जगह का संस्कृत नामाकरण तारक-गणना कालांतर में तरेगना कहा जाने लगा।

उपर दिया गया चित्र, तरेगना गांव के उसी स्‍थल का है, जहां आर्यभट की वेधशाला होने की बात कही जाती है। हालांकि अब उस जगह पर निजी मकान है।

उल्‍लेखनीय है कि पटना के समीप ही एक अन्‍य जगह है जिसका नाम खगौल है। अक्‍सर कहा जाता है कि यह जगह भी प्राचीन काल में खगोलीय अनुसंधान का केन्‍द्र था और इसीलिए उसका नाम खगौल पड़ा।

इन जनश्रुतियों में सच्‍चाई कितनी है, यह कहना मुश्किल है। लेकिन यह तो निश्चित जान पड़ता है कि बिहार की मौजूदा राजधानी पटना का इलाका आर्यभट का कर्मस्‍थल रहा था। अपनी एकमात्र उपलब पुस्‍तक आर्यभटीय के एक श्‍लोक में वे कहते हैं कि उन्‍होंने इस पुस्‍तक की रचना कुसुमपुर में की। इतिहासकारों की मान्‍यता है कि आधुनिक पटना को ही प्राचीनकाल में पाटलीपुत्र, कुसुमपुर और पुष्‍पपुर भी कहा जाता था।

(फोटो बीबीसी हिन्‍दी से साभार)

8 comments:

  1. नीतिश कुमार ने तरेगना में खगोलीय अध्ययन के लिए एक केंद्र की स्थापना करने की घोषणा की है .. इससे तरेगना का नाम हमेशा के लिए प्रसिद्ध रह सकता है .. शुभकामनाएं !!

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  2. वाह बहुत सुन्दर!! आज के विज्ञानिकों के दीमाग में जो बात अभी आ रही है वो ४७६ इ में ही पता चल चुकी थी?? तो फिर आज का विज्ञान तेज है या पहले का ?? इतने संसाधन होते हुए भी !! खैर तरेगना नाम के साथ जुडी सत्यता को अधिक बल मिला ! बहुत ही सुन्दर जानकारी दी आपने |

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  3. आर्यभट्ट का नाम सुन पढ़ कर ही रोमांच होता है। कभी हुआ तो ये स्थान देखेंगे!

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  4. यह एक बढ़िया प्रयास साबित हो सकता है
    ---
    विज्ञान । HASH OUT SCIENCE

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  5. बहुत बढिया जानकारी दी आपने.

    रामराम.

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  6. अब इतंज़ार है उस केन्द्र के बन जाने का।

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  7. बहुत बहुत शुक्रिया इस जगह के बारे में विस्तार से बताने के लिए ..आगे क्या होगा यह तो वक़्त ही बताएगा पर इसका बीता कल पढ़ के बहुत अच्छा लगा ..

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