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Sunday, November 30, 2008

अमृता प्रीतम की कविता : राजनीति


सुना है राजनीति एक क्‍लासिक फिल्‍म है
हीरो : बहुमुखी प्रतिभा का मालिक
रोज अपना नाम बदलता
हीरोइन : हकूमत की कुर्सी वही रहती है
ऐक्‍स्‍ट्रा : राजसभा और लोकसभा के मैम्‍बर
फाइनेंसर : दिहाड़ी के मजदूर,
कामगर और खेतिहर
(फाइनेंस करते नहीं, करवाए जाते हैं)
संसद : इनडोर शूटिंग का स्‍थान
अखबार : आउटडोर शू‍टिंग के साधन
यह फिल्‍म मैंने देखी नहीं
सिर्फ सुनी है
क्‍योंकि सैन्‍सर का कहना है-
’नॉट फॉर अडल्‍स।’

(फोटो बीबीसी हिन्‍दी से साभार)

12 comments:

  1. यह फिल्‍म मैंने देखी नहीं
    सिर्फ सुनी है
    क्‍योंकि सैन्‍सर का कहना है-
    ’नॉट फॉर अडल्‍स।’


    जबरदस्त रचना का चुनाव.. पांडे जी !

    रामराम !

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  2. क्‍योंकि सैन्‍सर का कहना है-
    ’नॉट फॉर अडल्‍स।’
    "well said.."

    regards

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  3. दुखद है की ये कविता आज भी प्रसांगिक है

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  4. @ डा. अनुराग - यह आज भी प्रासंगिक है, क्यूंकि अच्छे कलम के धनी अक्सर कालजयी लिखते हैं।

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  5. अमृता जी यह कविता मुझे भी बहुत पसंद है

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  6. इस हालात में भी ऐसी ही राजनीति हो रही है इस बात से दुःख होता है :(

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  7. यह कविता आज की सचाई है, पांडॆ जी आप का धन्यवाद

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  8. प्रासंगिक दुखद इस अर्थ में कि आज भी हमारी राजनीति ड्रामा ही है, कुछ बदला नहीं।

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  9. बहुत सुन्‍दर विश्‍लेषण है।

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  10. सटीक कविता जो भारत में शायद ही कभी पुरानी पड़े...
    नीरज

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  11. पहले तो आपके शब्दों के लिये सहस्त्रों धन्यवाद...और अमृता प्रीतम की इस अद्‍भुत रचना की प्रस्तुती के लिये फिर से धन्यवाद

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  12. शुक्रिया बंधुवर अशोक जी अमृता जी को पढ़वाने के लिये

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अपना बहुमूल्‍य समय देने के लिए धन्‍यवाद। अपने विचारों से हमें जरूर अवगत कराएं, उनसे हमारी समझ बढ़ती है।

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