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Friday, December 19, 2008

गांव को स्‍वर्ग तो बना चुके, अब शहर बसाएंगे!


भारतीय गांवों का आत्‍मनिर्भर स्‍वरूप तेजी से समाप्‍त हो रहा है। गांवों की परंपरागत अर्थव्‍यवस्‍था और प्रौद्योगिकी को पिछले दो-ढाई दशकों में जो नुकसान पहुंचा है, वह अकल्‍पनीय है। देश की मौजूदा सरकारों की तथाकथित उदारीकरण की आर्थिक नीतियों के पैरोकार अब तो खुलेआम छह लाख गांवों को खत्‍म कर उनकी जगह छह सौ या छह हजार शहर बनाने की बात करने लगे हैं। इस संदर्भ में ब्‍लॉग पत्रिका निरंतर के लिए कुछ माह पहले मैंने एक आलेख लिखा था। उसे यहां साभार प्रस्‍तुत किया जा रहा है :


देश के छह लाख गांवों को कुछ सौ या हजार शहरों में तब्दील कर देना अव्यावहारिक ही नहीं, टेढ़ी खीर भी है। यह विडंबना ही है कि छह दशक तक गांवों को स्वर्ग बनाने की बात की जाये, और उसके बाद कहा जाये - नहीं, अब स्वर्ग के बदले शहर बसाये जायेंगे।

अनाज की रोज बढ़ रही कीमतों से लोग अभी ही इतने कष्ट में हैं। जब किसान शहरों में जा बसेंगे, तब क्या होगा? जाहिर है, तब खेत-खलिहान भी पूंजीपतियों के नियंत्रण में चले जायेंगे। जरूरी नहीं कि वे उन खेतों में अनाज ही उपजायें। वे उस जमीन पर फैक्टरियां भी लगा सकते हैं। जो खेती होगी भी, वह पूंजीवादी प्रणाली में ढली होगी। तब खाद्य पदार्थों की कीमतों का अपने बजट के साथ तालमेल बिठा पाना शहरी मध्य व निम्न वर्ग के बूते की बात नहीं रहेगी।

गांव के जो लोग शहर में जाकर रहेंगे, खासकर पुरानी पीढ़ी के लोग, खुद उनके लिए भी शहरी जीवन से सामंजस्य बिठा पाना उतना आसान नहीं होगा। कष्ट सहकर भी कृषि में मर्यादा देखनेवाला किसान शहर में मजदूर बनकर कभी खुश नहीं रहेगा।

सवाल यह भी उठता है कि देश के 70 - 80 करोड़ ग्रामीणों को बसाने लायक शहरों को बनायेगा कौन? जो राजनैतिक नेतृत्व आजादी के छह दशकों बाद भी ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल तक मुहैया नहीं करा सका, वह एक-दो दशकों में उनके लिए सुविधाओं से संपन्न चमचमाता शहर बना देगा? फिर, इसके लिए पैसा कहां से आयेगा? यदि यह जिम्मेवारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देने की सोच है, तो क्या जरूरत थी देश की आजादी की? ईस्ट इंडिया कंपनी हमारा 'भरण-पोषण' कर ही रही थी।

दुनिया की दूसरी सबसे विशाल आबादी पूरी की पूरी शहरों में रहने लगेगी, तो पर्यावरण प्रदूषण के खतरे भयावह हो जायेंगे। वर्तमान में मौजूद शहरों व कस्बों का प्लास्टिक कचरा आस-पास की जमीन को बंजर बना रहा है। शहरों के पड़ोस में स्थित नदियां गंदा नाला बनती जा रही हैं। अभी यह हाल है, तो 600 या 6000 नये शहर अस्तित्व में आयेंगे तब क्या होगा?

शहरीकरण के समर्थकों का तर्क रहता है कि दूर-दूर बिखरे गांवों की बनिस्बत शहरों को बिजली, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, सुरक्षा आदि की सुविधाएं देने में आसानी होगी। तो क्या आप देश के गैर शहरी क्षेत्रों को इन सुविधाओं से वंचित कर देंगे? क्या उन इलाकों को एक बार फिर आदिम युग में ढकेल दिया जायेगा?

दरअसल, भारत के गांवों को शहर बनाने की बात बाजार की ताकतों के दबाव में की जा रही है। आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में औद्योगिक प्रगति की रफ्तार तेज हुई है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सक्रियता भी बढ़ी है। उन कंपनियों को अपना माल खपाने के लिए बाजार चाहिए। लेकिन आत्मनिर्भर गांवों की सोच इस बाजारवाद के विस्तार में बाधक है। भारत की ग्रामीण आबादी जब शहरों में रहने लगेगी तो वह अपनी छोटी मोटी जरूरतों के लिए भी बाजार की बाट जोहने को विवश होगी। शहरी भारत ग्रामीण भारत की तुलना में बेहतर उपभोक्ता साबित होगा।

Thursday, December 4, 2008

कोल्‍हू, पनघट, कौओं का उचरना और धोती


मेरे प्रिय कवि केदारनाथ अग्रवाल की एक कविता है :

गांव की सड़क
शहर को जाती है,
शहर छोड़कर
जब गांव
वापस आती है
तब भी
गांव रहता है वही गांव,
कांव-कांव करते कौओं का गांव।


1980 ईस्‍वी में जब उन्‍होंने यह कविता लिखी होगी, कतई नहीं सोचा होगा कि दो दशक बाद गांवों में इतना बदलाव आ जाएगा कि वे गांव नहीं रह जाएंगे।

इन्‍हें अभी भी गांव ही कहा जाता है, लेकिन पहले वाली बात नहीं रही। रून-ढुन, रून-ढुन घंटी बजाते बैलों का जोड़ा, कोल्‍हू, पनघट, वटवृक्ष, पीपल, अमराई, तालाब, कौओं का उचरना – भारतीय गांव की यह परंपरागत छवि अब स्‍मृतियों में सिमटती जा रही है। न पहले जैसा लोकजीवन में रंग व रस रहा, न ही फसलों में वैविध्‍य। भूमंडलीकरण और बढ़ते भ्रष्‍टाचार ने गांवों का समूचा ताना-बाना ही नष्‍ट-भ्रष्‍ट कर दिया। आचार-विचार, रहन-सहन सब कुछ बदलते जा रहा है।

लोगों के पहनावा पर भी खासा असर देखने को मिल रहा है। इकॅनामिक टाइम्‍स में छपे एक आलेख में भारत सरकार की टेक्‍सटाइल समिति के एक रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि ग्रामीण इलाकों में धोती की मांग में तेजी से गिरावट आ रही है। सामान्‍य पर्यवेक्षण में भी यह देखने में आता है कि धोती की जगह पतलून और पाजामा अब ग्रामीण युवाओं की पसंद बनते जा रहे हैं।

आलेख में कहा गया है, ‘’ ग्रामीण इलाकों में धोती को पसंद करने वालों की संख्या में भारी कमी आयी है। साल 2006 में धोती का कुल बाजार 12.8 करोड़ पीस का था, जबकि 2007 में यह घटकर 11.7 करोड़ पीस रह गया है। इस तरह से देखें तो 2007 में धोती की मांग में 8.59 फीसदी की गिरावट आयी है। धोती के बाजार में शहरी भारत की हिस्सेदारी 21.37 फीसदी रही, वहीं ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी 78.63 फीसदी रही। .... लोगों के कपड़े में आए बदलाव से धोती आकर्षक नहीं रह गया है। दक्षिण और पूर्वी भारत के राज्यों में धोती की मांग में भारी कमी आयी है।‘’

आलेख में रेडीमेड वस्‍त्र विक्रेताओं का रुख अब गांवों की ओर होने की बात बताते हुए कहा गया है, ‘’ग्रामीण इलाकों में रेडीमेड कपड़ों की मांग में अच्छी तेजी आयी है और 2007 में इसमें 7.53 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। रेडीमेड गारमेंट खपत के मामले में साल 2006 के 29.2 करोड़ पीस की तुलना में 2007 में 31.4 करोड़ पीस की खपत हुई। इस कैटेगरी में ग्रामीण भारत ने 55.73 फीसदी बाजार हिस्सेदारी हासिल की, वहीं शहरी भारत 44.27 फीसदी बाजार ही हासिल कर सका।‘’

Sunday, November 30, 2008

अमृता प्रीतम की कविता : राजनीति


सुना है राजनीति एक क्‍लासिक फिल्‍म है
हीरो : बहुमुखी प्रतिभा का मालिक
रोज अपना नाम बदलता
हीरोइन : हकूमत की कुर्सी वही रहती है
ऐक्‍स्‍ट्रा : राजसभा और लोकसभा के मैम्‍बर
फाइनेंसर : दिहाड़ी के मजदूर,
कामगर और खेतिहर
(फाइनेंस करते नहीं, करवाए जाते हैं)
संसद : इनडोर शूटिंग का स्‍थान
अखबार : आउटडोर शू‍टिंग के साधन
यह फिल्‍म मैंने देखी नहीं
सिर्फ सुनी है
क्‍योंकि सैन्‍सर का कहना है-
’नॉट फॉर अडल्‍स।’

(फोटो बीबीसी हिन्‍दी से साभार)

Friday, November 28, 2008

चीनी लहसुन से देश को खतरा, सुप्रीम कोर्ट ने दिया जलाने का आदेश


विदेश से खाद्य पदार्थों के आयात के मामले में काफी सतर्कता बरती जानी चाहिए। हल्‍की सी चूक भी देश की कृषि और देशवासियों की सेहत के लिए गंभीर रूप से नुकसानदेह हो सकती है। चीन से आयातित लहसुन के संबंध में सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा दिए गए एक ताजा फैसले ने इस तथ्‍य को बल प्रदान किया है।

सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने भारत में चीन से आयात किए गए फफूंद लगे लहसुन के 56 टन की खेप को लोगों और खेती के लिए खतरनाक बताते हुए उसे तत्‍काल जलाने का आदेश दिया है। यह लहसुन वर्ष 2005 के आरंभ में भारत लाया गया था और अभी मुंबई में जवाहर लाल नेहरू बंदरगाह के निकट एक गोदाम में रखा है।

सीमा शुल्‍क अधिकारियों ने इसे फफूंदग्रस्‍त पाए जाने के बाद इसके आयात की अनुमति वापस ले ली थी। इसके बाद इसे मंगानेवाली कंपनी ने मुंबई उच्‍च न्‍यायालय का दरवाजा खटखटाया जहां उसे जीत हासिल हुई। मुंबई उच्‍च न्‍यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि बाजार में उतारने से पहले सभी 56 टन लहसुन को धुएं का इस्तेमाल कर दोषमुक्त किया जाए। उच्च न्यायालय के इस निर्णय से असंतुष्‍ट केन्‍द्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में इसे चुनौती दी, जिसने इस लहसुन को नुकसानदेह करार देते हुए जल्‍द से जल्‍द जलाने का आदेश दिया।

केन्‍द्र सरकार के अधिकारियों का तर्क था कि इस प्रक्रिया के चलते आयातित लहसुन में मौजूद फफूंद के पूरे देश में फैलने का खतरा है, जो अब तक यहां नदारद हैं। यदि ये फफूंद देश में फैल गए तो भविष्य में यहां की खेती को तगड़ा नुकसान पहुंचेगा।

अधिकारियों के मुताबिक इस लहसुन में ऐसे खतरनाक फफूंद हैं, जो इसे जल्द ही कूड़े में बदल देते हैं। यदि सतर्कता न बरती गयी तो इसके भारत समेत अन्य देशों में भी फैलने का खतरा है। यदि ऐसा हो गया तो कृषि विशेषज्ञों के लिए इस विपदा पर नियंत्रण कर पाना काफी मुश्किल होगा।

लहसुन को चीन से भारत भेजते समय माना गया था कि मिथाइल ब्रोमाइड के जरिए इसे दोषमुक्त कर लिया जाएगा। लेकिन जानकारों की राय में इस तरीके से केवल कीड़े-मकोड़ों को ही नष्ट किया जा सकता है। फफूंद को खत्म करना इसके जरिए संभव नहीं है। इसे खत्म करने के लिए तो फफूंदनाशी का इस्तेमाल करना पड़ता है, और ऐसा करने पर लहसुन इस्‍तेमाल लायक नहीं रह जाता।

इस संदर्भ में यह उल्‍लेखनीय है कि चीन में लहसुन की खेती काफी होती है। वहां की सरकार किसानों को इसकी खेती के लिए पैसे देती है और बिक्री में समस्‍या होने पर मदद भी करती है। चीनी लहसुन पहले से ही भारतीय किसानों के लिए परेशानी का सबब रहा है।

Friday, November 21, 2008

खड़ी बोली हिन्‍दी के पहले कवि अमीर खुसरो


भाषा का न सांप्रदायिक आधार होता है, न ही वह शास्‍त्रीयता के बंधन को मानती है। अपने इस सहज रूप में उसकी संप्रेषणयीता और सौन्‍दर्य को देखना हो तो अमीर खुसरो की हिन्‍दी रचनाओं से बेहतर शायद ही कुछ हो।

अपने युग की महानतम ‍शख्सियत अमीर खुसरो को खड़ी बोली हिन्‍दी का पहला कवि माना जाता है। इस भाषा का इस नाम (हिन्‍दवी) से उल्‍लेख सबसे पहले उन्‍हीं की रचनाओं में मिलता है। हालांकि वे फारसी के भी अपने समय के सबसे बड़े भारतीय कवि थे, लेकिन उनकी लोकप्रियता का मूल आधार उनकी हिन्‍दी रचनाएं ही हैं। उन्होंने स्वयं कहा है- ‘’मैं तूती-ए-हिन्‍द हूं। अगर तुम वास्तव में मुझसे जानना चाहते हो तो हिन्दवी में पूछो। मैं तुम्हें अनुपम बातें बता सकूंगा।’’ एक अन्‍य स्थान पर उन्होंने लिखा है, ‘’तुर्क हिन्दुस्तानियम मन हिंदवी गोयम जवाब (अर्थात् मैं हिन्दुस्तानी तुर्क हूं, हिन्दवी में जवाब देता हूं।)’’

खुसरो जैसी बेमिसाल व बहुरंगी प्रतिभाएं इतिहास में कम ही होती हैं। वे मानवतावादी कवि, कलाकार, संगीतज्ञ, सूफी संत व सैनिक भी थे। उनके धार्मिक गुरु महान सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया थे, जिनके पास वे अपने पिता के साथ आठ साल की आयु में गए और तभी से उनके मुरीद हो गए। अमीर खुसरो को दिल्‍ली सल्‍तनत का राज्‍याश्रय हासिल था। अपनी दीर्घ जीवन-अवधि में उन्‍होंने गुलाम वंश, खिलजी वंश से लेकर तुगलक वंश तक 11 सुल्‍तानों के सत्ता-संघर्ष के खूनी खेल को करीब से देखा था। लेकिन राजनीति का हिस्‍सा बनने के बजाए वे निर्लिप्‍त भाव से साहित्‍य सृजन व सूफी संगीत साधना में लीन रहे। अक्‍सर कव्‍वाली व गजल की परंपरा की शुरुआत अमीर खुसरो से ही मानी जाती है। उनकी रचना ‘जब यार देखा नैन भर..’ को अनेक विद्वान हिन्‍दी की पहली गजल मानते हैं। उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की खयाल गायकी के ईजाद का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने ध्रुपद गायन में फारसी लय व ताल को जोड़कर खयाल पैदा किया था। कहते हैं कि उन्होंने पखावज (मृदंग) को दो हिस्सों में बांटकर ‘तबला’ नाम के एक नए साज का ईजाद किया।

माना जाता है कि मध्य एशिया के तुर्कों के लाचीन कबीले के सरदार सैफुद्दीन महमूद के पुत्र अमीर खुसरो का जन्म ईस्‍वी सन् 1253 में उत्तर प्रदेश के एटा जिले में पटियाली नामक गांव में गंगा किनारे हुआ था। लाचीन कबीले के तुर्क चंगेज खां के आक्रमणों से पीड़ित होकर बलवन (1266 -1286 ई.) के राज्यकाल में शरणार्थी के रूप में भारत में आ बसे थे। खुसरो की मां दौलत नाज़ एक भारतीय मुलसलमान महिला थीं। वे बलबन के युद्धमंत्री अमीर एमादुल्मुल्क की पुत्री थीं, जो राजनीतिक दवाब के कारण हिन्‍दू से नए-नए मुसलमान बने थे। इस्लाम धर्म ग्रहण करने के बावजूद इनके घर में सारे रीति-रिवाज हिन्दुओं के थे। इस मिले जुले घराने एवं दो परम्पराओं के मेल का असर बालक खुसरो पर पड़ा। आठ वर्ष की अवस्था में खुसरो के पिता का देहान्त हो गया। किशोरावस्था में उन्होंने कविता लिखना प्रारम्भ किया और बीस वर्ष के होते होते वे कवि के रूप में प्रसिद्ध हो गए।

खुसरो के पिता ने इनका नाम ‘अबुल हसन’ रखा था। ‘ख़ुसरो’ इनका उपनाम था। किन्तु आगे चलकर उपनाम ही इतना प्रसिद्ध हुआ कि लोग इनका यथार्थ नाम भूल गए। ‘अमीर खुसरो’ में ‘अमीर’ शब्द का भी अपना अलग इतिहास है। यह भी इनके नाम का मूल अंश नहीं है। जलालुद्दीन फीरोज ख़िलजी ने इनकी कविता से प्रसन्न हो इन्हें ‘अमीर’ का ख़िताब दिया और तब से ये ‘मलिक्कुशोअरा अमीर ख़ुसरो ’ कहे जाने लगे। उनके द्वारा रचित फारसी मसनवी ‘नुह सिपहर’ पर खुश होकर सुल्‍तान अलाउद्दीन खिलजी ने एक हाथी के बराबर सोना तौलकर उन्‍हें दिया था। ‘नुह सिपहर’ में हिन्‍दुस्‍तान के रीति-रिवाजों, संस्‍कृति, प्रकृति, पशु-पक्षी व लोगों की तारीफ की गयी है।

अमीर खुसरो की 99 पुस्तकों का उल्लेख मिलता है, किन्तु 22 ही अब उपलब्ध हैं। हिन्दी में खुसरो की तीन रचनाएं मानी जाती हैं, किन्तु इन तीनों में केवल एक ‘खालिकबारी’ ही उपलब्ध है, जो कविता के रूप में हिन्‍दवी-फारसी शब्‍दकोश है। इसके अतिरिक्त खुसरो की फुटकर रचनाएं भी संकलित हैं, जिनमें पहेलियां, मुकरियां, गीत, निस्बतें, अनमेलियां आदि हैं। ये सामग्री भी लिखित में कम उपलब्ध थीं, वाचक रूप में इधर-उधर फैली थीं, जिसे नागरी प्रचारिणी सभा ने ‘खुसरो की हिन्दी कविता’ नामक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया था।

(फोटो http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/amir0001.htm से साभार)

Saturday, November 1, 2008

तब बुद्धदेव कहते, क्‍यों नहीं बनाते सस्‍ते ट्रैक्‍टर !

यह विडंबना ही है कि जिस देश की अधिकांश जनता किसान है, जहां का महान बुद्धिजीवी वर्ग जनवाद की बातें करते नहीं अघाता, वहां कार पर तो खूब बहस होती है लेकिन ट्रैक्‍टर कभी मुद्दा नहीं बनता। एक कार को लेकर बेकार का हाहाकार शीर्षक से 'राष्‍ट्रीय सहारा' में प्रकाशित कृष्‍ण प्रताप सिंह के विवेचन के कुछ अंश यहां इस संदर्भ में प्रस्‍तुत हैं।

भूमंडलीकरण का बाजा बजा रही सरकारें गांवों व गरीबों की ओर से मुंह मोड़कर उन्हें निर्मम बाजार व्यवस्था के हवाले करने पर न तुल जातीं, अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को थोड़ा बहुत समझतीं, किसानों–मजदूरों के हकों का अतिक्रमण रोकने में दिलचस्पी रखतीं और पूंजी को ब्रह्म व मुनाफे को मोक्ष न मानने लगतीं, तो आज किस तरह के सवाल उठाए जा रहे होते?

क्या तब भी अखबारों में ‘बंगाल ने खोया रतन (टाटा)’ जैसे शीर्षक आते और संपादकीय में तर्क दिए जाते कि सिंगुर में भूमि गंवाने वाले किसानों ने उन्हें मिले मुआवजे की राशि से ऐसे दोमंजिला भवन बनवा लिए हैं, जैसे कई पीढ़ियों में न बना पाते?

नहीं, तब निश्चित ही बुद्धदेव भट्टाचार्य टाटा को नहीं, टाटा बुद्धदेव भट्टाचार्य को मनाते दिखाई देते। यानी पूंजी की सत्ता राजनीति की सत्ता से ऊपर नहीं होती। बुद्धदेव कहते कि आप सस्ती कार ही क्यों बनाना चाहते हैं, सस्ती साइकिलें, रिक्शे या ट्रैक्टर क्यों नहीं बनाते? फिर हमसे अपनी शर्तें क्यों मनवाना चाहते हैं? सिंगुर की वह उपजाऊ कृषि भूमि ही क्यों चाहिए, आपको? इसे तो हम किसी भी कीमत पर आपको नहीं दे सकते, क्योंकि बड़े से बड़ा मुआवजा भी किसानों की कृषि भूमि का विकल्प नहीं हो सकता।

इन सवालों के साथ बुद्धदेव तब उन लोगों के साथ खड़े होते, जिनका वे आज विरोध करते दिखाई देते हैं। वे नैनो कार के खतरे गिनाते, उसे अर्थव्यवस्था के भीतरी ढांचे में कर्ज के विस्तार की नयी रणनीति का हिस्सा बताते और कहते कि संतृप्त होते ऊपरी कार बाजार से निकल कर टाटा को निम्न मध्य वर्ग की ‘ऊंची इच्छाओं’ को भुनाने यानी कर्ज लेने व आगे उसकी डेढ़ गुनी कीमत चुकाने की व्यवस्था के हवाले करने की इजाजत हम नहीं देंगे।

उन्हें अर्जुन सेनगुप्ता समिति की वह रपट भी याद आती, जिसमें कहा गया है कि देश की 80 फीसदी मेहनतकश आबादी बीस रूपए रोज से कम कमाती है। उनके साथ उनके लोग भी पूछते कि इस आबादी को आपकी नैनो से क्या सरोकार? टाटा जी, वह आम आदमी हमारे देश में कहां बसता है जिसे पत्नी-बच्चों के साथ भीगते देखकर आप करूणा विगलित हो उठे और उसकी कार–सेवा करने चल पड़े?

वे ऐसा न करते और ममता को मजबूरी में टाटा का स्वाभाविक साथ छोड़कर वही करना पड़ता, जो उन्होंने किया तो वे भी आज इतने अपराध-बोध से पीड़ित और रक्षात्मक नहीं होतीं। तब वे टाटा के सिंगुर से जाने को टाटा और बुद्धदेव का गेमप्लान न बतातीं, कहतीं कि यह उन किसानों के संघर्ष की जीत है, जिन्हें भूमिहीन बना दिया जा रहा था।

तब टाटा की हैसियत यह नहीं होती कि वे ममता या कि मोदी को बैड और गुड एम से संबोधित करते। उनके सामने साफ होता कि यह कृषि प्रधान देश कृषि की कीमत पर उद्योगों का विस्तार पसंद नहीं करता।

अब कुछ अपनी बात : इतने दिनों से ब्‍लॉगजगत से मेरी गैरमौजूदगी पर कुछ मित्र सोचते होंगे कि आखिर यह बंदा कर क्‍या रहा है। कविवर भाई योगेन्‍द्र मौदगिल तो पूछ ही बैठे कि किसी जरूरी कीड़े की तलाश में हो क्या..? ..तो भैया मैं किसी कीड़े की तलाश में नहीं हूं। हमेशा यही करता रहा तो खाऊंगा क्‍या :) दरअसल इतने दिनों से पानी के अभाव में सूख रही अपनी धान की फसल को बचाने में लगा था। अब धान की कटनी-दौनी और रबी फसल के लिए खाद-बीज के इंतजाम में जुटा हूं। वैसे अभी भी खेत की मेड़ पर बैठा अपने मोबाइल फोन पर आपकी पोस्‍टें पढ़ना नहीं भूलता..खेती का काम निपटाते ही शीघ्र ही टिप्‍पणियों में भी दिखने लगूंगा। उम्‍मीद करता हूं कि ब्‍लॉगर मित्र छुट्टी की इस अर्जी को मंजूर करने में कृपणता नहीं दिखाएंगे :)

Wednesday, October 8, 2008

मर कर जंगल को आबाद करनेवाले कीट सिकाडा


कृषि का भारत के लिए जितना महत्‍व है, इससे संबंधित शिक्षा और शोध पर उतना ध्‍यान नहीं दिया जाता। लेकिन मर कर जंगलों को फायदा पहुंचानेवाले सिकाडा (Cicada) जैसे कीटों के बारे में यहां भी शोध हो तो निश्चित तौर पर यह पर्यावरण खासकर कृ‍षि व बागवानी के लिए लाभप्रद साबित हो सकता है।

आम तौर पर कीट फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, और इसलिए उन्‍हें शत्रु समझा जाता है। लेकिन कुछ मित्रकीट भी होते हैं, जो जीवनकाल में या मरणोपरांत पौधों को फायदा ही पहुंचाते हैं। सिकाडा के बारे में अभी तक जो जानकारी उपलब्‍ध है, उसके आधार पर इसे फायदा पहुंचानेवाला कीट ही माना जा रहा है।

अमरीका के उत्तरी हिस्से में सिकाडा कीट भारी संख्या में पाए जाते हैं। ये कीट अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा पेड़ों की जड़ों में बिताते हैं जहां वह जाइलम पर निर्भर होते हैं। जब ये बड़े होते हैं तो एक साथ लाखों की संख्या में प्रजनन के लिए बाहर आते हैं। ये कीट हर 13 से 17 वर्ष में ज़मीन के नीचे से बाहर निकलते हैं और प्रजनन करते हैं। चूंकि इन कीटों की संख्या लाखों में होती है इसलिए कई कीट मरते भी हैं।


सिकाडा प्रजनन के दौरान भारी शोर मचाते हैं। इन कीटों के प्रजनन का समय कुछ हफ्तों का ही होता है। इनकी संख्या प्रति वर्ग मीटर में 350 तक हो सकती है। कुछ जानवर इन कीटों को खाते भी हैं। लेकिन अधिकांश कीट मर कर मिट्टी में मिल जाते हैं। इन कीटों के शरीर के सड़ने से मिट्टी में बैक्टीरिया. फफूंद और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है। यही कारण है कि जिन इलाक़ों में ये कीट मरते हैं, वहां के पेड़ ज्यादा तेजी से बढ़ते हैं।

ये बातें अमरीकी वैज्ञानिकों के शोध में सामने आयी हैं। कुछ वर्षों पूर्व उनका ध्‍यान इस बात की ओर गया कि उत्तर अमरीका के जंगलों में ख़ास किस्म के ये कीड़े लाखों की संख्या में मर रहे हैं, जिससे जंगलों को काफी फायदा हो रहा है। वैज्ञानिकों के शोध में यह बात सामने आयी कि कीटों के मिट्टी में मिलने से मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है। नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ने से पेड़ों को तेजी से बढ़ने में मदद मिलती है। उनके मुताबिक ये कीट वास्तव में वही नाइट्रोजन छोड़ते हैं जो ये अपने पूरे जीवन में पेड़ों की जड़ों से एकत्र करते हैं।


सिकाडा झींगुरों की तरह काफी शोर करते हैं, लेकिन ये झींगुर (Cricket) से भिन्‍न हैं। इसी तरह से ये फतिंगा या टिट्डी (Locust, Grasshopper) से भी भिन्‍न हैं। फादर कामिल बुल्‍के के अंगरेजी-हिन्‍दी शब्‍दकोश में सिकाडा के हिन्‍दी समतुल्‍य रइयां, चिश्चिर बताए गए हैं। किन्‍हीं मित्रों को भारतीय संदर्भ में सिकाडा के बारे में अतिरिक्‍त जानकारी हो तो वे अवश्‍य दें, इसके लिए हम उनके आभारी रहेंगे।

(इस आलेख की प्रेरणा इस विषय पर लावण्‍या जी की रोचक व ज्ञानवर्धक ब्‍लॉगपोस्‍ट से मिली, उनका हार्दिक आभार। खेती-बाड़ी में इस दोहराव का उद्देश्‍य भारतीय संदर्भ में सिकाडा के बारे में जानकारी एकत्र करना और उसका प्रसार है। आलेख के चित्र व संदर्भ बीबीसी हिन्‍दी और विकिपीडिया से लिए गए हैं।)

Saturday, September 27, 2008

जीएम फूड : दाने दाने पर लिखा होगा बनानेवाले का नाम


दाने दाने पर लिखा है, खानेवाले का नाम। यह कहावत आपने जरूर सुनी होगी। लेकिन अब हमें उस समय के लिए तैयार रहना चाहिए, जब कहना पड़े, 'दाने दाने पर लिखा है, बनानेवाले का नाम।' हाल के वर्षों में मोंसैंटो, सिनजेंटा, बीएएसएफ आदि जैसी बहुराष्‍ट्रीय निजी कंपिनयों द्वारा तैयार जीन संवर्धित (Genetically Modified) बीजों का दबदबा जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उसका यही निहितार्थ है।

जीएम पौधों का उत्‍पादन जेनेटिक इंजीनियरिंग विधि से किया जाता है। इसमें आनुवांशिक सामग्री मिलाकर फसल के गुण बदलते हैं। जींस के हस्‍तांतरण का यह कार्य प्रयोगशाला में होता है। उसके बाद उस फसल की प्रायोगिक खेती (Field Trials) कर उसे परखा जाता है। तत्‍पश्‍चात व्‍यापारिक रूप से फसल का उत्‍पादन किया जाता है।

जीएम फूड की स्‍वीकार्यता को लेकर दुनिया भर में विवाद रहा है। जीन का हस्‍तांतरण प्रकृति के विधान के विरुद्ध कार्य है तथा जरूरी नहीं कि इसके परिणाम अच्‍छे ही हों। इसको लेकर अनेक लोगों की नैतिक और धार्मिक आपत्तियां रहती हैं। खासकर शाका‍हारियों को आशंका रहती है कि इस भोजन में मानव व पशु जीन न हों। पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पर जीएम फसलों के साइड इफेक्‍ट होने की खबरें भी आती रहती हैं। वैसे भी निजी कंपनियों का मुख्‍य उद्देश्‍य मुनाफा होता है तथा इसके लिए वे बहुत सी अनुचित बातों को नजरअंदाज कर सकती हैं। इन कंपनियों पर भारत जैसे गरीब देशों में चोरी-चुपके फील्‍ड ट्रायल करने के आरोप भी लगते रहे हैं।

अभी तो एशियाई देशों खासकर भारत में पारंपरिक फसलों का महत्‍व बरकरार है। लेकिन भारत में भी मोनसेंटो और महीको (महाराष्‍ट्र हाइब्रिड सीड कंपनी) कंपनियों के बीटी (बैसिलस थ्यूरेनजिएन्सिस) कपास बीज तमाम विरोध के बावजूद देश के कई हिस्‍सों में उगाए जा चुके हैं और उनके रकबे में लगातार विस्‍तार हो रहा है। यही नहीं, बीटी बैगन जैसे कई अन्‍य जीन संवर्धित फसलों की प्रायोगिक खेती शुरू हो चुकी है और अगले वर्ष से उन्‍हें बाजार में व्‍यावसायिक तौर पर उपलब्‍ध कराए जाने की योजना है।

जीएम सीड के बढ़ते हुए दबदबे का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके कारोबार में लगी अमरीकी कंपनी मोनसेंटो, यूरोपीय कंपनी सिनजेंटा तथा जर्मन कंपनी बीएएसएफ ने पिछले वर्ष अरबों रुपये डॉलर का मुनाफा बटोरा। कुछ साल पहले तक विश्‍वव्‍यापी विरोध के कारण मोंसैंटो को जहां वर्ष 2003 में 2 करोड़ 30 लाख डालर का घाटा उठाना पड़ा था, उसीने वर्ष 2007 में एक अरब डॉलर का मुनाफा कमाया। यूरोप की जिनसेटा ने बीते वर्ष एक अरब 10 करोड़ डॉलर का शुद्ध लाभ अर्जित किया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 75 फीसदी अधिक रहा। इन कंपनियों के बीज आज पराग्वे से लेकर चीन तक और भारत से लेकन अर्जेंटीना तक धड़ल्ले से बिक रहे हैं।

भारत में घाटे का सौदा हो चुकी खेती के भंवरजाल में फंसे किसानों को जीन संवर्धित हाइब्रिड बीज काफी लुभा रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों द्वारा भी कहा जा रहा है कि कृषि उपज वृद्धि में आ चुके ठहराव को हाइब्रिड बीज ही गति दे सकते हैं। विश्‍वव्‍यापी खाद्य संकट ने भी जीन संवर्धित फसलों की स्‍वीकार्यता की राह आसान बनायी है।

जीएम फसल जब अधिक उपज देंगे तो कोई भी किसान गैर-जीएम पारंपरिक फसल नहीं उगाना चाहेगा। भविष्‍य में यह भी हो सकता है कि जीएम फसलों के अपमिश्रण से पारंपरिक फसल दूषित होकर विलुप्‍त हो जाएं। चूंकि जीएम बीजों के उत्‍पादन का करीब सारा कारोबार निजी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है, इसलिए वह दिन दूर नहीं जब हमारे भोजन के हरेक दाने पर किसी न किसी बहुराष्‍ट्रीय कंपनी का नाम लिखा हो। यह भी संभव है कि तब हम फसलों को धान, गेहूं, अरहर, आलू, बैंगन, कपास जैसे उनके पारंपरिक नामों के बजाय ब्रांडनेम (पेप्‍सी व कोकाकोला की तरह) से जानें।

(फोटो बीबीसी हिन्‍दी से साभार)

Monday, September 22, 2008

झारखंड से निकली भोजपुरी पत्रिका 'परास'


झारखंड प्रदेश से भोजपुरी की नयी त्रैमासिक पत्रिका परास का प्रकाशन आरंभ हुआ है। तेनुघाट साहित्‍य परिषद (बोकारो) द्वारा निकाली जा रही इस पत्रिका के संपादक आसिफ रोहतासवी के हिन्‍दी और भोजपुरी के कई कविता व गजल संग्रह आ चुके हैं। पटना विश्‍वविद्यालय के सायंस कॉलेज में हिन्‍दी के व्‍याख्‍याता डॉ. रोहतासवी की रचनाओं में कृषि संस्‍कृति और ग्राम जीवन की अमिट छाप देखने को मिलती है। आशा है उनके कुशल संपादन में यह पत्रिका भी गांव की मिट्टी से जुड़ी इन संवेदनाओं की वाहक बनेगी।

परास के समहुत-अंक से उद्धृत है लोकप्रिय कवि व गीतकार स्‍व. कैलाश गौतम का एक भोजपुरी गीत :

चला चलीं कहीं बनवा के पार हिरना
एही बनवा में बरसै अंगार हिरना।

रेत भइलीं नदिया, पठार भइलीं धरती
जरि गइलीं बगिया, उपर भइलीं परती
एही अगिया में दहकै कछार हिरना।

निंदिया क महंगी सपनवा क चोरी
एही पार धनिया, त ओहि पार होरी
बिचवां में उठलीं दीवार हिरना।

बड़ी-बड़ी बखरी क बड़ी-बड़ी कहनी
केहू धोवै सोरिया, त केहू तौरै टहनी
केहू बीछै हरी-हरी डार हिरना।

गीतिया ना महकी, ना फुलिहैं कजरवा
लुटि जइहैं लजिया, न अंटिहैं अंचरवा
बिकि जइहैं सोरहो सिंगार हिरना।

Friday, September 19, 2008

विदर्भ के आत्‍महत्‍या कर रहे किसानों को 4825 करोड़ रुपए में मिली सिर्फ दो फीसदी रकम

लोग समझते हैं कि सरकार किसानों को राहत पहुंचा रही है, और माल चला जाता है कुछ लोगों की जेब में। आप के द्वारा दिया गया जो टैक्‍स देश के विकास व खुशहाली पर खर्च होना चाहिए, वह घोटालों की भेंट चढ़ जाता है। आतंकवादियों व अपराधियों से भी निष्‍ठुर हैं ये घोटालेबाज। आत्‍महत्‍या कर रहे विदर्भ के किसानों का निवाला छिनने में भी इनकी आत्‍मा नहीं डोली। प्रस्‍तुत है करोड़ों रुपये का गाय भैंस घोटाला शीर्षक से बिजनेस स्‍टैंडर्ड में मुंबई डेटलाइन से प्रकाशित यह खबर :

देश में किसानों की बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार ने राहत पैकेज की घोषणा तो कर दी है लेकिन यह राहत पैकेज किसानों के पेट की आग न बुझाकर नेताओं और उनके चेलों की जेब में समा गया।

यह बात सूचना अधिकार के द्वारा मांगी गई जानकारी के जरिए प्रकाश में आई है। सरकारी खजाने से किसानों के लिए दिए गए 4825 करोड़ रुपए में से किसानों को मिली सिर्फ दो फीसदी रकम, बाकी की रकम बैंक, नेताओं और सरकारी बाबुओं की तिकड़ी डकार गयी।

देश में सबसे ज्यादा विदर्भ के अन्नदातों ने गरीबी और तंगहाली से परेशान होकर मौत को गले लगाना बेहतर समझा। देश-विदेश में भूख से मरने की खबरों से शर्मसार होकर महाराष्ट्र और केन्द्र सरकार ने विदर्भ के किसानों को विशेष राहत पैकेज दिया।

विदर्भ में किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने दिसंबर 2005 में 1075 करोड़ रुपए का राहत देने की घोषणा की। इसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जुलाई 2006 में अपने विदर्भ दौरे के दौरान इस क्षेत्र के अन्नदाताओं के विकास के लिए 3750 करोड़ रुपये देने की बात कही।

सरकारी खजाने से दिए गए पैसों के लिए योजना के तहत किसानों के बीच दुग्ध कारोबार को बढ़ावा दिया जाना था। इस पैकेज के मूल उद्देश्य किसानों को दुग्ध व्यसाय से जोड़ने के तहत 4 करोड़ 95 लाख 35 हजार रुपये जानवारों की खरीददारी में खर्च किए गए। इन पशुओं के लिए चारे और अन्य पोशक तत्वों में 63 लाख 64 हजार रुपये और गाय-भैसों पर 35 लाख 35 हजार रुपये खर्च कर दिए गए।

इसके अलावा, यवतमाल जिला दुध उत्पादक सहकारी संस्था के माध्यम से 53 लाख रुपये खर्च करने का बजट बनाया गया, जिसमें से 40.95 लाख रुपये खर्च भी कर दिए गए और 14.05 लाख रुपये खर्च किये जाने वाले है।

पहली नजर में देखने या कहें कि एसी दफ्तरों में बैठ कर इस योजना को देखने पर किसानों का लाभ ही लाभ दिखाई दे रहा है लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं हैं, क्योंकि सूचना अधिकार के तहत मिली लाभांवित किसानों की सूची बोगस है।

विदर्भ किसानों के लिए सबसे ज्यादा संघर्ष करने वाले किशोर तिवारी कहते हैं कि हमारे नेताओं को शर्म नहीं आती है कि वे भूखे किसानों के पेट की रोटी खुद खा रहे है। इस खुलासे के बाद महाराष्ट्र सरकार जांच करने की बात कह कर मामला टालने में लग गयी है,क्योंकि महाराष्ट्र और केन्द्र की सत्ता में बैठी कांग्रेस और एनसीपी दोनों के नेता इसमें शामिल है।

किसानों के संघटन का नेतृत्‍व कर रहे किशोर तिवारी ने इन नेताओं के ऊपर आपराधिक मुकदमा चलाए जाने की मांग करते हुए कहा कि आजाद भारत का यह सबसे शर्मसार कर देने वाला गाय-भैंस घोटला है। उनके अनुसार सरकारी खजाने से किसानों के लिए राहत पैकेज के नाम से निकाली गयी राशि में से सिर्फ दो फीसदी की रकम किसानों तक पहुंची है, बाकि की राशि बैंकों, नेताओं और सरकारी अधिकारियों की तिजोरियों में जमा हो गयी है।

Sunday, September 7, 2008

कोसी की बाढ़ और भारत गांव की लघुकथा


पिछले कुछ दिनों से कोसी नदी की बाढ़ से उत्‍तरी बिहार में मची तबाही की खबरों को पढ़-देख कर कर मन में उमड़ रहे भावों ने कब एक लघुकथा का शक्‍ल ले लिया पता ही नहीं चला। वह अच्‍छी या बुरी जैसी भी है, आपके समक्ष प्रस्‍तुत है :

भारत नामक गांव के दस भाइयों के उसे बड़े परिवार में वैसे तो सभी हिन्‍दीभाषी थे, लेकिन दो भाई अंगरेजी भी जानते थे।

जमींदार की गुलामी से आजाद होने के बाद सभी भाइयों ने मिलकर नया घर बनाया और नए तरीके से गृहस्‍थी बसाई।

हिन्‍दी जाननेवाले आठ भाई खुद कृषि, दस्‍तकारी आदि पेशे में लग गए और घर चलाने की जिम्‍मेवारी अंगरेजी जाननेवाले भाइयों को सौंप दी।

पहले परिवार के सारे निर्णय सबकी सहमति से होते थे। लेकिन अब अंगरेजी जाननेवाले दोनों भाई एक-दूसरे से ही विमर्श कर घर के सभी फैसले करने लगे।

धीरे-धीरे उन्‍होंने परिवार की अधिकांश जायदाद अपने कब्‍जे में कर ली और शहर में जाकर रहने लगे। शहर में अपने मकान में उन्‍होंने लाखों रुपये के टाइल्‍स लगवाए, लेकिन गांव में मौजूद हिन्‍दीभाषी भाइयों के मिट्टी के मकान की मरम्‍मत तक नहीं कराई।

एक दिन इतनी तेज बारिश हुई कि गांव के उनके और अन्‍य सारे लोगों के मकान ढह गए और अधिकांश लोग मलबे में दब कर मर गए। अब गांव में चारों ओर या तो मलबे और लाशें थीं, या जख्‍मी अधमरे लोगों की करुण चित्‍कार।

बारिश में मरे लोगों के जीवन का दर्द अब आंसू की शक्‍ल में अंगरेजी जाननेवाले भाइयों की कलम से अबाध गति से झर रहा है। कभी वे इस दर्द को अपने मुंह से बयां करते हैं, कभी उनकी लेखनी कमाल दिखाती है। अक्‍सर वे इस विपदा के लिए प्रकृति या सरकार को कोसते हैं। अब वे दुनिया भर के लोगों के धन्‍यवादपात्र हैं, क्‍योंकि उन्‍हीं के माध्‍यम से दुनिया को भारत गांव के लोगों की बदनसीबी व बदहाली की जानकारी मिली। अगर वे नहीं होते तो शायद लोगों को यह सब पता ही नहीं चलता।

(फोटो बीबीसी हिन्‍दी से साभार)

Wednesday, September 3, 2008

खेती-बाड़ी की समीक्षा : रंजना भाटिया की कलम से

18 मई, 2008 को जब मैंने अपनी पहली पोस्‍ट लिखी थी, उस समय मैं ब्‍लॉगजगत के लिए अजनबी था। न कोई दोस्‍त, न कोई परिचित। किसी नए ब्‍लॉगर के इष्‍ट मित्रों द्वारा लिखित उसके स्‍वागत वाली पोस्‍टें पढ़ता तो सोचता- ''काश, यहां मेरा भी कोई करीबी होता।''

लेकिन इन साढ़े तीन महीनों में ब्‍लॉगजगत के लोगों से इतना स्‍नेह और प्रोत्‍साहन मिला कि एकाकीपन कब और कहां चला गया पता ही नहीं चला। आज पूरा हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत परिवार सा लगता है, और मैं अपने को सौभाग्‍यशाली समझता हूं कि मैं इस परिवार का सदस्‍य हूं।

साथी चिट्ठाकारों के प्रोत्‍साहन की ताजा कड़ी कई महत्‍वपूर्ण चिट्ठों का लेखन कर रही लोकप्रिय चिट्ठाकार रंजना भाटिया जी द्वारा मेरे चिट्ठे खेती-बाड़ी की हिन्‍दी मीडिया पर समीक्षा है। इसे इस लिंक पर जाकर देखा जा सकता है। रंजना जी ने इस देहाती किसान के ब्‍लॉग को इस लायक समझा, उनका हार्दिक आभार।

इसके साथ ही मैं तस्‍लीम के महामंत्री जाकिर अली 'रजनीश' जी को भी धन्‍यवाद देता हूं जिन्‍होंने विज्ञान ब्‍लॉग चर्चा के तहत आज अपनी पोस्‍ट में खेती-बाड़ी को भी इज्‍जत बख्‍शी है।

एक विनम्र निवेदन : कोसी नदी की प्रलयंकारी बाढ़ से बिहार के कम-से-कम 8 जिलों के 417 से भी अधिक गांवों के करीब 40 लाख लोग बेघर और दाने-दाने के मोहताज हो गए हैं। हो सकता है, इनमें से कुछ अपनी रोजी-रोटी के लिए थोड़े समय के लिए आपके-हमारे शहर-गांव में भी शरण लें। हमारी थोड़ी सी संवेदना व समझदारी इनके जीवन-संघर्ष को कुछ आसान बना सकती है।

Wednesday, August 27, 2008

किसानों के लिए बीज व पानी से भी अहम है हिन्‍दी का मुद्दा

आज हम आपसे हिन्‍दी के विषय में बातचीत करना चाहते हैं। हो सकता है, हमारे कुछ मित्रों को लगे कि किसान को खेती-बाड़ी की चिंता करनी चाहिए। वह हिन्‍दी के पचड़े में क्‍यों पड़ रहा है। लेकिन हमारा मानना है कि हिन्‍दी के कल्‍याण के बिना हिन्‍दुस्‍तान के आमजन खासकर किसानों का कल्‍याण संभव नहीं।

राष्‍ट्र की आजादी के बाद भी यहां की आम जनता आर्थिक रूप से इसलिए गुलाम है, क्‍योंकि उसकी राष्‍ट्रभाषा गुलाम है। विशेष रूप से किसानों के लिए तो हिन्‍दी का मुद्दा बीज, खाद और पानी से भी अधिक महत्‍वपूर्ण है। किसी फसल के लिए अच्‍छा बीज व पर्याप्‍त सिंचाई नहीं मिले तो वह फसल मात्र ही बरबाद होगी, लेकिन राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी की पराधीनता भारत के बहुसंख्‍यक किसानों व उनकी भावी पीढि़यों के संपूर्ण जीवन को ही नष्‍ट कर रही है।

देश के करीब सत्‍तर करोड़ किसानों में अधिकांश हिन्‍दी जुबान बोलते व समझते हैं। लेकिन देश के सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों की राजकाज की भाषा आज भी अंगरेजी ही है। यह एक ऐसा दुराव है, जो इस भूमंडल पर शायद ही कहीं और देखने को मिले। जनतंत्र में जनता और शासक वर्ग का चरित्र अलग-अलग नहीं होना चाहिए। लेकिन हमारे देश में उनका भाषागत चरित्र भिन्‍न-भिन्‍न है। जनता हिन्‍दी बोलती है, शासन में अंग्रेजी चलती है। इससे सबसे अधिक बुरा प्रभाव किसानों पर पड़ रहा है, क्‍योंकि वे गांवों में रहते हैं, जहां अंगरेजी भाषा की अच्‍छी शिक्षा संभव नहीं हो पाती। आजाद होते हुए भी जीवनपर्यन्‍त उनकी जुबान पर अंगरेजी का ब्रितानी ताला लगा रहता है।

आज के समय में कस्‍बाई महाविद्यालयों से बीए की डिग्री लेनेवाले किसानपुत्र भी पराये देश की इस भाषा को ठीक से नहीं लिख-बोल पाते। कुपरिणाम यह होता है कि किसान न शासकीय प्रतिष्‍ठानों तक अपनी बात ठीक से पहुंचा पाते हैं, न ही सत्‍तातंत्र के इरादों व कार्यक्रमों को भलीभांति समझ पाते हैं। सबसे बड़ा दुष्‍परिणाम यह होता है कि वे रोजगार के अवसरों से वंचित हो जाते हैं।

हिन्‍दी आज बाजार की भाषा भले हो, लेकिन वह रोजगार की भाषा नहीं है। किसी भी देश में रोजगार की भाषा वही होती है, जो राजकाज की भाषा होती है। चूंकि हमारे देश में राजकाज की वास्तविक भाषा अंगरेजी है, इसलिए रोजगार की भाषा भी वही है। रोजगार नहीं मिलने से किसान गरीब बने रहते हैं, उनकी खेती भी अर्थाभाव में पिछड़ी रहती है, और आर्थिक-सामाजिक-शैक्षणिक विषमता की खाई कभी भी पट नहीं पाती।

जाहिर है यदि भारत के राजकाज की भाषा हिन्‍दी होती तो देश की बहुसंख्‍यक किसान आबादी अपनी जुबान पर ताला लगा महसूस नहीं करती। तब देश के किसान सत्‍ता के साथ बेहतर तरीके से संवाद करते एवं रोजगार के अवसरों में बराबरी के हिस्‍सेदार होते।

Saturday, August 23, 2008

आत्‍महत्‍या करनेवाले का भी गला दबा रहे मनमोहन जी?

केन्‍द्र की मनमोहन सिंह की सरकार किसानों को तबाह करने पर तुली हुई है। किसान और कृषि से संबंधित हाल में लिए गए तमाम फैसले इसी बात का संकेत दे रहे हैं। हो सकता है यह सरकार गांवों के बदले शहर बसाने के अपने घोषित इरादे को पूरा करने के लिए ऐसा कर रही हो। शायद उसकी यह सोच हो कि किसान खेती छोड़ देंगे तो गांव भी उजड़ जाएंगे।

केन्‍द्र सरकार द्वारा लिया गया सबसे ताजा किसान विरोधी फैसला गैर-बासमती चावल और मक्‍के के बीजों के निर्यात की अनुमति देना है। गौरतलब है कि सरकार ने चावल और मक्‍का के निर्यात पर पाबंदी लगा रखी थी। उन अनाजों के निर्यात पर पाबंदी अभी जारी रहेगी, अनुमति सिर्फ बीजों के निर्यात को मिली है। वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि बीज के इन पैकेटों पर साफ-साफ लिखा होगा कि ये मानव उपभोग के लायक नहीं हैं। बयान में कहा गया है कि पैकेट पर यह भी लिखा होगा कि इन बीजों में केमिकल मिला हुआ है, लिहाजा यह न तो मानव के उपभोग के काबिल हैं और न ही इनका इस्तेमाल चारे के रूप में किया जा सकता है।

लाख माथापच्‍ची करने पर भी इस निर्णय का औचित्‍य हमारी समझ में नहीं आया। आखिर किसके हित में यह फैसला लिया गया? प्रत्‍यक्ष तौर पर तो इस फैसले से दो को ही लाभ होता दिख रखा है- बीज उत्‍पादक कंपनियों को और विदेशी किसानों को। तो हम मान लें कि हमारी सरकार को अनाज उपजानेवाले अपने देश के किसानों से अधिक चिंता अनाजों की तिजारत करनेवाले कृषि निर्यातकों और विदेशी किसानों की है। कहीं इस फैसले द्वारा अनाज निर्यातकों को भ्रष्‍टाचार की पतली गली तो मुहैया नहीं करायी जा रही? कहीं ऐसा तो नहीं कि निर्यातित पैकेटों पर लिखा होगा 'केमिकल मिला बीज' और उनके अंदर भरा रहेगा 'खाने लायक अनाज'!

जहां तक भारत के किसानों की बात है तो यह फैसला उनके हित में तो नहीं ही है। इसके विपरीत इस तरह का निर्णय लेना खुद ही जान दे रहे उस समुदाय का गला घोंटने के समान है। आप स्‍वयं सोच कर देखें। चावल और मक्‍का के निर्यात पर पाबंदी के पक्ष में केन्‍द्र सरकार का तर्क है कि इससे महंगाई की ऊंची दर काबू में रहेगी। सरकार का कहना है कि इन अनाजों के निर्यात पर पाबंदी से देसी बाजार में इनकी आपूर्ति बनी रहेगी, लिहाजा कीमत में बढ़ोतरी की गुंजाइश नहीं होगी। क्‍या यही तर्क गैर-बासमती धान और मक्‍का के बीजों पर भी लागू नहीं होता? क्‍या उनके निर्यात की अनुमति से देसी बाजारों में उनकी आपूर्ति कम नहीं होगी और लिहाजा उनकी कीमतें नहीं बढ़ेंगी?

क्‍या विडंबना है? सरकार को किसानों के लिए सस्‍ता बीज मुहैया कराना चाहिए तो उलटे वह उसे और अधिक महंगा करने का उपाय कर रही है। बढ़ती महंगाई के दौर में किसानों के जीवन निर्वाह के खर्च और कृषि लागत में पहले ही काफी बढ़ोतरी हो चुकी है। बीज के मामले में तो किसानों का जमकर शोषण हो रहा है। कई कंपनियां उनसे बीज पर ढाई हजार फीसदी से भी अधिक मुनाफा वसूल कर रही है। क्‍या अभी भी सरकार का मन नहीं भरा?

अरे, माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन जी, कुछ तो रहम कीजिए देश के किसानों पर। आखिर कितना और कब तक गला दबाएंगे इस निरीह समुदाय का? जो खुद ही आत्महत्‍या कर रहा, उसका गला क्‍या दबाना? सही बात है, सरकार सरकार है, वह जो चाहे करे। लेकिन आपकी सरकार किसान हितैषी होने का दावा भी तो करती है। आप लोगों ने ही तो नारा दिया है- कांग्रेस का हाथ, अन्‍नदाता के साथ?

Wednesday, August 20, 2008

महाकवि निराला की कविता : चर्खा चला


वेदों का चर्खा चला,
सदियां गुजरीं।
लोग-बाग बसने लगे।
फिर भी चलते रहे।
गुफाओं से घर उठाये।
उंचे से नीचे उतरे।
भेड़ों से गायें रखीं।
जंगल से बाग और उपवन तैयार किये।

खुली जबां बंधने लगी।
वैदिक से संवर दी भाषा संस्‍कृत हुई।
नियम बने, शुद्ध रूप लाये गये,
अथवा जंगली सभ्‍य हुए वेशवास से।
कड़े कोस ऐसे कटे।
खोज हुई, सुख के साधन बढ़े-
जैसे उबटन से साबुन।

वेदों के बाद जाति चार भागों में बंटी,
यही रामराज है।
वाल्‍मीकि ने पहले वेदों की लीक छोड़ी,
छन्‍दों में गीत रचे, मंत्रों को छोड़कर,
मानव को मान दिया,
धरती की प्‍यारी लड़की सीता के गाने गाये।

कली ज्‍योति में खिली
मिट्टी से चढ़ती हुई।
''वर्जिन स्‍वैल'', ''गुड अर्थ'', अब के परिणाम हैं।
कृष्‍ण ने भी जमीं पकड़ी,
इन्‍द्र की पूजा की जगह
गोवर्धन को पुजाया,
मानव को, गायों और बैलों को मान दिया।

हल को बलदेव ने हथियार बनाया,
कन्‍धे पर डाले फिरे।
खेती हरी-भरी हुई।
यहां तक पहुंचते अभी दुनियां को देर है।


(कविता राग-विराग तथा चित्र विकिपीडिया से साभार)

Thursday, August 14, 2008

पुस्‍तक अंश : स्‍वतंत्रता दिवस पर विशेष

विख्‍यात इतिहासकार सुमित सरकार की पुस्‍तक 'आधुनिक भारत' का एक अंश

पंद्रह अगस्‍त

अंतत: भारतीय प्रायद्वीप को स्‍वतंत्रता मिल ही गयी और स्‍वतंत्रता-सेनानियों के सुनहरे सपनों की तुलना में अनेक लोगों को यह तुच्‍छ ही प्रतीत हुई होगी। कारण कि अनेक वर्षों तक भारत में मुसलमानों और पाकिस्‍तान में हिन्‍दुओं के लिए स्‍वतंत्रता का अर्थ रहा – अचानक भड़क उठनेवाली हिंसा और रोजगार तथा आर्थिक अवसरों की तंगी के बीच या अपनी पीढि़यों पुरानी जड़ों से उखड़कर शरणार्थियों के रेले में सम्मिलित हो जाने के बीच चयन करना। यह बहुआयामी मानव-त्रासदी बलराज साहनी की अंतिम फिल्‍म 'गरम हवा' में बड़े ही हृदयस्‍पर्शी ढंग से चित्रित हुई है।

एक अन्‍य स्‍तर पर जो पूर्णत: असंबद्ध नहीं है, वे आर्थिक एवं सामाजिक विषमताएं अभी भी बनी रहीं, जिन्‍होंने साम्राज्‍यवाद-विरोधी जन-आंदोलन को ठोस आधार प्रदान किया था क्‍योंकि शहरों और गांवों में विशेषाधिकार-संपन्‍न समूह राजनीतिक स्‍वंत्रता की प्राप्ति का संबंध उग्र सामाजिक परिवर्तनों से तोड़ने में सफल रहे थे। अंग्रेज तो चले गए थे किन्‍तु पीछे छोड़ गए थे अपनी नौकरशाही और पुलिस जिनमें स्‍वतंत्रता के बाद भी विशेष अंतर नहीं आया था और जो उतने ही (कभी-कभी तो और भी अधिक) दमनकारी हो सकते थे।

अपने जीवन के अंतिम महीनों में महात्‍मा गांधी के अकेलेपन और व्‍यथा के कारण केवल सांप्रदायिक दंगे ही नहीं थे। अपनी हत्‍या से कुछ ही पहले उन्‍होंने चेतावनी दी थी कि देश को अपने ''सात लाख गांवों के लिए सामाजिक, नैतिक और आर्थिक आजादी पानी अभी बाकी है'', ''कि कांग्रेस ने 'राटन बरो' बना लिए हैं जो भ्रष्‍टाचार की ओर जाते हैं, ये वे संस्‍थाएं हैं जो नाममात्र के लिए ही लोकप्रिय और जनतांत्रिक हैं।'' इस कारण उन्‍होंने सलाह दी थी कि राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस को भंग कर दिया जाना चाहिए और उसके स्‍थान पर एक लोकसेवक संघ की स्‍थापना की जानी चाहिए जिसमें सच्‍चे अर्थों में समर्पित, आत्‍मबलिदानी, रचनात्‍मक ग्राम-कार्य करनेवाले लोग हों।

फिर भी करोड़ों लोग जो समस्‍त भारतीय प्रायद्वीप में खुशियां मना रहे थे, अर्धरात्रि को भारत की 'नियति के साथ भेंट' पर नेहरू का भाषण सुनकर रोमांचित हो रहे थे और जिन्‍होंने उस समय बालक रहे व्‍यक्ति के लिए भी 15 अगस्‍त को एक अविस्‍मरणीय अनुभव बना दिया था, वे पूर्णरूपेण भ्रांति के शिकार नहीं थे। 1948-51 में कम्‍युनिस्‍टों ने अपनी कीमत पर ही जाना कि 'ये आजादी झूठी है' के नारे में दम नहीं था। भारत की स्‍वाधीनता उपनिवेशवाद के विघटन की एक ऐसी प्रक्रिया का आरंभ थी जिसे, कम से कम जहां तक राजनीतिक स्‍वाधीनता का प्रश्‍न है, रोकना कठिन सिद्ध हुआ।

('आधुनिक भारत' के पहले छात्र संस्‍करण 1992 के पृष्‍ठ 504-505 से साभार)

Wednesday, August 6, 2008

किसान महाकवि घाघ और उनकी कविताएं

आज के समय में टीवी व रेडियो पर मौसम संबंधी जानकारी मिल जाती है। लेकिन सदियों पहले न टीवी-रेडियो थे, न सरकारी मौसम विभाग। ऐसे समय में महान किसान कवि घाघ व भड्डरी की कहावतें खेतिहर समाज का पीढि़यों से पथप्रदर्शन करते आयी हैं। बिहार व उत्‍तरप्रदेश के गांवों में ये कहावतें आज भी काफी लोकप्रिय हैं। जहां वैज्ञानिकों के मौसम संबंधी अनुमान भी गलत हो जाते हैं, ग्रामीणों की धारणा है कि घाघ की कहावतें प्राय: सत्‍य साबित होती हैं।

घाघ और भड्डरी के जीवन के बारे में प्रामाणिक तौर पर बहुत ज्ञात नहीं है। उनके द्वारा रचित साहित्‍य का ज्ञान भी ग्रामीणों ने किसी पुस्‍तक में पढ़ कर नहीं बल्कि परंपरा से अर्जित किया है। कहावतों में बहुत जगह 'कहै घाघ सुनु भड्डरी', 'कहै घाघ सुन घाघिनी' जैसे उल्‍लेख आए हैं। इस आधार पर आम तौर पर माना जाता है कि भड्डरी घाघ कवि की पत्‍नी थीं। हालांकि अनेक लोग घाघ व भड्डरी को पति-पत्‍नी न मानकर एक ही व्‍यक्ति अथवा दो भिन्‍न-भिन्‍न व्‍यक्ति मानते हैं।

घाघ और भड्डरी की कहावतें नामक पुस्‍तक में देवनारायण द्विवेदी लिखते हैं, ''कुछ लोगों का मत है कि घाघ का जन्म संवत् 1753 में कानपुर जिले में हुआ था। मिश्रबंधु ने इन्हें कान्यकुब्ज ब्राह्मण माना है, पर यह बात केवल कल्पना-प्रसूत है। यह कब तक जीवित रहे, इसका ठीक-ठाक पता नहीं चलता।''

यहां हम प्रस्‍तुत कर रहे हैं महाकवि घाघ की कुछ कहावतें व उनका अर्थ :

सावन मास बहे पुरवइया।
बछवा बेच लेहु धेनु गइया।।


अर्थात् यदि सावन महीने में पुरवैया हवा बह रही हो तो अकाल पड़ने की संभावना है। किसानों को चाहिए कि वे अपने बैल बेच कर गाय खरीद लें, कुछ दही-मट्ठा तो मिलेगा।

शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।
तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।।


अर्थात् यदि शुक्रवार के बादल शनिवार को छाए रह जाएं, तो भड्डरी कहते हैं कि वह बादल बिना पानी बरसे नहीं जाएगा।

रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय।
कहै घाघ सुन घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।।

अर्थात् यदि रोहिणी पूरा बरस जाए, मृगशिरा में तपन रहे और आर्द्रा में साधारण वर्षा हो जाए तो धान की पैदावार इतनी अच्छी होगी कि कुत्ते भी भात खाने से ऊब जाएंगे और नहीं खाएंगे।

उत्रा उत्तर दै गयी, हस्त गयो मुख मोरि।
भली विचारी चित्तरा, परजा लेइ बहोरि।।

अर्थात् उत्तरा और हथिया नक्षत्र में यदि पानी न भी बरसे और चित्रा में पानी बरस जाए तो उपज ठीक ठाक ही होती है।

पुरुवा रोपे पूर किसान।
आधा खखड़ी आधा धान।।


अर्थात् पूर्वा नक्षत्र में धान रोपने पर आधा धान और आधा खखड़ी (कटकर-पइया) पैदा होता है।

आद्रा में जौ बोवै साठी।
दु:खै मारि निकारै लाठी।।


अर्थात् जो किसान आद्रा नक्षत्र में धान बोता है वह दु:ख को लाठी मारकर भगा देता है।

दरअसल कृषक कवि घाघ ने अपने अनुभवों से जो निष्‍कर्ष निकाले हैं, वे किसी भी मायने में आधुनिक मौसम विज्ञान की निष्‍पत्तियों से कम उपयोगी नहीं हैं।

Tuesday, August 5, 2008

केंद्र बुझाने चला महंगाई की आग, बिहार में जल उठा मक्का

हम आरंभ से ही कहते आए हैं कि केन्‍द्र सरकार अनाजों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर भारतीय किसानों का गला घोंटने का काम कर रही है। महंगाई का सबसे अधिक बोझ किसानों को उठाने के लिए विवश किया जा रहा है। शायद केन्‍द्र सरकार की यह धारणा रही हो कि गरीब व अशिक्षित किसान उसकी इस चालाकी को समझ नहीं पाएंगे। लेकिन सरकार की चालबाजी धीरे-धीरे किसानों की समझ में आने लगी है। खेती-बाड़ी की कल की पोस्‍ट में हमने बिहार के मक्‍का उत्‍पादक किसानों की त्रासदी के बारे में चर्चा की थी। साभार प्रस्‍तुत है आज के बिजनेस स्‍टैंडर्ड की इससे संबंधित टॉप स्‍टोरी :

महंगाई की आंच से देश को बचाने की केंद्र सरकार की जुगत के नतीजे भले ही कुछ भी निकलें, मगर आग बुझाने की इसी कवायद के चलते बिहार में मक्का जरूर जलने लगा है।

इसकी भड़कती आग का आलम यह है कि इसमें राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए राज्य का कोई छोटा-बड़ा राजनीतिक दल कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ रहा है। दूसरी ओर, राज्य में इस साल हुई मक्के की बंपर पैदावार को लेकर किसान इसे बेचने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।

मक्के में लगी इस आग की वजह है, इसके निर्यात पर केंद्र द्वारा महंगाई की आग बुझाने के नाम पर हाल ही में लगाई गई पाबंदी। हालांकि मक्के को लेकर मची इस आपाधापी में सोमवार किसानों को थोड़ी राहत की खबर जरूर लेकर आया है, जिसके तहत बिहार सरकार ने राज्य में मक्के की खरीद के लिए नैफेड को अधिकृत कर दिया।

मगर यह ताजातरीन फैसला भी किसानों के लिए ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होने जा रहा है। इसकी वजह यह है कि नैफेड के जरिए सरकार इसे महज 620 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद रही है जबकि इस समय इसका बाजार भाव 1000 रुपये प्रति क्विंटल है।

बहरहाल, राज्य के खाद्य आपूर्ति सचिव त्रिपुरारी शरण ने बिजनेस स्टैंडर्ड से हुई बातचीत में आदेश की पुष्टि करते हुए बताया कि नैफेड राज्य के सभी जिलों में मक्का क्रय केन्‍द्र खोलने जा रही है। यह पूछने पर कि इस समय बाजार में मक्के का भाव 1,000 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास है, ऐसे में किसानों को बाजार मूल्य का महज 60 फीसदी ही क्यों अदा किया जा रहा है? शरण ने कहा कि राज्य सरकार एमसपी नहीं तय करती लिहाजा वह इसी कीमत पर किसानों से खरीदारी करने को मजबूर है।

कितना है मक्के का उत्पादन?

अनुमान है कि इस साल राज्य में 17 लाख टन, देश के कुल उत्पादन का 10 फीसदी, मक्के का उत्पादन हुआ है। राज्य के कई जिलों से खबर मिली है कि मक्के की बंपर पैदावार होने और निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिए जाने से इसके भंडार बारिश में यूं ही बर्बाद हो रहे हैं। कठेला, भागलपुर के राकेश चौधरी का कहना है कि प्रतिबंध से पहले इसकी आपूर्ति कोलकाता और मुंबई को की जा रही थी। लेकिन प्रतिबंध के बाद महेशकूट और मानसी स्टेशनों पर मक्के की सैकड़ों बोरियां बर्बाद होने के लिए पड़ी हैं।

हर कोई कर रहा हितैषी का दावा

राज्य का हर राजनीतिक दल खुद को मक्का किसानों का हितैषी साबित करने की कवायद में जुटा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा का दावा है कि मक्का किसानों की समस्या को सबसे पहले उन्होंने ही उठाया है। कुशवाहा के मुताबिक उनकी पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय कृषि मंत्री और राकांपा अध्यक्ष शरद पवार के सामने सबसे पहले इस मसले को उठाया।

इसके बाद मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा। बकौल कुशवाहा पवार ने उन्हें आश्वस्त किया कि इस हफ्ते से एफसीआई राज्य में मक्के की खरीद शुरू कर देगी। लेकिन एफसीआई (पटना) में अतिरिक्त महाप्रबंधक ए.एस. सैफी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि मक्के की खरीद के लिए अब तक उन्हें केंद्र से कोई आदेश नहीं मिला है।

क्या है मसला?

केंद्र ने महंगाई को थामने के लिए 3 जुलाई को मक्के के निर्यात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। यह प्रतिबंध आगामी 15 अक्टूबर तक प्रभावी रहना है। लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री ने चंद रोज पहले ही पत्र लिखकर प्रधानमंत्री से कहा कि राज्य में इस बार मक्के की बंपर पैदावार हुई है। इसलिए इस प्रतिबंध से राज्य के किसानों का उनकी फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिल सकेगा। फसल की कम कीमत से किसानों के लिए जहां लागत निकालना दूभर हो जाएगा, वहीं भीषण महंगाई के बीच उनका जीना मुश्किल हो जाएगा। लिहाजा इस प्रतिबंध को हटा लेना चाहिए।

Sunday, August 3, 2008

कितनी किसान हितैषी है केन्‍द्र सरकार : संदर्भ डब्‍ल्‍यूटीओ की जेनेवा वार्ता

विश्‍व व्‍यापार को बेहतर बनाने के लिए जेनेवा में चल रही दोहा दौर की डब्‍ल्‍यूटीओ वार्ता बिना सहमति के समाप्‍त हो गयी। कृषि और गैर कृषि वस्‍तुओं पर सब्सिडी तथा शुल्‍कों में कमी कर बहुपक्षीय विश्‍व व्‍यापार प्रणाली को उदार बनाने के समझौते के लिए 21 से 26 जुलाई तक आयोजित यह बैठक 29 जुलाई तक चली, लेकिन किसानों की आजीविका से जुड़े मुद्दों पर मुख्‍यत: अमेरिका के अडि़यल रवैये के चलते अंतत: विफल रही। जेनेवा बैठक में भारत का प्रतिनिधित्‍व करनेवाले केन्द्रीय वाणिज्य एवं उघोग मंत्री कमलनाथ के बयान जिस तरह मीडिया में देखने को मिले, उससे लगता है कि केन्‍द्र सरकार किसानों की बहुत बड़ी हितैषी है। लेकिन सच्‍चाई खाने और दिखावे के दांत भिन्‍न-भिन्‍न वाली है।

जेनेवा बैठक में भारत की ओर से कमलनाथ का स्‍टैंड निश्चित रूप से सराहनीय रहा, लेकिन घरेलू मोर्चे पर केन्‍द्र सरकार की कृषि नीति विरोधाभासी रही है। जिस समय विश्‍व व्‍यापार संगठन बैठक में जेनेवा में केन्द्रीय वाणिज्य एवं उघोग मंत्री भारतीय किसानों के हितों की दुहाई दे रहे थे, नई दिल्‍ली में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को 850 रुपये से बढ़ाकर 1,000 रुपये करने की सिफारिश को खारिज कर दिया। किस मुंह से यह सरकार किसानों की मददगार होने की बात कहती है? अमेरिका में किसानों की आबादी मात्र दो फीसदी है, फिर भी वहां उन्‍हें इतनी अधिक सब्सिडी दी जाती है कि भारत जैसे देशों को उसमें कटौती की मांग करनी पड़ती है। भारत में आबादी का दो तिहाई हिस्‍सा किसानों का ही है, फिर भी यहां की सरकार उन्‍हें उपज की वाजिब कीमत तक देने को तैयार नहीं होती। आसमान छू रही महंगाई की वजह से किसानों की कृषि लागत और जीवन निर्वाह का व्‍यय का काफी बढ़ गया है। ऐसे में उन्‍हें उपज की वाजिब कीमत भी नहीं मिलेगी तो आत्‍महत्‍या करने के अलावा और कौन-सा विकल्‍प रहेगा उनके पास?

न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य ही नहीं, कृषि उपज के व्‍यापार के मामले में भी केन्‍द्र सरकार का रवैया किसान विरोधी है। डब्‍ल्‍यूटीओ वार्ता में भारतीय किसानों के हितों के संरक्षण की ढपोरशंखी बातें करनेवाली सरकार व्‍यवहार में इसके विपरीत काम कर रही है। इस सरकार ने भारतीय किसानों पर बंदिशें थोपते हुए गेहूं, चावल व मक्‍का के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा है। भारतीय किसानों की उपज के निर्यात पर प्रतिबंध से किसके हित का संरक्षण हो रहा है, भारतीय किसानों का अथवा विदेशी किसानों का?

देश के माननीय कर्णधारो, अमेरिका से अधिक तो आप ही भारतीय किसानों का गला दबा रहे हैं। यदि गैर कृषक आबादी को सस्‍ता अनाज मुहैया कराने के लिए चावल-गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रहे हैं, तो स्‍वीकार कर लीजिए डब्‍ल्‍यूटीओ वार्ता में अमेरिकी शर्तें। आपके ही कहे अनुसार भारत में मौजूदा कीमतों से भी सस्‍ता मिलेगा लोगों को अनाज। यह अलग बात है कि तब शायद आपको महंगी दरों पर घटिया गेहूं के आयात का सुअवसर न मिले। लेकिन आप तो दोनों में से कोई भी काम नहीं कर रहे – न किसानों को वाजिब कीमत दे रहे हैं, न ही गैर किसान आबादी को सस्‍ता खाद्य पदार्थ। घोटालेबाज व जमाखोर आपकी नीतियों की वजह से जरूर मालामाल हो रहे हैं।

खबर है कि केन्‍द्र सरकार गैर बासमती चावल के निर्यात पर लगी पाबंदी की अब समीक्षा करने जा रही है। अब यदि सरकार यह पाबंदी हटा भी लेगी तो फिलहाल किसानों को कोई लाभ मिलने से रहा। जो भी लाभ होगा, व्‍यापारियों को होगा। किसान तो अपना धान, चावल कब का औने-पौने दामों पर बेच चुके हैं। अगली फसल चार-पांच माह बाद तैयार होगी।

केन्‍द्र सरकार द्वारा इस्‍पात के मूल्‍य को नियंत्रित करने की कोशिशों का विरोध घरेलू इस्‍पात उद्योग यह कह कर रहा है कि इससे औद्योगिक विकास प्रभावित होगा। तो क्‍या इसी तरह से घरेलू कृषि उपज की कीमतों को नियंत्रित करने से देश में कृषि के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ रहा? किसानों की आवाज उठानेवाली कोई मजबूत लॉबी नहीं है तो आप उन्‍हें भट्ठी में झोंक दीजिएगा?

केन्‍द्र सरकार की किसान विरोधी नीति के चलते इन दिनों बिहार के मक्‍का उत्‍पादक किसान त्राहि त्राहि कर रहे हैं। मक्‍का की बंपर उपज के बावजूद केन्‍द्र सरकार द्वारा गत जुलाई माह में उसके निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। प्रतिबंध के बाद बिहार में मक्‍के की कीमत 750 रुपये से घटकर 500 रुपये प्रति क्‍वींटल पर आ गयी है। बिहार के कोसी क्षेत्र के मक्‍का उत्‍पादक किसानों में इससे हाहाकार मचा हुआ है। मक्‍का उत्‍पादक किसानों की दुर्दशा देख सूबे के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार सहित कई राजनेताओं ने मक्‍का निर्यात पर लगी पाबंदी हटाने की मांग की है। लेकिन केन्‍द्र सरकार निर्यात पर लगी पाबंदी हटाने के बजाय बिहार से मक्‍का की खरीदारी पर विचार कर रही है। यदि मक्‍के की सरकारी खरीदारी होती भी है तो किसानों को मात्र 620 रुपये प्रति क्‍वींटल का ही न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य मिलेगा। मतलब मक्‍का उत्‍पादक किसानों के लिए हर हालत में इस साल खेती घाटे का सौदा ही होने जा रही है। यही है - कांग्रेस का हाथ, अन्‍नदाता के साथ?

Thursday, July 24, 2008

किसान कर्ज माफी में ही दे दिया गया था बेईमान बनने का संदेश

संसद में नोटों की गड्डी लहराते देख लोगों को जो पीड़ा हुई उसे समझा जा सकता है। हालांकि यदि हम कृषि ऋण माफी की नैतिकता पर विचार करें तो उसके सामने सांसदों की यह खरीद-फरोख्‍त कुछ भी नहीं। कृषि ऋण माफी के रूप में केन्‍द्र सरकार ने किसानों की ईमानदारी को करारा तमाचा मारा। ईमानदारी बरतनेवाले किसानों की जुबानी सराहना तक नहीं की गयी और विपरीत आचरण करनेवालों पर 71 हजार करोड़ रुपये लुटा दिये गये। जाहिर है, कर्ज माफी के नाम पर इस देश में कृषि से जुड़े करीब सत्‍तर करोड़ लोगों को बेईमान बनने का संदेश दिया गया।

बचपन से हम सुनते आये हैं कि ऑनेस्‍टी इज द बेस्‍ट पॉलिसी, ईमानदारी अच्‍छी नीति है। लेकिन किसानों की कर्ज माफी के नाम पर सरकार ने जो कुछ किया, यह धारणा एक झटके में निर्मूल हो गयी। नीतिवान लोग हमें सिखाते हैं कि जिसका कुछ लो उसे समय से लौटा दो। जिन किसानों ने यह आचरण अपने जीवन में उतारा, वे मुंह ताकते रह गये। इसके विपरीत आचरण करनेवाले मौज मना रहे हैं। जो कर्ज दबाकर रखा था वह माफ हो गया, अब नया कर्ज भी उन्‍हें ही मिल रहा है।

वित्‍तमंत्री पी. चिदंबरम को गुमान है कि उन्‍होंने किसानों के हित में देश की अब तक की सबसे बड़ी कर्ज माफी योजना लागू करायी है। कहा जा रहा है कि देश के चार करोड़ छोटे व सीमांत किसानों को कर्जमुक्‍त कर दिया गया और बड़े किसानों को भी इस योजना का लाभ पहुंचा। मीडिया ने भी इन खबरों को इस तरह उछाला मानों किसानों को बहुत बड़ा तोहफा दिया गया। लेकिन सच्‍चाई यह है कि कर्ज माफी में छोटे, सीमांत, बड़े इन सभी किसानों का ध्‍यान रखा गया, ध्‍यान नहीं रखा गया तो ईमानदार किसानों का। ईमानदारी उनके लिये अभिशाप बन गयी। उनका दोष यही रहा कि उन्‍होंने बैंक से कर्ज लेकर उसे समय सीमा के अंदर जमा करते रहे। उन पर दोहरी मार पड़ी। करों के रूप में कर्ज माफी का बोझ भी उठाया और खुद इससे वंचित भी रहे।

फरवरी, 2008 में लोकसभा में वर्ष 2008-09 का आम बजट पेश करते हुए केन्‍द्रीय वित्‍तमंत्री पी. चिदंबरम ने कृषि ऋण माफी की जो योजना रखी, उसके दायरे में सिर्फ उन्‍हीं किसानों को रखा गया जिन्‍होंने 31 मार्च, 2007 से पहले कर्ज लिया था और 31 दिसंबर 2007 तक नहीं चुकाया था। अर्थात यदि किसी किसान ने (चाहे वह गरीब भूमिहीन बटाईदार किसान ही क्‍यों न हो) ईमानदारी पाली और पहले का कर्ज चुकाकर 31 मार्च, 2007 के बाद नया कर्ज लिया तो उसे एक पाई भी नहीं मिला। दूसरे शब्‍दों में हमारे वित्‍तमंत्री ने बजट पेश करते समय सिर्फ उन्‍हीं किसानों को इसका पात्र समझा जो उस समय तक डिफाल्‍टर घोषित हो चुके थे। वैसे कर्जदार जो डिफाल्‍टर नहीं रहे, उन्‍हें धेला भी नहीं मिला।

जाहिर है, केन्‍द्र सरकार से संदेश तो यही मिल रहा है कि इस देश में मेहनत और ईमानदारी की कोई कीमत नहीं? सत्‍तर करोड़ लोगों के बीच ईमानदारी का इतना घटिया मजाक करनेवाले लोग अगर कुछ सौ सांसदों के बीच नोटों की गड्डियों का लेन-देन करते पाये जायें तो इसमें अचरज की बात हमारे लिये तो नहीं ही है। अफसोस की बात है कि संसद में नोटो की गड्डी लहराते देख शर्म शर्म चिल्‍ला रहा मीडिया भी इस नजरिये से कर्ज माफी योजना पर कभी विचार नहीं किया। हमारी आंखें पथरा गयीं एक अदद ऐसी खबर की आस में जिसमें कहा गया हो कि सिर्फ डिफाल्‍टरों को मिला किसान कर्ज माफी योजना का लाभ। जब कि सच्‍चाई यही रही। किसान कर्ज माफी योजना की पात्रता के लिये सीमांत या छोटा किसान होना ही पर्याप्‍त नहीं रहा, डिफाल्‍टर होना जरूरी शर्त रही।

मौजूदा हालातों में एक बार फिर बाबा धूमिल याद आ रहे हैं-
'इस देश की मिट्टी में
अपने जांगर का सुख तलाशना
अन्‍धी लड़की की आंखों में
उससे सहवास का सुख तलाशना है'

Wednesday, July 23, 2008

मारुति की पंचायत स्‍कीम : ग्रामीण आबादी को उपभोक्‍ता बनाने की उद्योगजगत की कवायाद

ब्‍लॉग पत्रिका निरंतर के ताजा अंक में प्रकाशित अपने एक आलेख में हमने कहा है कि गांव को शहर बनाने की बात बाजार की ताकतों के दबाव में की जा रही है। भारत की ग्रामीण आबादी को उपभोक्‍ता बनाने के लिये बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां बेकरार हैं। इकनॉमिक टाइम्‍स में प्रकाशित यह खबर ग्रामीण भारत को अपने ग्राहक में तब्‍दील करने की उद्योगजगत की बेकरारी का परिचायक है :

देश की पहली लखटकिया कार पेश करने की टाटा की घोषणा के साथ ही दूसरी कार कंपनियों का सिरदर्द शुरू हो गया था। अक्तूबर में टाटा नैनो को लॉन्च किया जाना है। ऐसे में मारुति सुजुकी इंडिया (एमएसआई) ने ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ी अपनी कोशिशें तेज कर दी हैं।

कंपनी ने ग्रामीण विपणन अभियान के जरिए ज्यादा ग्राहकों के बीच पहुंचने का फैसला किया है। इसमें दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच मजबूत बनाना और आकर्षक कीमतों पर प्रमुख इकनॉमी मॉडल को पेश करने के साथ हर तालुका और पंचायत तक पहुंचना शामिल है। इस मिशन का लक्ष्य उन सभी लोगों तक पहुंचना है जो कार खरीदने की हैसियत रखते हैं।

मारुति क्षेत्र विशेष में मुहैया कराए जा रहे डिस्काउंट से ज्यादा अतिरिक्त छूट मुहैया करा रही है। मसलन, मारुति 800 खरीदने पर 5,000 रुपए का डिस्काउंट दिया जा रहा है जबकि कंपनी ने ओमनी की कीमतों में 3,000 रुपए की कटौती की है। आल्टो, वैगन आर और जेन एस्टिलो जैसे मॉडल 2,000 रुपए की छूट पर बेचे जा रहे हैं।

' पंचायत स्कीम' नामक इस योजना का उद्देश्य कारों को उन लोगों तक पहुंचाना है जो गांवों में रसूख रखते हैं। मारुति जिन लोगों को लक्ष्य बना रही हैं उनकी सूची में पंचायत के सदस्य, स्थानीय ग्रामीण बैंक के कर्मचारी, ग्रामीण अस्पतालों के डॉक्टर, सामान्य स्वास्थ्य केन्द्रों के सदस्य, शिक्षक, नम्बरदार, तहसीलदार और उनका स्टाफ शामिल है।

दिलचस्प बात है कि एमएसआई ने ग्रामीण भारत में 32,000 से ज्यादा वाहन बेचे हैं। इन इलाकों में पटना का दानापुर है तो गुजरात का गोंडल भी जो राजकोट से 30 किलोमीटर के फासले पर है।

एक खास लोकेशन में करीब 20 वाहन बेचने पर मारुति सुजुकी के अधिकारियों ने एक समारोह आयोजित किया जिसमें गाड़ियों की चाबी सौंपी गईं। इस समारोह में करीब 100 लोगों को बुलाया गया था जिनमें पंचायत सदस्य, आढ़ती, स्कूली शिक्षक, ग्रामीण डॉक्टर, सरकारी दफ्तरों के अफसर, जिलाधिकारी, जिला पंचायत प्रमुख और विधायक जैसे प्रमुख लोग शामिल रहे।

इस आयोजन के बाद ऋण मेला लगाया गया जिनमें वित्तीय इकाइयों ने सक्षम ग्राहकों को कर्ज मुहैया कराने की पेशकश की। इसके अलावा एमएसआई के कारखाने का दौरा करने के वाले एक दल का चुनाव भी किया गया।

देशव्यापी ग्रामीण मार्केटिन्ग रणनीति में एक कदम आगे बढ़ाते हुए मारुति सुजुकी ने हाल में सिंगूर में ग्रामीण महोत्सव का आयोजन किया जहां से उसकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कंपनी टाटा अक्तूबर में नैनो को बाजार में उतारेगी। इसके बाद कल्याणी में भी इसी तरह का कार्यक्रम किया गया। एमएसआई के एक अधिकारी ने बताया कि हम पूरे पश्चिम बंगाल में इसी तरह के आयोजन करेंगे।

अधिकारी ने कहा, 'गांवों के ऐसे प्रभावशाली लोगों की काफी तादाद है जो एक कार रखना चाहते हैं। मारुति ने इन सक्षम ग्राहकों के ख्वाब को हकीकत में तब्दील करने के लिए शीर्ष स्तरीय सेवाएं मुहैया कराने को विशेष उपाय किए हैं।'

ग्रामीण इलाकों से जुड़ी पहल से कंपनी की गांवों में मौजूदगी पुख्ता होगी। इनमें ग्रामीण इलाकों में सेल्स एवं सर्विस सुविधाओं के साथ विशेष एक्सटेंशन काउंटर शामिल हैं।

अपनी पहुंच को मजबूत बनाने के लिए कंपनी ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और उससे जुड़े बैंक तथा श्रीराम फाइनैंस, मैग्मा फाइनैंस और एमएंडएम फाइनैंसिंग जैसी वित्तीय कंपनियों के साथ गठबंधन किया है।

Tuesday, July 22, 2008

तो कृत्रिम कमी बनाकर बढ़ाये गये चीनी के दाम !

आपने महसूस किया होगा कि पिछले कुछ दिनों से चीनी के लिये आपको अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। ऐसा तब है जब कि धान व गेहूं की तरह चीनी के भी रिकार्ड उत्‍पादन की संभावनाएं हैं। ऐसा भी नहीं कि आपके अधिक कीमत देने से गन्‍ना उत्‍पादक किसानों को उनके उपज की बेहतर कीमत मिल रही है। इसके विपरीत वे तो उचित कीमत नहीं मिलने की वजह से इसकी खेती से विमुख हो रहे हैं। किसान गन्‍ना की खेती छोड़ देंगे तो उनका जो नफा नुकसान होगा सो होगा, भविष्‍य में चीनी की कीमतें भी आम उपभोक्‍ताओं की पहुंच से बाहर हो जायेंगी। आखिर कौन है इन सबके लिये दोषी? पढिये राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित एजेंसी की यह खबर और खुद फैसला कीजिए :

चालू सीजन में चीनी के रिकार्ड उत्पादन की संभावनाओं के बावजूद खुले बाजार का कोटा उम्मीदों से कम जारी किए जाने से पिछले माह चीनी कीमतों में 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। कृषि मंत्रालय के हाल में ही जारी किए गए अनुमान के मुताबिक अक्टूबर 2007 से सितम्बर 2008 तक के चीनी के सीजन में इसका उत्पादन 350 लाख टन तक पहुंच सकता है।

कारोबारियों के अनुसार बीते सप्ताहांत में थोक बाजारों में चीनी एस के दाम 1710-1800 रूपए, चीनी एम के दाम 1710-1750 रूपए और मिल डिलीवरी के दाम 1500-1600 रूपए प्रति क्विंटल तक चढ़ गए जबकि एक माह पूर्व चीनी एस 1540-1580 रूपए, चीनी एम 1550-1600 रूपए और मिल डिलीवरी 1340-1465 रूपए प्रति क्विंटल के भाव पर खरीदी बेची जा रही थी। कारोबारियों का कहना है कि बाजार में चीनी की आवक कम हो गई है जबकि मांग पहले के स्तर पर टिकी हुई है। इस वर्ष की शुरूआत में थोक बाजार में चीनी की कीमतें 1440 रूपए प्रति क्विंटल थी।

जानकारों का मानना है कि गन्ने का रकबा घटने से भी चीनी की कीमतों को समर्थन मिला है। सरकार के इस चालू वर्ष के फसल उत्पादन के चौथे अग्रिम अनुमान के अनुसार गन्ने की बुआई का रकबा घट रहा है और इसमें पिछले वर्ष के मुकाबले अभी तक 4.21 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की चुकी है। इस बीच सरकार ने जुलाई से सितम्बर की तिमाही की अवधि के लिए अपेक्षा से कम कोटा जारी किया है। सरकार ने इस अवधि के लिए 30 लाख टन चीनी खुले बाजार के लिए जारी है।

कारोबारियों का कहना है कि सरकार द्वारा लगभग 44 लाख टन चीनी का कोटा जारी करने की संभावना थी लेकिन कोटा कम जारी होने से बाजार में चीनी के दाम चढ़ने शुरू हो गए हैं। कुछ समय पहले तक जहां चीनी मिलें अपना माल बेचने के लिए आमादा थी वहीं बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने आपूर्ति रोक दी है और बाजार के वर्तमान भावों पर माल बेचने के लिए तैयार नहीं है। इससे बाजार में कृत्रिम कमी पैदा कर दाम बढ़ा दिए गए हैं।

उधर किसानों ने पिछले साल के गन्ने का भुगतान नहीं होने के कारण इस वर्ष इसकी अपेक्षाकृत कम बुआई की है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार किसान गन्ने के रकबे पर तिलहन की खेती कर रहे हैं। पिछले कई वर्षो से चीनी के अतिरेक उत्पादन का लाभ किसानों का नहीं मिल सका और उनके गन्ने की कीमत सही समय पर नहीं मिल पाई। अंतरराष्ट्रीय चीनी संगठन के अनुसार वैश्विक स्तर पर चीनी के उत्पादन में वृद्धि होगी। चालू वर्ष में एक करोड़ 11 लाख टन अधिक चीनी का उत्पादन होगा जिसका असर इसके दामों पर पडे़गा।

भारत विश्व में चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश होने के साथ-साथ सबसे बड़ा उपभोक्ता देश भी है। जानकारों का कहना है कि यदि देश में चीनी का उत्पादन इसी तरह से जारी रहा तो शीघ्र ही भारत सर्वाधिक उत्पादन करने वाले देश ब्राजील को पीछे छोड़ देगा।

Monday, July 21, 2008

एफएओ ने माना, बढ़ सकता है देश में धान का उत्पादन

समय से पहले मानसून के आ धमकने और उत्पादन क्षेत्रों में काफी अच्छी बारिश होने से इस बार देश में धान के कुल उत्पादन में बढ़ोतरी का अनुमान है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में संभावना जतायी गयी है कि इस साल भारत में धान के उत्पादन में लगभग 1.39 फीसदी यानी 20 लाख टन की वृद्धि हो सकती है। एफएओ का अनुमान है कि इस साल यहां धान का कुल उत्पादन 14.55 करोड़ टन रहेगा।

उल्लेखनीय है कि पिछले साल (2007) 14.35 करोड़ टन धान का उत्पादन हुआ था। जबकि 2006 में 14 करोड़ धान पैदा किया गया था। केंद्रीय कृषि विभाग द्वारा इकट्ठे किए गए आंकड़ों के मुताबिक, अब तक धान के रकबे में 5.45 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। पिछले साल इसी समय जहां 86.90 लाख हेक्टेयर में धान की रोपाई हो चुकी थी वहीं इस साल 92.35 लाख हेक्टेयर में रोपाई हो चुकी है।

विश्लेषकों के मुताबिक, दक्षिण-पश्चिम मानूसन के बेहतर रहने के चलते इस साल खरीफ उत्पादन की शुरुआती तस्वीर बढ़िया दिख रही है। फिर भी इसकी वास्तविक स्थिति तभी बेहतर हो पाएगी, जब जुलाई और अगस्त में भी यह मानसून अच्छी बारिश करा सके। हालांकि धान के दो मुख्य उत्पादक राज्य आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र ने कम बारिश के चलते राज्य में सूखे जैसी स्थिति की घोषणा की है। मौसम विभाग ने इन इलाकों की स्थिति में जल्द ही सुधार आने के संकेत दिए हैं और कहा है कि यहां जल्द ही अच्छी बारिश हो सकती है।

देश के उत्तरी और पूर्वी राज्यों जैसे जम्मू और कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और पूर्वी राजस्थान में पर्याप्त बारिश हुई है जबकि पश्चिमी राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश में औसत बारिश ही हुई है। दूसरी ओर, दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में सामान्य से कम बारिश हुई है। मौसम विभाग के मुताबिक, अब तक देश के 36 में से 23 सब-डिवीजनों में औसत बारिश हुई है पर 13 में औसत से कम बारिश हुई है।

जून में इस साल 268.5 मिलीमीटर बारिश हुई है जबकि इस महीने में बारिश का औसत 243.8 मिलीमीटर है। इस तरह देश में जून महीने में औसत से 10 फीसदी ज्यादा बारिश हुई है। मोटे अनाजों और दालों के रकबे में भी क्रमश: 9.01 फीसदी और 2.18 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। 87.35 लाख हेक्टेयर और 30.85 लाख हेक्टेयर में मोटे अनाजों और दालों की बुआई की जा चुकी है। एफएओ की रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि इस साल देश का कुल खाद्यान्न उत्पादन पिछले साल के 25.5 करोड़ टन की तुलना में थोड़ा बढ़कर 25.79 करोड़ टन हो जाएगा।

साल 2006 में तो खाद्यान्नों का कुल उत्पादन 24.26 करोड़ टन ही रहा था। अभी-अभी खत्म हुए रबी सीजन में बेहतरीन मौसम के चलते गेहूं के कुल उत्पादन में जोरदार बढ़त दर्ज की गई। 2007 के रबी सीजन की तुलना में इस बार 22 लाख टन ज्यादा गेहूं उपजाया गया। इस बार गेहूं का कुल उत्पादन 7.8 करोड़ टन रहा जो पिछले 8 सालों में सबसे ज्यादा है।

खाद्यान्नों के उत्पादन में ऐसी बढ़ोतरी होने से विश्लेषकों का मानना है कि 2008-09 साल में देश की खाद्यान्न जरूरतों को आसानी से पूरा किया जा सकेगा। 2006-07 के दौरान देश को 67 लाख टन जबकि 2007-08 में 20 लाख टन गेहूं का आयात करना पड़ा था। एफएओ के ताजा पूर्वानुमान के मुताबिक, 2008 में दुनिया का खाद्यान्न उत्पादन 218 करोड़ टन हो जाएगा। पिछले साल की तुलना में यह 2.8 फीसदी ज्यादा पर पहले के अनुमान से कम है।

(खबर बिजनेस स्‍टैंडर्ड से साभार)

Thursday, July 17, 2008

जट्रोफा की खेती में बढ़ा ऑटो कंपनियों का रुझान


अनाज की खेती कर लगातार घाटा उठा रहे किसानों का जट्रोफा की ओर रुझान तो हो ही रहा था, अब ऑटो कंपिनयों के भी इसमें दिलचस्‍पी लेने की खबर है। पेश है इकनॉमिक टाइम्‍स में अहमदाबाद डेटलाइन से प्रकाशित एक समाचार :

तेल में लगी आग से परेशान ऑटो कंपनियां भविष्य के ईंधन को लेकर तैयारी में जुट गई हैं। बॉयोडीजल को भविष्य के ईंधन के रूप देख जा रहा है। खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों के चलते कंपनियां अब बॉयोडीजल उत्पादन के लिए जट्रोफा पर अपने दांव लगा रही हैं। जट्रोफा पर दांव लगाने वाली प्रमुख ऑटो कंपनियों में जनरल मोटर्स, डेमलर-क्राइसलर और महिंद्रा एंड महिंद्रा शामिल हैं। जीएम और डेमलर-क्राइसलर ने अपने वाहनों पर जट्रोफा से तैयार ईंधन का परीक्षण तो किया ही है, अब जट्रोफा की व्यापक पैमाने पर खेती को भी बढ़ावा दे रही हैं।

गुजरात स्थित सेन्ट्रल सॉल्ट एंड मरिन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएसएमसीआरआई) विभिन्न कंपनियों की गाड़ियों के भविष्य के इंजनों के लिए जट्रोफा से तैयार बायोडीजल का परीक्षण कर रही है। यूरोप की ऑटोमोबाइल कंपनी डेमलर-क्राइसलर द्वारा गुजरात और उड़ीसा में पिछले 4 सालों से जट्रोफा की खेती की जा रही है। प्रमुख अमेरिकी ऑटो कंपनी जनरल मोटर्स भी इस दौड़ में शामिल हो गई है और वह गुजरात की 75-80 हेक्टेयर बंजर भूमि पर जट्रोफा की खेती करने जा रही है।

जनरल मोटर्स (इंडिया) के प्रेजिडेंट और मैनेजिंग डायरेक्टर कार्ल स्लिम ने ईटी को बताया कि जनरल मोटर्स अपने में जट्रोफा के परीक्षण के लिए पहले चरण में 5 लाख डॉलर का निवेश कर चुकी है। स्लिम ने कहा कि तेल के दाम में वृद्धि का दौर खत्म होता नहीं दिख रहा, जिसे देखते हुए जनरल मोटर्स ईंधन के विकल्प पर आक्रामक तरीके से काम कर रही है। बायोडीजल के रूप में जट्रोफा की उपयोगिता को देखते कंपनी की छह गाड़ियों पर भावनगर स्थित सीएसएमसीआरआई ने जट्रोफा से संबंधित परीक्षण किया है। तेल की समस्या को देखते हुए कंपनी अन्य विकल्पों पर भी नजर रखे हुए है, इसी के तहत इलेक्ट्रिक वाहन, एलपीजी और सीएनजी मॉडलों को भी देखा जा रहा है। स्लिम ने यह भी बताया कि जट्रोफा की ठेके पर खेती के लिए कंपनी शीघ्र ही सीएसएमसीआरआई के साथ एक समझौता करेगी।

उन्होंने कहा कि जट्रोफा को लेकर कंपनी प्रतिबद्ध है। गुजरात के 75-80 हेक्टेयर बंजर भूमि पर जट्रोफा की खेती की तैयारी हो चुकी है। कंपनी के कॉरपोरेट मामलों के वाइस प्रेजिडेंट पी. बालेंद्रन ने बताया कि योजना की मंजूरी के बाद जरूरत के अनुरूप निवेश किया जाएगा, फिलहाल योजना गुजरात सरकार के पास भेजी जा चुकी है।

सीएसएमसीआरआई के डायरेक्टर पुष्पितो के घोष ने ईटी को बताया कि जनरल मोटर्स के साथ हम 5 वर्षीय प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। योजना के तहत 75 हेक्टेयर क्षेत्र में जट्रोफा के पौधों को उगाकर अच्छी गुणवत्ता के बीज प्राप्त किए जाएंगे। इंस्टीट्यूट का लक्ष्य इस नई परियोजना के तहत जट्रोफा के बीज का साल में करीब 100 टन उत्पादन करना है। संस्था के सीनियर वैज्ञानिक ने जट्रोफा के अच्छे उत्पादन का भरोसा जताते हुए कहा कि बढ़िया तकनीक और प्रयास से हम इसे प्राप्त कर लेंगे। सीएसएमसीआरआई बीज से 40 फीसदी तक तेल निकालने में सक्षम है।

डेमलर-क्राइसलर 90,000 लीटर बायोडीजल हासिल करने के लिए पिछले 4 साल में 3 करोड़ रुपए लगा चुकी है। इस योजना के तहत कंपनी गुजरात और उड़ीसा में जट्रोफा के प्रत्येक पौधे से 1 से लेकर 5 किलोग्राम तक बीज प्राप्त कर रही है। साल 2006 में मर्सडीज कार पर जट्रोफा का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया था और अब डेमलर-क्राइसलर लक्जरी कारों में उत्सर्जन और क्षमता संबंधी परीक्षण के लिए 500 लीटर जट्रोफा बॉयोडीजल का उपयोग करेगी।

इस क्रम में अगली कड़ी एशिया की प्रमुख कंपनी टोयोटा हो सकती है। सीएसएमसीआरआई ने टोयोटा क्वालिस (इंजन में बिना किसी परिवर्तन के) पर शुद्ध जट्रोफा बायोडीजल का प्रयोग 86,000 किलोमीटर चलाकर किया है।

Saturday, July 12, 2008

धरती के रंग, किसान के संग

वर्षा ऋतु भारत के गांवों में सुख और दु:ख दोनों का संदेशा लाती है। कई गांव बाढ़ में बह जाते हैं, कई का सड़क संपर्क भंग हो जाता है। भारतीय गांवों में आदमी और मवेशी पर बीमारियों का प्रकोप बरसात में कुछ ज्‍यादा ही होता है। इन सबके बावजूद यदि किसानों को किसी ऋतु का सबसे अधिक इंतजार रहता है तो वह वर्षा ही है। यही वह मौसम है, जब धरती तो हरी-भरी हो ही जाती है, किसानों के मन में भी हरियाली छा जाती है। धरती पर चांदी से चमकते पानी का अनंत विस्‍तार, पौधों की हरी-हरी बाढ़, रंग-बिरंगे बादलों से पटा आकाश – यह सब इसी मौसम में देखने को मिलता है। किसानों के मन में नयी फसल बोने की उमंग धरती का अप्रतिम सौन्‍दर्य देख कई गुना बढ़ जाती है।
वर्षा ऋतु में धरती के इन रंगों को अपने कैमरे में संजोने की कोशिश की, तो सोचा खेती किसानी की व्‍यस्‍तता के बीच इस बार इन चित्रों से ही पोस्‍ट का काम चला लिया जाये। शायद ब्‍लॉगर मित्रों को पसंद आये, या हो सकता है न भी आये।






Tuesday, July 8, 2008

भूखे लोगों का खाना एथनॉल में 'हजम' कर जाता है अमेरिका

आधे से अधिक अफ्रीकी देशों के भोजन से अमेरिका एथनॉल व बायोडीजल बना रहा है। एक अमेरिकी स्पोर्ट्स बाइक की टंकी में एक बार में जितना एथनॉल डाला जा सकता है, उसे बनाने में लगने वाले अनाज को एक आदमी एक साल तक खा सकता है।

एक तरफ तो संयुक्त राष्ट्र संघ और फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन (एफएओ) इस बात की चेतावनी दे रहा है कि आगामी 10 साल में अफ्रीका के लगभग आधे देश भुखमरी के कगार पर पहुंच जाएंगे, वहीं अमेरिका गाड़ी चलाने के लिए अनाज से एथनॉल और तिलहन से बायोडीजल बनाने में जुटा है।

विश्व बैंक की रिपोर्ट भी इस बात को प्रमाणित कर चुकी है कि अमेरिका में बनने वाले एथनॉल और बायोडीजल के चलते ही विश्व में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ रही हैं। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति बुश को किरकिरी से बचाने के लिए अभी तक इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है। गौरतलब है कि बुश ने कहा था कि भारत और चीन के लोगों के ज्यादा खाने के कारण विश्व में खाद्य संकट हो रहा है।

एफएओ के मुताबिक, अमेरिका विश्व में उपजने वाले कुल मोटे अनाज के लगभग 12 फीसदी हिस्से से एथनॉल बनाने का काम करता है। वर्ष 2008-09 में विश्व में कुल 109.6 करोड़ टन मोटे अनाज के उत्पादन का अनुमान है। अमेरिका में इस दौरान 10.16 करोड़ टन मक्के से एथनॉल बनाए जाने की उम्मीद है। इसके अलावा ज्वार का इस्तेमाल भी एथनॉल बनाने में किया जाता है। अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक इस साल पिछले साल के मुकाबले एथनॉल निर्माण के लिए 25 मिलियन टन अधिक मक्के का इस्तेमाल किया जाएगा।

वर्ष 2006-07 के मुकाबले यह मात्रा दोगुना है। मालूम हो कि 1 किलोग्राम अनाज से 103 ग्राम एथनॉल निकलता है यानी कि लगभग 10 किलोग्राम अनाज से 1 किलोग्राम एथनॉल निकलता है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगर एक अमेरिकी सिर्फ 12-15 किलोमीटर का सफर कार से न करे तो दो अफ्रीकी बच्चे महीने भर का खाना खा सकते है। दूसरी ओर बायोडीजल के लिए सोयाबीन और पाम ऑयल का अमेरिका में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2006-07 के दौरान अमेरिका में बायोडीजल के लिए सोया तेल का इस्तेमाल दोगुना हो गया है। उसके बाद से हर साल बायोडीजल के लिए सोया का इस्तेमाल 5-6 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। भारत में बायोडीजल मामले के विशेषज्ञ और दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के प्रो. नवीन कुमार के मुताबिक 4 किलोग्राम सोया से 1 किलोग्राम बायोडीजल बनता है।

लगभग इतनी ही मात्रा तिलहन से बायोडीजल बनाने में लगती है। हालत ऐसी है कि दुनिया भर में मोटे अनाज की कीमत साल भर में 45-65 फीसदी बढ़ी है। मक्के की कीमत में पिछले साल के मुकाबले इस साल मई में 50 फीसदी की तो ज्वार की कीमत में 60 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गयी है। खाद्य विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य सामग्री से जुड़ी किसी भी चीज के मूल्य बढ़ते ही उसके समर्थन में अन्य चीजों की कीमत भी बढ़ जाती है।

(बिजनेस स्‍टैंडर्ड से साभार)

Saturday, July 5, 2008

बिहार से जुड़े हैं विकास के प्रतिमान : सुलभ इंटरनेशनल और सुधा डेयरी

भारत जैसे जनसंख्‍याबहुल व कृषिप्रधान देश के लिये विकास के जो अनुकरणीय प्रतिमान हो सकते हैं, उनमें सुलभ इंटरनेशनल और सुधा डेयरी के नाम प्रमुखता से लिये जा सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की सर्वसमावेशी विकास से संबंधित एक रिपोर्ट में मानव प्रगति के साथ संपत्ति-सृजन में सुलभ इंटरनेशनल की भूमिका को खासा महत्‍व दिया गया है। सुधा डेयरी की सफलता की कहानी भी समाचार माध्‍यमों की सूर्खियां बनती रही है। खास बात यह है कि इन दोनों का संबंध उसी बिहार प्रदेश से है, जिसके नाम से ही कई लोग मुंह बनाने लगते हैं। खेती-बाड़ी में हम पेश कर रहे हैं उन दोनों संस्‍थाओं से संबंधित दो खबरें :

सर्वसमावेशी विकास से दूर हो सकती है गरीबी

सर्वसमावेशी विकास (इंक्लूसिव ग्रोथ) से संपत्ति का सृजन हो सकता है और इससे निजी उद्यमों के कारोबारी मॉडल में गरीबों को जोड़कर सामाजिक परिवर्तन को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। यूएनडीपी की 2006 में शुरू किए गए 'बढ़ते सर्वसमावेशी बाजार पहल' के तहत यह अध्ययन किया गया है। इस रिपोर्ट में विकसित और विकासशील देशों के उन 50 केस स्टडी को शामिल किया गया है जिनमें मानव प्रगति और संपत्ति के सृजन के लिए प्रभावी सर्वसमावेशी कारोबारी मॉडल अपनाया गया।

इसमें भारत से सुलभ इंटरनैशनल के केस स्टडी को शामिल किया गया है जिसने एक ऐसा मॉडल बनाया है जिसमें आमदनी भी होती है और सामाजिक समस्याओं का भी समाधान होता है। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के भारतीय अनुसंधान केंद्र के द्वारा लिखित रिपोर्ट में बताया गया है कि किस प्रकार बिंदेश्वरी पाठक ने सुलभ इंटरनेशनल के माध्यम से मैला ढोने वाले भंगियों को मुक्ति दिलाई।

सुलभ ने विभिन्न तरह के बजट और जगह के हिसाब से कुल 26 तरह के टॉयलट का विकास किया है और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पदार्थों की मदद से टॉयलट बनाने के लिए 19,000 राजगीरों को प्रशिक्षण दिया गया है। इस अभियान से 60,000 लोग भंगी जीवन छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ सके हैं।

रिपोर्ट में उन रास्तों को रेखांकित किया गया है जिससे न केवल निजी क्षेत्र, बल्कि सरकारें, समुदाय और गैर सरकारी संगठन गरीबी और भूख को दूर करने और पर्यावरण सुरक्षा के साथ सामाजिक बराबरी को हासिल करने के सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य को पाने में योगदान कर सकते हैं। रिपोर्ट में एक कारोबारी रणनीति भी बताई गई है जिससे गरीबों के साथ सफल कारोबार के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर किया जा सकता है।
(इकनॉमिक टाइम्‍स से साभार)

सुधा डेयरी से निकली जीवन की धारा

पटना से 25 किलोमीटर दूर इटकी के काथाटोली गांव का सुमन कुमार अब जिंदगी अपनी शर्तों पर जी रहा है। आज उसके पास आम जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त धन और साधन हैं।

बिहार की सहकारी दुग्ध योजना सुधा डेयरी ने उसकी किस्मत को बदल दी है। एक समय था, जब वह इलाके के दूध माफिया को दूध बेचने को मजबूर था, लेकिन आज वह सारा दूध सुधा डेयरी को देता है और उसे उसकी सही कीमत मिलती है। सुधा डेयरी की स्थापना 1983 को को-ऑपरेटिव सोसाइटी के तहत की गई थी। सुधा डेयरी दूध और इसके उत्पादों से करोड़ों का व्यापार करती है।

बिहार में सुधा डेयरी ने सफलता की जो कहानी लिखी है, वह अन्य क्षेत्रों के लिए प्रेरणा भी है और मिसाल भी। इस डेयरी के बिहार और आसपास के राज्यों के 84 शहरों में 6,000 से ज्यादा आउटलेट हैं। सुधा डेयरी में प्रतिदिन 6 लाख लीटर दूध का संग्रहण होता है। लगभग 5 लाख से ज्यादा दूधवाले सुधा डेयरी से जुड़े हुए हैं। इसकी सफलता ने ऐसे प्रतिमान गढ़े हैं कि अब निजी क्षेत्र के बैंकों ने भी इन ग्वालों को जरूरत पड़ने पर ऋण मुहैया कराने की पेशकश की है। सुधा डेयरी ने श्वेत क्रांति की जो कहानी बिहार में लिखी है, उससे आज हजारों किसान और ग्वाले लाभान्वित हो रहे हैं।

सुधा डेयरी के प्रबंध निदेशक सुधीर कुमार सिंह ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि सुधा डेयरी दो नए प्लांट खोलने जा रही है। इनमें 26 एकड़ में फैला बिहारशरीफ प्लांट प्रमुख है। उन्होंने बताया कि बिहार में छह दुग्ध यूनियन हैं, जो पटना, सिमुल (मुजफ्फरपुर), समस्तीपुर, भोजपुर, बरौनी और भोजपुर में स्थित हैं। उन्होंने कहा कि सुधा डेयरी से 5 लाख से ज्यादा दुग्ध उत्पादकों को फायदा हो रहा है। डेयरी संगठन ने मवेशियों के स्वास्थ्य बीमा की भी व्यवस्था की है। इस संगठन से जुड़े किसानों को टीकाकरण की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।

उन्होंने कहा कि यूनिसेफ की मदद से सुधा डेयरी ने गांवों में कम कीमत वाले शौचालय बनाने की योजना भी चला रही है। उन्होंने कहा कि हालांकि राज्य में राज डेयरी और अमूल डेयरी का भी छोटा-मोटा बाजार है, लेकिन अगर डेयरी उद्योग की बात की जाए तो सुधा डेयरी ही लोग जानते हैं। पशु चिकित्सक संजय कुमार झा ने क हते हैं कि निश्चित तौर पर सुधा डेयरी ने बिहार में श्वेत क्रांति की दिशा बदल दी है। बिहार में कृषि और पशुपालन एक प्रमुख व्यवसाय है, लेकिन सटीक रणनीति के अभाव में यहां दुग्ध उत्पादन की स्थिति अच्छी नहीं है।

इस दिशा में सुधा डेयरी एक उम्मीद की रोशनी बनकर आई है। को-ऑपरेटिव सोसाइटी के अंतर्गत काफी कम लाभ लेकर लोगों को सेवाएं उपलब्ध करवाकर सुधा डेयरी ने व्यापार और प्रबंधन का एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया है। उन्होंने कहा कि ऐसे किसान, जो को-ऑपरेटिव दुग्ध सोसाइटी के सदस्य हैं, वे ही निजी बैंकों द्वारा दिए जा रहे ऋण और अन्य पैकेजों का लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह से सुधा ने किसानों और ग्वालों को एक बेहतर जिंदगी जीने का रास्ता दिखाया है।
(बिजनेस स्‍टैंडर्ड से साभार)

Friday, July 4, 2008

गेहूं, चावल, खाद्य तेल और दालों के बाद अब मक्‍का के निर्यात पर भी प्रतिबंध

मुद्रास्फीति की बढ़ती दर से जूझ रही सरकार ने 15 अक्टूबर तक के लिए मक्का के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया, ताकि घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाई जा सके और मुर्गी के चारे व अन्य उत्पादों की कीमतों पर नियंत्रण किया जा सके।

वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के जरिए इस प्रतिबंध की घोषणा की गई जो 15 अक्टूबर तक लागू रहेगी तब तक नई फसल तैयार होगी। वित्त वर्ष 2007-08 की बंपर पैदावार के बावजूद जुलाई में मक्के की कीमत 40 फीसदी बढ़कर 970 रुपये प्रति क्विंटल हो गई जो जनवरी में 700 रुपये प्रति क्विंटल थी। सरकार ने गेहूं, गैर बासमती चावल, खाद्य तेल और दालों पर पहले ही प्रतिबंध लगा दिया है।

वाणिज्य और उद्योग मंत्री कमलनाथ ने हाल ही में कहा था कि कोई और उत्पाद है जो प्रतिबंध से बचा हुआ है। कारोबारियों ने कहा कि विशेषकर अमेरिका में जैव ईधन में मक्का के इस्तेमाल के कारण बढ़ रही वैश्विक मांग का असर घरेलू कीमतों पर भी हुआ। मक्के का इस्तेमाल कलफ [स्टार्च] उद्योग के अलावा मुर्गी और पशुओं के चारे के तौर पर होता है जिसके लिए सालाना 1.2 टन मक्के की जरूरत होती है।

उन्होंने कहा कि भारत मक्का का विश्व में छठा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। भारत द्वारा मक्के के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए जाने से अंतरराष्ट्रीय बाजार पर असर पड़ेगा। भारत ने वित्तवर्ष 2007-08 के दौरान 25 लाख टन मक्के का निर्यात किया था, जबकि इसके पिछले साल 10 लाख टन मक्के का निर्यात किया गया था। दिल्ली स्थित मुर्गी चारा विनिर्माता राम विलास मंगला ने कहा कि निर्यात में बढ़ोतरी से घरेलू बाजार की उपलब्धता और कीमत पर असर पड़ा।

कीमतों में फर्क होने के कारण भारत से निर्यात की मांग मुख्यत: पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया और पश्चिम एशिया से आती है। अमेरिका के मुकाबले भारत में मक्का लगभग आधी कीमत पर मिलता है। मुर्गी पालक और कलफ निर्माता निर्यात पर पाबंदी लगाने की मांग कर रहे थे, ताकि घरेलू कीमतों को नियंत्रित किया जा सके।

आल इंडिया स्टार्च मेन्युफेक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अमोल एस शेठ ने कहा कि भारत को चीन का अनुसरण करना चाहिए और मक्का के निर्यात का नियमन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि नई फसल की आवक से पहले इस उद्योग को 35 लाख टन मक्के की जरूरत होगी।

(दैनिक जागरण से साभार)

Thursday, July 3, 2008

एक करोड़ लोगों का एक साल का निवाला सड़ाया

पिछले एक दशक के दौरान भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदामों में सैकड़ों करोड़ रूपए मूल्य का 10 लाख टन से ज्यादा अनाज सड़ गया जो एक करोड़ से अधिक लोगों की एक साल तक पेट की आग बुझाने के लिए काफी था। यह स्थिति तब है जब संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में रेखांकित है कि भारत के 63 फीसदी बच्चे भूखे पेट सोने के लिए मजबूर हैं।
अनाज को भंडारण के समय नुकसान से बचाने के लिए निगम द्वारा 245 करोड़ रूपए खर्च किए जाने के बावजूद यह स्थिति है। यह विडंबना है कि अनाज के सड़ जाने के बाद उन्हें निपटाने के लिए भी निगम को 2.59 करोड़ खर्च करने पड़े।


अनाजों के भंडारण से संबंधित ये सनसनीखेज तथ्य सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत दिल्ली निवासी देवाशीष भट्टाचार्य के आवेदन पर सामने आए। श्री भट्टाचार्य के सवाल पर निगम ने उन्हें सूचित किया कि देश भर में अनाजों की खरीदारी व वितरण की जिम्मेदारी निभा रही सरकारी एजेंसी के भंडारों में पिछले एक दशक के दौरान 10 लाख टन अनाज सड़ गए। निगम की सूचना के अनुसार 1997 से 2007 के बीच 1.83 लाख टन गेहूं, 3.95 लाख टन चावल, 22 हजार टन धान और 110 टन मक्का सड़ गए। निगम ने बताया कि उत्तरी क्षेत्र के तहत आने वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश व दिल्ली में सात लाख टन अनाज सड़ गए। निगम ने 86.15 करोड़ रूपए अनाज को नुकसान से बचाने के लिए खर्च किया जबकि 60 लाख रूपए सड़े अनाज को निबटाने में गए।

भट्टाचार्य ने बताया कि एफसीआई ने अपने गोदामों में अनाजों के संरक्षण के लिए जितनी रकम खर्च की उसे देखते हुए यह नुकसान विशाल है। क्या यह राष्ट्रीय शर्म नहीं है। निगम के अनुसार पूर्व क्षेत्र-असम, नगालैंड, मणिपुर, उड़ीसा, बिहार, झारखंड, और पश्चिम बंगाल में 1.5 लाख टन अनाज सड़ा। निगम ने यहां अनाजों को सड़ने से बचाने के लिए 122 करोड़ रूपए खर्च किए जबकि सड़े अनाज को निबटाने के लिए 1.65 करोड़ रूपए खर्च किए गए।

दक्षिण क्षेत्र-आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल में 25 करोड़ रूपए खर्च करने के बावजूद 43069.023 टन अनाज सड़ गए। सड़े अनाज को निपटाने के लिए 34867 रूपए खर्च किए गए। महाराष्ट्र व गुजरात में 73814 टन अनाज को नुकसान पहुंचा। एफसीआई ने अनाजों को सड़ने से बचाने के लिए 2.78 करोड़ रूपए खर्च किए। सड़े अनाज को ठिकाने लगाने के लिए 24 लाख रूपए खर्च किए गए। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 23323.57 टन अनाज सड़ गए। अनाजों को सड़ने से बचाने के लिए वहां साढ़े पांच करोड़ रूपए खर्च किए गए। यहां मामला दूसरे राज्यों के गोदामों से भिन्न नहीं है। एफसीआई को सड़े अनाज निबटाने के लिए वहां 10.64 लाख रूपए खर्च करने पड़े। भट्टाचार्य ने कहा कि एफसीआई के आंकड़ों में उलटफेर प्रतीत होता है।

(राष्‍ट्रीय सहारा से साभार)

Thursday, June 26, 2008

बुरा होगा वह दिन जब भारतीय किसान बीज के लिए विदेश पर निर्भर रहेगा

''किसानों को अच्‍छी क्‍वालिटी के बीजों की उपलब्‍धता पक्‍का करने के लिए सरकार ने बीज विधेयक में संशोधन करने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्‍यक्षता में हुई केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में तय किया गया कि बीज विधेयक 2004 में सरकारी संशोधन लाया जायेगा। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्‍यमंत्री पृथ्‍वीराज चाह्वाण ने नई दिल्‍ली में संवाददाताओं को बताया कि प्रस्‍तावित संशोध्‍ान से उच्‍च क्‍वालिटी वाले बीजों की उपलब्‍धता किसानों को पक्‍का की जा सकेगी। उन्‍होंने बताया कि विधेयक में प्रावधान होगा कि घटिया क्‍वालिटी के बीजों की बिक्री रुके, बीज उत्‍पादन में निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़े, बीजों का भली-भांति परीक्षण हो और बीजों के आयात को उदार बनाकर किसानों के हितों की सुरक्षा हो सके।''

यह खबर 26 जून, 2008 को बीज विधेयक में संशोधन करेगी केन्‍द्र सरकार शीर्षक से प्रभासाक्षी पोर्टल पर प्रकाशित हुई है। ख्‍ाबर से स्‍पष्‍ट है कि बीजों का महंगा होना सरकार की चिंता नहीं है। खबर में कहीं भी किसानों को सस्‍ते दर पर बीजों को उपलब्‍ध कराने की बात नहीं है। सरकार चिंतित है घटिया क्‍वालिटी के बीजों की बिक्री से। वह किसानों को अच्‍छे क्‍वालिटी के बीज उपलब्‍ध कराना चाहती है। इसके लिये उसे बीज उत्‍पादन में निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ाना और बीजों के आयात को उदार बनाना जरूरी जान पड़ता है। बीज विधेयक 2004 में प्रस्‍तावित संशोधन में वह इसके लिये आवश्‍यक प्रावधान करेगी।

घटिया क्‍वालिटी के बीजों की बिक्री पर रोक लगे और किसानों को अच्‍छे क्‍वालिटी के बीज मिलें, इससे भला किसे एतराज हो सकता है। लेकिन इसके लिये बीजों के आयात और निजी क्षेत्र की सहभागिता को जरूरी बताना उचित नहीं जान पड़ता। क्‍या राष्‍ट्रीय बीज निगम और राज्‍य बीज निगमों द्वारा उत्‍पादित बीज घटिया होते हैं, जो निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ाना जरूरी बताया जा रहा है। वैसे भी सरकार के बीज निगम सिर्फ सरकारी फार्मों पर ही बीज उत्‍पादन नहीं कराते, बल्कि किसानों को आधार बीज उपलब्‍ध कराकर अपनी देखरेख में उनके खेतों में भी प्रमाणित बीज उत्‍पादित कराते हैं। वह भी तो निजी क्षेत्र की सहभागिता ही है। जा‍हिर है सरकार इतना से संतुष्‍ट नहीं है। जो काम आज नेशनल सीड कॉरपोरेशन की अगुवाई में हो रहा है, उस काम में वह शायद निजी कंपनियों को अगुवा बनाना चाहती है।

सरकार का इरादा विदेश से अधिक मात्रा में बीज के आयात का भी है। इसके लिये वह नियमों को उदार बनाना चाहती है। हालांकि सरकार की यह नीयत कई सवाल खड़ा करती है। मसलन, क्‍या अपने देश में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, विभिन्न कृषि विश्‍वविद्यालय व अन्‍य शोध संस्‍थाओं के कृषि वैज्ञानिक जिन बीजों का विकास कर रहे हैं, वे सही नहीं हैं? क्‍या हमारे कृषि वैज्ञानिक बीज के मामले में देश को आत्‍मनिर्भर बनाये रखने में अक्षम हैं? क्‍या हमारे देश में दूसरी हरित क्रांति आयातित बीजों के बूते होगी? अपनी मिट्टी पर उपजनेवाले जिन फसल-प्रभेदों पर हमें नाज रहा है, विदेशों में भी जिनकी मांग रही है, उन्‍हें हम त्‍याग कर विदेशी प्रभेदों को अपनायें?

बीज विधेयक में ऐसे संशोधन से तो सिर्फ बीज उत्‍पादन से जुड़ी विदेशी कंपनियों और बीज आयातकों व अन्‍य कारोबारियों का भला होगा। बाहर से बीजें आयेंगी, तो निश्चित है कि उसमें बड़ा परिमाण जीन संवर्द्धित बीजों का होगा, जिनके औचित्‍य को लेकर दुनिया भर में विवाद है। इससे तो हमारी परंपरागत कृषि प्रणाली को नुकसान होगा ही, कृषि लागत अत्‍यधिक बढ़ जायेगी। ये परिस्थितियां किसान ओर किसानी दोनों को बरबाद करेंगी, जिसका खामियाजा सारे देशवासियों को उठाना होगा। कितना बुरा होगा वह दिन जब हम फसलों के बीज के लिये भी विदेश पर आश्रित हो जायेंगे? कहीं जाने या अनजाने में सरकार बीजों के मामले में हमारी आत्‍मनिर्भरता को समाप्‍त करने की साजिश का हिस्‍सा तो नहीं बन रही?

हमारे यहां यह विडंबना ही है कि रिकार्ड उत्‍पादन होने के बावजूद हमारी उपज के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है, और महंगा होने के बावजूद विदेशी बीजों के आयात को सरल बनाया जा रहा है। गौरतलब है कि भारत सरकार ने इस समय चावल व कुछ अन्‍य कृषि उत्‍पादों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा है। इस बेमेल नीति का नतीजा सामने भी आ रहा है - किसानों की कृषि लागत इतनी बढ़ती जा रही है कि फसल बेचकर उसे निकालना भी मुश्किल हो रहा है।

Friday, June 20, 2008

किसान से बीज पर 2885 फीसदी मुनाफा, यह तो सीधे लूट है।

हमारा धान 7 रु. 45 पैसे में हमसे लिया जाये और वैसा ही धान हमें 215 रु. में बीज के नाम पर दिया जाये, तो इसे आप क्‍या कहेंगे? कोई भी कंपनी कारोबार मुनाफा के लिए ही करती है, लेकिन क्‍या यह मुनाफा 2885 फीसदी होना चाहिए? यह तो लूट की खुली छूट है। सरासर ठगी है, धोखाधड़ी। हम कैसे मानें कि इस देश में किसानों का भला सोचनेवाली कोई सरकार है?

दरअसल निजी कंपनियां बीज के नाम पर किसानों लूट रही हैं, और सरकार आंखें मुंदे हुए है। यही नहीं, बहुधा ऐसा देखा जाता है कि ये कंपनियां सरकारी संसाधनों का इस्‍तेमाल भी करती हैं। हद तो यह है कि सरकारी कर्मचारी व जनप्रतिनिधि इनकी मदद में खड़े रहते हैं। सरकारी संसाधनों का इस्‍तेमाल ये कंपनियां इस उद्देश्‍य से करती हैं कि लोग इन्‍हें सरकारी कार्यक्रम का हिस्‍सा समझें। अशिक्षित या अल्‍पशिक्षित किसान इन्‍हें वैसा समझ भी लेते हैं और खुशी-खुशी बोरे भर अनाज की कमाई दो-चार मुट्ठी बीज के लिए गवां देते हैं। एक अंधी आशावादिता उनकी कंगाली को और बढ़ा देती है। निराशा से घिरे वे धरतीपुत्र लॉटरी का टिकट समझ कर महंगा बीज खरीदते हैं कि शायद इतनी फसल हो कि उनके सारे दुख दूर हो जायें। लेकिन वैसा कुछ नहीं होता। कभी-कभी तो महंगे बीज से होनेवाली पैदावार उनके घर के बीज से भी कम होती है।

जब भी बीज बोने का सीजन आता है, हमारे खेतिहर इलाकों में तथाकथित उन्‍नत बीज बेचनेवाली कंपनियों व संस्‍थाओं के एजेंटों की चहलकदमी बढ़ जाती है। इनमें से कुछ लोग सरकारी मशीनरी के सहयोग से किसान प्रशिक्ष्‍ाण शिविरों का आयोजन भी करते हैं। हालांकि वह केवल स्‍वांग होता है, उनका असली उद्देश्‍य बीज बेचना होता है। कितना चोखा धंधा है? 7 रु. 45 पैसे में मिलनेवाला एक किलो धान बेच रहे हैं दो सौ ढाई सौ रुपये में। क्‍या कोई कमाएगा ? पांच किलो भी बेच दिये तो हजार रुपये धरे हैं। उधर किसान चार बोरा धान लेकर जाये तब शायद इतने पैसे मिलें।

केन्‍द्र और राज्‍य की सरकारों के बीज निगम हैं, राष्‍ट्रीय बीज नीति भी है। लेकिन सब जहां के तहां हैं। खेती-बाड़ी की समस्‍याएं प्रशासनिक अधिकारियों के लिए के लिए कभी प्राथमिकता नहीं बन पातीं। रोम के जलने और नीरो के चैन से बंशी बजानेवाली स्थिति ही हमेशा रहती है। चालू खरीफ वर्ष 2008 में बीज विस्‍तार कार्यक्रम के तहत बिहार सरकार ने बिहार राज्‍य बीज निगम के धान बीज किसानों के बीच उपलब्‍ध कराने पर काफी जोर दिया। तब भी बेहतर बीज का झांसा देकर निजी कं‍पनियों के एजेंट किसानों की जेबें कतरने में कामयाब रहे।

यह तो हमारा अपने इलाके का अनुभव है। शायद विदर्भ की स्‍ि‍थति और अधिक खराब है। मशहूर पत्रकार पी. साईंनाथ कहते हैं कि विदर्भ क्षेत्र में 1994 में स्थानीय स्तर पर एक किलो कपास के बीज की कीमत 7 रुपये किलो होती थी। लेकिन आज उसी इलाके में मोनसेंटों द्वारा एक किलो कपास का बीज 1800 रुपये किलो बेचा जा रहा है। यह अंधेरनगरी नहीं तो क्‍या है?

किसान की उपज की कीमतों को नियंत्रित करने के तमाम उपाय हों और उसकी कृषि लागत कम करने का कोई प्रयास न हो, यह ठीक नहीं। किसान अभाव में रहेगा तो खेती भी उन्‍नत नहीं हो सकेगी। आज की तारीख में बीज, खाद, बिजली, डीजल कोई भी चीज किसान को सस्‍ती व वाजिब कीमतों पर नहीं मिल रही हैं। ये चीजें महंगी तो हैं ही, अक्‍सर किसानों को खाद व डीजल कालाबाजार में खरीदना होता है। आखिर कितना बोझ सहेगा भारत का किसान?

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